अरावली की परिभाषा पर फिर मंथन, 100 मीटर नियम पर रोक जारी, अवैध खनन पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख

सुप्रीम कोर्ट ने अवैध खनन रोकने के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति बनाने का संकेत दिया है और राजस्थान में जारी खनन पट्टों और पेड़ कटाई पर सख्त टिप्पणी की है. कोर्ट ने वन और अरावली की परिभाषा अलग रखने और पर्यावरण संरक्षण के लिए कड़े कदम उठाने पर जोर दिया है. अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी.

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अरावली संरक्षण के लिए सुप्रीम कोर्ट बनाएगा हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी अरावली संरक्षण के लिए सुप्रीम कोर्ट बनाएगा हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 21 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:26 PM IST

अरावली क्षेत्र में खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अहम सुनवाई करते हुए साफ कहा कि अवैध खनन एक गंभीर अपराध है और इसके पर्यावरणीय असर भयानक और अपूरणीय हो सकते हैं. कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद तय की है और तब तक केंद्र व संबंधित राज्यों को अपनी-अपनी रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है.

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शुरुआती चिंता के बिंदु सामने आए: CJI

सुनवाई की शुरुआत में मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) से कहा कि कोर्ट ने प्रथम दृष्टया कुछ गंभीर चिंता के क्षेत्र चिन्हित किए हैं और इन पर केंद्र सरकार की सहायता की आवश्यकता है.
CJI ने स्पष्ट किया कि यह कोई विरोधात्मक मुकदमा नहीं है, बल्कि उद्देश्य समस्या की जड़ तक पहुंचना है. इसी क्रम में कोर्ट ने एमिकस क्यूरी को एक विस्तृत नोट दाखिल करने को कहा और स्पष्ट किया कि तब तक पहले से लागू व्यवस्थाएं जारी रहेंगी.

राजस्थान में अब भी कट रहे पेड़, दिए जा रहे खनन पट्टे

राजस्थान के किसानों की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि जस्टिस ओका की 2024 की पीठ के आदेशों के बावजूद राज्य में खनन पट्टे दिए जा रहे हैं और पेड़ों की कटाई जारी है.

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इस पर CJI ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि हमारे आदेश बिल्कुल साफ हैं. दुर्भाग्य से अवैध खनन और भ्रष्टाचार मौजूद है. राज्य को अपनी मशीनरी हरकत में लानी होगी. अवैध खनन हर हाल में रोका जाना चाहिए, यह एक अपराध है.

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि यदि कहीं अवैध खनन की जानकारी है तो उसकी प्रतिनिधि शिकायत ASG कार्यालय में दी जाए. साथ ही कोर्ट ने साफ किया कि जब मामला पहले ही सुओ मोटो लिया जा चुका है, तो नई रिट याचिकाओं से बचा जाए ताकि सुनवाई भटके नहीं.

स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति बनाने की जरूरत

ASG ने कोर्ट को बताया कि केंद्रीय सशक्त समिति (CEC), एमिकस क्यूरी की सहायता करेगी. इस पर CJI ने कहा कि अब जरूरत है कि वन, खनन, पर्यावरण और अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञ एक साथ काम करें.

कोर्ट ने संकेत दिया कि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष विशेषज्ञ समिति बनाई जाएगी, जो इस पूरे मसले पर कोर्ट की सीधी निगरानी में काम करेगी, ताकि सभी पहलुओं पर समग्र दृष्टि से विचार हो सके.

100 मीटर नियम पर रोक जारी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अरावली को लेकर पहले दिए गए उस आदेश पर लगी रोक जारी रहेगी, जिसमें 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली मानने की बात कही गई थी. कोर्ट ने दोहराया कि अरावली जैसे संवेदनशील पर्यावरणीय क्षेत्र में किसी भी तरह की लापरवाही भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों पर सीधा असर डालती है.

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अरावली की परिभाषा पर उठे कानूनी सवाल

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि अरावली पर्वतमाला को सख्ती से परिभाषित नहीं किया जा सकता, क्योंकि भूगर्भीय रूप से इसमें उप-टेक्टॉनिक संरचनाएं भी शामिल हैं. उन्होंने इस मुद्दे पर प्रारंभिक सुनवाई की मांग की. इस पर CJI ने कहा कि यदि एमिकस या केंद्र से कोई अहम पहलू छूट गया है, तो उस पर सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश

सभी पक्ष विस्तृत नोट दाखिल करें
एमिकस और सरकार पर्यावरण, वन और खनन विशेषज्ञों के नाम सुझाएं
प्रस्तावित विशेषज्ञ समिति कोर्ट की सीधी निगरानी में काम करेगी
राजस्थान सरकार यह सुनिश्चित करे कि अवैध खनन तुरंत रोका जाए
दिसंबर में दिया गया पिछला आदेश अगले निर्देश तक लागू रहेगा

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि ‘वन’ और ‘अरावली’ की परिभाषाओं को अलग-अलग रखा जाएगा. जहां ‘वन’ की परिभाषा व्यापक होगी, वहीं ‘अरावली’ को संकीर्ण दायरे में देखा जाएगा. 

एमिकस क्यूरी के. परमेश्वर को चार हफ्तों में विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है. मामले की अगली सुनवाई अब चार सप्ताह बाद होगी. सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दोहराया कि अवैध खनन को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसके पर्यावरणीय प्रभाव को पलटना लगभग असंभव होता है.

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