Bheswa Mata Mandir: देवी का अनोखा मंदिर, जहां उल्टा स्वस्तिक बनाने से पूरी होती है मनोकामना

मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के भेसवा गांव में स्थित भैंसवा माता शक्तिपीठ पर निसंतान दंपति उल्टा स्वस्तिक बनाकर संतान की कामना करते हैं. मुराद पूरी होने पर श्रद्धालु मंदिर में पालना चढ़ाते हैं. नवरात्र के दौरान यहां बड़ी संख्या में भक्त दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं.

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मध्य प्रदेश स्थित इस सिद्ध शक्ति पीठ के दर्शन करने लोग दूर-दूर से आते हैं. (Photo: ITG) मध्य प्रदेश स्थित इस सिद्ध शक्ति पीठ के दर्शन करने लोग दूर-दूर से आते हैं. (Photo: ITG)

पंकज शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 24 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 10:20 PM IST

मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के गांव भेसवा में भैंसवा माता का सिद्ध शाक्तिपीठ है. मान्यता है कि जो भी निसंतान दंपति यहां आकर उल्टा स्वस्तिक बनाते हैं, माता उनकी मनोकामना जरूर पूरी करती हैं. गांव के लोग बताते हैं कि जब लोगों की मुराद पूरी हो जाती है तो वो बच्चों का पालना लेकर आते हैं और मंदिर में अर्पित करते हैं. आज भी आपको मंदिर में बहुत सारे पालने टंगे हुए दिख जाएंगे. नवरात्र पर्व के चलते यहां पर बहुत बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं.

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देश-विदेश में प्रसिद्ध इस सिद्ध शाक्तिपीठ में इन दिनों 108 कुंडीय शतचंडी यज्ञ चल रहा है, जिसमें 540 लोग जन कल्याण की भावना से शामिल हुए हैं. इस सात मंजिला यज्ञ मंडप की परिक्रमा कर हजारों लोग पुण्य कमा रहे हैं. यहां बड़े स्तर पर बनाए गए पंडालों की रोशनी से पूरा इलाका जगमगा रहा है. भैंसवा माता के इस सिद्ध शक्तिपीठ में सालों से मेला भी लगता आ रहा है. जहां लोग दूर-दूर से आकर देवी का आशीर्वाद लेते हैं.

नवरात्र के पावन दिनों में मां की पालकी भी गांव भैंसवा में निकाली जाती है. करीब दो दशक पहले यहां पहाड़ी पर माता का छोटा सा मंदिर ही था. लेकिन मंदिर ट्रस्ट के प्रयासों के चलते आज इस जगह का स्वरूप ही बदल गया है.

उल्टा स्वस्तिक बनाने से पूरी होती है मनोकामना (Photo: ITG)

मंदिर की पौराणिक कथा
किंवदंती है करीब 600 साल पहले इस इलाके में लाखा नाम का बंजारा अपने मवेशियों को चराने के लिए लेकर आता था. तब यहां घना जंगल था. शेर-चीते सहित कई खूंखार जानवर थे. कहते हैं कि एक दिन लाखा को जंगल में एक नन्ही सी बच्ची मिली. लाखा के पास कोई संतान नहीं थी. इसलिए उसने उस बच्ची को अपनी संतान समझकर पाला. बच्ची का नाम बीजासन रखा. बीजासन जब बड़ी हुई तो वो भी अन्य चरवाहों की तरह जंगल जाने लगी.

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कहते हैं कि पहाड़ी पर बीजासन जहां भी ओम-ओम कहती, वहीं पानी उत्पन्न हो जाता है. इस बारे में जब लाखा बंजारे को पता चला तो वो पहाड़ी पर एक पेड़ के ऊपर छिप के बैठ गया. बीजासन जब वहां पहुंची और उसने स्नान करने के लिए वस्त्र उतारे तो उसकी नजर लाखा पर पड़ गई. कन्या उसी क्षण धरती में समा गई. इस जगह को आज दूध तलाई के नाम से जाना जाता है. कहते हैं कि बाद में पहाड़ी पर उसी जगह माता का स्थान प्रकट हुआ.

मान्यता है कि जब किसी नवजात शिशु की माता को दूध नहीं आता है तो वो दूध तलाई के जल से ब्लाउज भिगोकर पहनती है. देवी की चमत्कारी ऐसा है कि बच्चे की मां को दूध आने लगता है. इसके अलावा, जिन लोगों को संतान की प्राप्ति नहीं होती है. अगर वो देवी के मंदिर जाकर वहां उल्टा स्वस्तिक बनाते हैं तो उनकी मनोकामना पूरी हो जाती है. आज देश-विदेश से लोग यहां आते हैं और भैंसवा माता का आशीर्वाद लेकर जाते हैं.

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