चैत्र नवरात्र का महापर्व चल रहा है. मां दुर्गा के तमाम मंदिरों में श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ है. देवी के शक्तिपीठों में तो भक्तों की कतारें और भी लंबी हैं. आदिशक्ति के कुल 51 शक्तिपीठ बताए गए हैं. इनमें से एक शक्तिपीठ पाकिस्तान में भी स्थित है. पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में हिंगलाज नाम का शक्तिपीठ है. स्थानीय लोगों में यह नानी की दरगाह के नाम से भी प्रसिद्ध है. मां का लज्जा स्वरूप होने के कारण इसका नाम हिंगलाज पड़ा है. देश-दुनिया में इस शक्तिपीठ को लेकर बड़ी मान्यताएं हैं. कहते हैं कि मां का यह शक्तिपीठ जाति-धर्म के बंधन से मुक्त है. इसलिए यह शक्तिपीठ हिंदू-मुस्लिम के बीच सद्भावना, सौहार्द की एक मिसाल है.
हिंग का अर्थ है रौद्र रूप. और लाज का अर्थ है लज्जा. पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव के सीने पर पैर रखकर मां शक्ति लज्जित हुई थीं. इसलिए रौद्र और लज्जा से मां का नाम हिंगलाज पड़ गया. ऐसा कहा जाता है इस शक्तिपीठ की यात्रा चारधाम की यात्रा करने के समान है. जिस तरह जीवन में एक बार प्रयाग के संगम में स्नान, गंगा में तर्पण की तीर्थ यात्रा और चारधाम के दर्शन जरूरी हैं. उसी तरह हिंगलाज भवानी के दर्शन भी अनिवार्य हैं.
श्री दुर्गा चालीसा में भी जिक्र
मां हिंगलाज भवानी का जिक्र श्री दुर्गा चालीसा में भी होता है. इसमें कहा गया है कि हिंगलाज भवानी माता की महिमा का बखान नहीं किया जा सकता. (हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥)
पौराणिक कथा
दक्ष प्रजापति भगवान शिव को बिल्कुल पसंद नहीं करते थे. सती के पिता दक्ष प्रजापति ने जब उनके पति भगवान शिव का तिरस्कार किया तो वो इसे बर्दाश्त नहीं कर पाईं. और यज्ञ में कूदकर खुद को नष्ट कर लिया. तब भगवान शिव सुध-बुध खो बैठे और देवी सती का मृत शरीर लेकर तीनों लोकों में भटकने लगे. महादेव को इस व्यथा से बाहर लाने के लिए विष्णु ने सुदर्शन चक्र चलाया, जिससे सती के शरीर के 51 टुकड़े होकर पृथ्वी पर अलग-अलग जगह गिर गए.
मान्यता है कि सती के ये अंग जिन स्थानों पर गिरे, वही शक्तिपीठ कहलाए. देवी सती के सिर का पिछला हिस्सा हिंगोल नदी के तट पर चंद्रकूट पर्वत पर गिरा था. इसी जगह पर आज हिंगलाज भवानी का शक्तिपीठ स्थापित है. संस्कृत में सिंदूर के लिए हिंगुला शब्द प्रयोग होता है. यही वजह है कि सुहागन महिलाओं में इस शक्तिपीठ को लेकर बड़ी मान्यता है.
बलोच लोग करते हैं देखभाल
पाकिस्तीन के बलूचिस्तान प्रांत के इस शक्तिपीठ की देखभाल स्थानीय बलोच करते हैं. इस शक्तिपीठ को लेकर उनमें भी गहरी आस्था है. वो इसे एक चमत्कारी और पवित्र स्थल ही मानते हैं. वैसे तो यह पवित्र स्थल सदियों आदिकाल से है. लेकिन इतिहासकार यहां मौजूद मंदिर को करीब 2000 साल पुराना बताते हैं. यहां एक गुफा में देवी पिंडी स्वरूप में विराजमान हैं. सिंध और कराची प्रांत से भी हजारों हिंदू यहां देवी के दर्शन करने आते हैं.
राजेश रजक