लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पास हो चुका है. महिला सशक्तिकरण और समाज में महिलाओं को बराबरी का हक दिलाने में इस आरक्षण की बड़ी भूमिका होगी. एक तरफ राजनीति में महिलाओं की सक्रियता बढ़ेगी, तो दूसरी तरफ संसद में संख्या बल बढ़ने से वो अपने हक की आवाज बुलंद कर सकेंगी. निश्चित तौर पर इसे क्रांतिकारी और ऐतिहासिक निर्णय कहा जा सकता है. लेकिन वहीं कुछ सियासी दल महिला आरक्षण में जातिगत कोटे की मांग करके इस बिल के व्यापक उद्देश्य पर पानी फेरने की कोशिश कर रहे हैं. प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस का कहना है कि इसमें ओबीसी और दलित महिलाओं के लिए अलग से कोटे का प्रावधान होना चाहिए. कुछ अन्य विपक्षी दल सपा प्रमुख अखिलेश यादव और लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने तो अल्पसंख्यक कोटे तक की मांग कर दी है.
महिलाओं को मिलने वाले इस हक को अब जाति-धर्म के चश्मे से देखा जा रहा है. जाहिर तौर पर राजनीति हो रही है. लेकिन यहां सभी भूल गए हैं कि महिलाओं की कोई जाति नहीं होती. महिलाओं पर अत्याचार करने वाले, शोषण करने वाले, उनका हक मारने वाले, दोयम दर्जे का समझने वाले, जाति देखकर ऐसा नहीं करते. उनके लिए तो उसका औरत होना काफी होता है. आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, जहां महिला सशक्तिकरण की पुरजोर वकालत की जाती है, लेकिन नजर घुमाकर देखिए क्या सच में महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिल चुका है? क्या सच में महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं? हां, कोशिश जरूर कर रही हैं, लेकिन अभी उन्हें इंसाफ नहीं मिला है. सिनेमा को समाज का आईना कहा जाता है. कई फिल्में हैं, जिनमें महिलाओं की वास्तविक स्थिति समझी जा सकती है.
सोनचिड़िया: 'औरतों की जाति सबसे परे, सबसे नीच है'
साल 2019 में एक फिल्म आई थी, 'सोनचिड़िया'. अभिषेक चौबे के निर्देशन में बनी इस फिल्म में सुशांत सिंह राजपूत और भूमि पेडनेकर लीड रोल में हैं. इस फिल्म को कई नजरिए से देखा गया. किसी ने इसमें चंबल और डाकू देखा, तो किसी ने पुलिसिया मुठभेड़. लेकिन सही मायने में ये फिल्म महिला सशक्तिकरण की हकीकत बयान करती है. इसमें एक सीन है, जिसमें बैंडिट क्वीन फूलन देवी का किरदार कर रही सम्पा मंडल इंदूमति तोमर का किरदार कर रही भूमि पेडनेकर से पूछती हैं कि रेप पीड़ित बच्ची को अस्पताल पहुंचाने के बाद वो कहां जाएगी, उसका पति तो उसे मार डालेगा, ऐसे में वो उसके गैंग में क्यों नहीं भर्ती हो जाती है. इसके जवाब में मुस्कुराते हुए इंदूमति कहती है, ''तुम्हारा मल्लाहों का गैंग है. मैं ठाकुर जाति की हूं.'' इस पर फूलन देवी जोर से हंसती है. इंदूमति से कहती है, ''अभी तुम्हें बात नहीं समझ आई. ये ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया और शुद्र मर्दों की जाति होती है. औरतों की जाति अलग होती है. जो सबसे परे है. सबसे नीच है.''
'सोनचिड़िया' का संवाद भले फिल्मी है, लेकिन इसमें हमारे समाज की कड़वी सच्चाई छिपी है. निर्भया कांड के दोषियों ने क्या उसकी जाति देखकर उसके साथ गैंगरेप किया था? जेसिका लाल के हत्यारों ने क्या उसकी जाति देखकर गोली चलाई थी? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक जिन 86 महिलाओं के साथ हर रोज रेप हो रहा है, क्या उनकी जाति देखी जाती है? यदि नहीं तो, महिला आरक्षण के लिए जाति क्यों देखी जा रही है? पहले महिलाओं को समवेत रूप से आगे बढ़ाने की कोशिश की जानी चाहिए. उसके बाद जातिगत कोटे की बात न्यायसंगत हो सकती है. लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में इसकी बात बेमानी है. हमारे राजनेताओं को अपने राजनीतिक स्वार्थ से अलग हटकर इस बिल के उद्देश्य को समझना चाहिए. महिलाओं के हित के बारे में सोचना चाहिए.
लज्जा: 'जरा पूछो इनसे, सदियों से औरत सती हो रही है'
सिनेमा ने समय-समय पर समाज में महिलाओं की वास्तविक स्थिति से पर्दा हटाया है. कई फिल्मों में महिलाओं की दर्दनाक हालात बयां की गई है, तो कई में महिला सशक्तिकरण की बात कही गई है. साल 2001 में फिल्म 'लज्जा' रिलीज हुई थी. राजकुमार संतोषी के निर्देशन में बनी इस फिल्म में रेखा, माधुरी, मनीषा कोइराला, महिमा चौधरी, अनिल कपूर, अजय देवगन और जैकी श्रॉफ अहम भूमिकाओं में हैं. समाज में आज भी महिलाओं की कैसे दुर्दशा होती है, इस फिल्म में सटीक दिखाया गया है. फिल्म में चार महिला किरदारों के नाम सीता जी के नाम के पर्याय हैं. मैथिली, जानकी, रामदुलारी और वैदेही. इन किरदारों को मनीषा कोइराला (वैदेही), माधुरी दीक्षित (जानकी), रेखा (राम दुलारी), महिमा चौधरी (मैथिली) ने निभाया है. इन किरदारों के जरिए मेकर्स ने व्यापक संदेश देने की कोशिश की है.
अलग-अलग परिवेश, परिस्थिति और हैसियत में रहने वाली ये महिलाएं अत्याचार की शिकार हैं. वैदेही का पति पिता नहीं बन सकता. जब वो गर्भवती हो जाती है, जो चरित्र के संदेह में उसे घर से बाहर निकाल देता है. मैथिली दहेज़ लोभी लड़के वालों को घर से भगाकर शादी का मंडप छोड़कर चली जाती है. जानकी एक अविवाहित मां है. उसका प्रेमी शादी से मना कर देता है. रामदुलारी गांव की दाई हैं. लेकिन गांव के गुंडों वीरेंद्र और गजेंद्र का विरोध करती है, क्योंकि वो महिलाओं का शोषण करते हैं. इस तरह हर किरदार समाज में रहने वाली पीड़ित महिलाओं का प्रतिनिधित्व करता है. उनकी हकीकत बताता है. इसके साथ ही महिला सशक्तिकरण का संदेश भी देता है कि ये सभी महिलाएं अपने साथ होने वाले अत्याचार को सहने की बजाए उनका सामना करती हैं. उनका विरोध करती हैं.
सच में महिलाओं की स्थिति पहले के मुकाबले बदल गई है?
ये तो फिल्मी कहानियां हैं, जो हमारे समाज से निकलकर सिनेमा में आई हैं. हो सकता है कि मेकर्स ने क्रिएटिव लिबर्टी के नाम पर कुछ ऐसी बातें दिखाई हो, जो सच्चाई से परे है. लेकिन क्या हम इस सच से मुंह मोड़ सकते हैं, क्या हम इसे दरकिनार सकते हैं? आज भी महिलाएं अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रही हैं. नौकरी पेशा होते हुए भी परिवार की सारी जिम्मेदारी वैसे ही सम्भाल रही हैं. सच कहें तो अब उनके ऊपर दोहरा दबाव है. परिवार और कर्म क्षेत्र दोनों का. आज भी उनका परिवार और पति उनके साथ वैसा ही व्यवहार कर रहा है, जैसे पहले होता आया है. ऐसे में उनके लिए परिस्थिति बदली कहां है. बल्कि जिम्मेदारी पहले से ज्यादा बढ़ गई है. ये हर जाति और धर्म की महिलाओं का हाल है. देश और सरकार को सबसे पहले इस पर जरूर सोचना चाहिए. आरक्षण कितना सहायक होगा, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा.
फिल्म 'लज्जा' के दो डायलॉग, झकझोर देने वाले हैं...
- सब मर्द एक जैसे होते हैं. जो बात इनके कानों को अच्छी लगे, जो बात इनके मन को रिझाए, वही बोलते रहो, तो सिर पर बिठाकर पूजा करेंगे. कहेंगे देवी है. थोड़ी सी अपनी मन की बात कह दी, तो कहेंगे कि कुल्टा है. दरिद्रहीन है. शोर मचा रहे हैं, समाज के ठेकेदार. जरा पूछो, जरा पूछो इनसे, सदियों से औरत सति होती आ रही है. कभी कोई मर्द कूदा है आग में अपनी औरत के लिए. पूछो कोई करवाचौथ बना है, इनके लिए. पाखंडी कहीं के.
- रोटी कमाने के लिए औरत घर से निकली नहीं कि तनख्वाह देने वाला हर आदमी उसे अपने बाप का माल समझने लगता है.
क्या इन डायलॉग को फिल्मी माना जा सकता है? समाज की यही विकृत हकीकत है. महिलाओं के जो हालात हैं वो जात-पात से परे हैं. फिलहाल जरूरत है उनके संगठित होकर आगे आने की. हमारे समाज की आधी आबादी को देश के लिए फैसला लेने में अभी तक बराबरी का हक नहीं मिला था. अब जब मौका आया है, तो इसमें जाति के नाम पर ही सही, किंतु-परंतु नहीं होना चाहिए.
मुकेश कुमार गजेंद्र