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धर्म

दोस्त से लेकर सच्चे प्रेमी तक, श्रीकृष्ण से सीखें रिश्ते निभाने की कला

सुमित कुमार/aajtak.in
  • 23 अगस्त 2019,
  • अपडेटेड 11:34 PM IST
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भगवान विष्‍णु के अवतार श्रीकृष्‍ण का जीवन किसी सबक से कम नहीं. उनके सबक समझने में आसान होने के बावजूद बेहद अर्थपूर्ण हैं. श्री कृष्ण ने अपने जीवन में हर रिश्ते को बेहद सरलता के साथ परिभाषित किया है और उसे ईमानदारी से निभाया है. श्री कृष्ण से सीखें किस तरह रिश्ते निभाए जाते हैं.

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दोस्ती का रिश्ता
भगवान श्रीकृष्‍ण और सुदामा की मित्रता हमें बचपन से इसलिए पढ़ाई-सिखाई जाती है, क्योंकि वो हमें रिश्तों की कद्र करना और दोस्तों के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहने के लिए प्रेरित करती हैं. साथ ही ऊंच-नीच, अमीरी-गरीबी, छोटे-बड़े की पाबंदियों से दूर दोस्ती सबसे अहम रिश्ता भी यह कृष्‍ण-सुदामा ने हमें सिखाया. सुदामा, कृष्ण के बचपन के मित्र थे. वह बहुत ही गरीब व्‍यक्ति थे, लेकिन कृष्ण ने अपनी दोस्ती के बीच कभी धन व हैसियत को नहीं आने दिया. वे अर्जुन के भी बहुत अच्छे मित्र थे और द्रौपदी के भी बहुत अच्‍छे सखा थे.

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प्रेमिका के प्रति प्यार
कृष्‍ण के बहुत सारे प्रशंसक और प्‍यार करने वाले थे. लेकिन वृंदावन में राधा के प्रति उनका प्‍यार जीवन का सबसे महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा रहा है, जहां वह नंद और यशोदा द्वारा लाए गए थे. वृंदावन में कृष्ण ने राधा के साथ प्रेम लीला रचाई. केवल राधा ही कृष्ण की दीवानी नहीं थी, बल्कि वृंदावन की कई गोपियां कृष्ण को मन ही मन ही मन अपना मान चुकी थी. वे राधा व गोपियों के साथ मिलकर रास लीला रचाते थे. कृष्ण इनसे प्यार के साथ-साथ सम्मान भी करते थे. आज के प्रेमियों को श्री कृष्‍ण के प्‍यार और प्रेमिकाओं के प्रति सम्‍मान से बहुत कुछ सीखने को मिलता है.

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माता-पिता के प्रति स्नेह-सम्मान
भले ही श्री कृष्ण देवकी व वासुदेव के पुत्र कहलाते हैं, लेकिन उनका पालन-पोषण यशोदा व नंद ने किया था. भगवान कृष्ण ने देवकी व यशोदा दोनों मांओं को अपने जीवन में बराबर का स्थान दिया और दोनों के प्रति अपने कर्तव्यों को बखूबी निभाया. इस तरह कृष्ण ने दुनिया को यह सिखाया कि हमारे जीवन में मां-बाप का अहम रोल है, इसलिए हमें हमारा जीवन अपने माता-पिता की सेवा में समर्पित कर देना चाहिए. भगवान कृष्‍ण से सीखने का यह सबसे अच्‍छे सबक में से एक है.

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गुरू के प्रति आदर
भगवान विष्णु का अवतार रूप होने के बावजूद, श्री कृष्ण के मन में अपने गुरुओं के लिए बहुत सम्मान था. अपने अवतार रूप में वे जिन भी संतों से मिले उनका उन्होंने पूर्ण सम्मान किया.

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श्रीकृष्ण बतौर गुरू
महाभारत के रण में श्रीकृष्ण ने बतौर गुरू पांडवों का साथ दिया था. अर्जुन को युद्ध की बारीक रणनीतियां श्रीकृष्ण ने ही बताई थी. पांडवों की जीत में श्रीकृष्ण की सबसे अहम भूमिका रही थी. इसलिए श्रीकृष्ण को एक अच्छा गुरू कहना गलत नहीं होगा.

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