नरवणे की किताब ‘Four Stars of Destiny’ क्यों अप्रकाशित रह गई, राहुल गांधी की सुई उसी पर क्यों अटकी?

लोकसभा में बजट सत्र के दौरान सोमवार को बहस तो राष्ट्रपति के अभिभाषण पर होने थी, लेकिन राहुल गांधी ने जब पूर्व सेना अध्यक्ष मनोज नरवणे की अप्रकाशित किताब का जिक्र किया तो माहौल जंग की तरह हो गया. गलवान घाटी संघर्ष से जुड़ी जानकारियों को लेकर कांग्रेस हमलावर है. भाजपा के अपने पलटवार हैं. दिलचस्प है इस विवाद को नियमों के दायरे में देखना.

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पूर्व सेनाध्यक्ष मनोज नरवणे की अप्रकाशित किताब पर राहुल गांधी का बवाल नियमों की भेंट चढ़ गया. (Images: PTI, X) पूर्व सेनाध्यक्ष मनोज नरवणे की अप्रकाशित किताब पर राहुल गांधी का बवाल नियमों की भेंट चढ़ गया. (Images: PTI, X)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 03 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 11:48 AM IST

संसद के बजट सत्र के दौरान सोमवार को लोकसभा में अचानक ऐसा हंगामा खड़ा हो गया, जिसने एक अप्रकाशित किताब को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया. यह किताब किसी राजनेता की नहीं, बल्कि पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की है. राहुल गांधी द्वारा संसद में इस किताब का हवाला दिए जाने पर सरकार ने कड़ा ऐतराज जताया और स्पीकर को हस्तक्षेप करना पड़ा. सवाल उठने लगे कि आखिर यह किताब प्रकाशित क्यों नहीं हो सकी और उस पर चर्चा करना नियमों का उल्लंघन कैसे हो गया.

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नरवणे की किताब क्या है और इसमें क्या लिखा है?

जनरल नरवणे की किताब का नाम ‘Four Stars of Destiny’ है. जिसमें उन्होंने अपने संस्मरण लिख हैं. सैन्य जीवन के अनुभवों के साथ-साथ 2020 के भारत-चीन सीमा तनाव, पूर्वी लद्दाख में हुए मिलिट्री एक्शंस, सरकार और सेना के बीच डिसीजन मेकिंग प्रोसेस और रणनीतिक सोच का जिक्र है. दिसंबर 2023 में इसके कुछ अंश मीडिया में प्रकाशित हुए थे, जिनमें यह संकेत मिला कि चीन के साथ टकराव के दौरान हालात उतने नियंत्रण में' नहीं थे, जितना आधिकारिक तौर पर बताया गया. यही अंश इस किताब को संवेदनशील बना देते हैं, क्योंकि वे सीधे-सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक निर्णयों से जुड़े माने गए.

किताब अब तक प्रकाशित क्यों नहीं हो पाई? क्या कहते हैं नियम-प्रावधान

(A) Army Rules, 1954 के Section 21 के तहत सेना से जुड़े विषयों (service subject) या सुरक्षा मामलों पर कोई सामग्री प्रकाशित नहीं की जा सकती. कोई भी सेना-संबंधी जानकारी प्रेस को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में बताई या प्रकाशित नहीं हो सकती. बिना केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के ऐसी कोई भी किताब या लेख प्रकाशित नहीं हो सकता. यहां ‘service information‘ में वे बातें आती हैं जो सशस्त्र बलों की रणनीति, नीति, संचालन या सेना और सरकार के बीच निर्णय प्रक्रियाओं से जुड़ी जानकारी हो. ये सब सेना नियमों के तहत आते हैं.

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(B) Retired कर्मचारियों पर नियम- Army Rules खुलकर यह नहीं बताते कि सेवानिवृत्त अधिकारी कैसे प्रकाशित कर सकते हैं, पर भारतीय सरकार के कुछ नियम (जैसे Central Civil Services Pension Rules, 1972 में बदलाव) यह कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति सुरक्षा/इंटेलिजेंस/सुरक्षा-सम्बंधित जानकारी प्रकाशित करना चाहता है, तो उसे पूर्व अनुमति लेनी चाहिए. खासकर ऐसे मामलों में जहां न केवल व्यक्तिगत अनुभव, बल्कि देश की रक्षा नीति या निर्णय प्रक्रियाएं शामिल हों. 

इसलिए किताब की रिलीज़ दो साल से लंबित है, क्योंकि मूलतः पब्लिशर ने प्रकाशन के लिए MoD/सरकार से अनुमति मांगी है. पर समीक्षा लंबी चल रही है. न तो अनुमति मिली, न किताब बाजार में आई. यही कारण है कि यह ‘अप्रकाशित‘ बनी हुई है.

संसद में राहुल गांधी ने क्या कहा और विवाद कैसे शुरू हुआ?

लोकसभा में बोलते हुए राहुल गांधी ने भारत-चीन सीमा विवाद पर सरकार के दावों को चुनौती दी और कहा कि पूर्व सेना प्रमुख की किताब में ऐसे तथ्य हैं जो आधिकारिक बयान से मेल नहीं खाते. उन्होंने उसी किताब के अंशों का हवाला देने की कोशिश की, जो अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है. यहीं से विवाद शुरू हुआ. सत्ता पक्ष ने आपत्ति जताई कि किसी अप्रकाशित पुस्तक या अप्रमाणित स्रोत को संसद के रिकॉर्ड में नहीं लाया जा सकता. रक्षा मंत्री और गृह मंत्री दोनों ने इसे संसदीय नियमों का उल्लंघन बताया. स्पीकर ओम बिरला ने व्यवस्था दी कि राहुल गांधी अप्रकाशित किताब या उससे संबंधी किसी लेख के हवाले से कुछ नहीं कहेंगे. हंगामे के बाद संसद की कार्यवाही शाम 4 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई. जब दोबारा लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई तो एक बाद राहुल गांधी की सुई नरवणे की किताब पर अटक गई. वे बार बार उसका जिक्र करना चाह रहे थे. लेकिन तब लोकसभा की कार्यवाही का संचालन कर रहे जगदंबिका पाल ने उन्हें रोका और आखिर सदन मंगलवार तक के लिए स्थगित कर दिया.

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सरकार और स्पीकर के तर्क तो राहुल के आड़े आ गए?

संसद के रूल बुक में दिए गए नियम 349 (1) के मुताबिक किसी बुक, न्यूज पेपर या बुक को तब तक नहीं पढ़ा जा सकता जब तक कि उसका संसद की प्रक्रिया से संबंध न हो. इसी तरह नियम 349 (16) के मुताबिक कोई साहित्य, पेम्फ्लेट आदि, संसद में नहीं वितरित किया जा सकता, जब तक कि उसका संसद की कार्यवाही से संबंध न हो. 

जबकि, नियम 353 सांसदों को ऐसे आरोप लगाने से रोकता है जिससे किसी की मानहानि हो. यदि कोई सांसद ऐसे आरोप लगाना चाहता है तो उसे स्पीकर से पहले अनुमति लेना होगी.

सरकार की ओर से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू का तर्क सीधा था कि संसद में केवल वही सामग्री उद्धृत की जा सकती है, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध, प्रकाशित और सत्यापित हो. चूंकि नरवणे की किताब आधिकारिक तौर पर प्रकाशित नहीं हुई है, इसलिए उसका हवाला देना संसदीय परंपरा और प्रक्रिया के खिलाफ है. तमाम पक्षों को सुनने के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने भी यही कहा कि संसद का रिकॉर्ड किसी ऐसी सामग्री पर आधारित नहीं हो सकता, जो न तो आधिकारिक है और न ही सार्वजनिक रूप से उपलब्ध. इसी आधार पर राहुल गांधी को आगे उद्धरण देने से रोका गया और सदन में शोर-शराबा बढ़ गया.

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विपक्ष का आरोप क्या है?

कांग्रेस और विपक्ष का कहना है कि यह सिर्फ नियमों का मामला नहीं है, बल्कि सूचना को दबाने का प्रयास है. विपक्ष का आरोप है कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर उन तथ्यों को सामने आने से रोक रही है, जो 2020 के चीन विवाद में सरकार की भूमिका पर सवाल खड़े करते हैं. राहुल गांधी ने यह भी कहा कि अगर किताब में कुछ भी गलत या खतरनाक है, तो सरकार उसे सार्वजनिक करके बहस के लिए सामने लाए, लेकिन उसे वर्षों तक रीव्यू के नाम पर रोके रखना संदेह पैदा करता है. लोकसभा से बाहर निकलते हुए मोदी सरकार पर चीन के सामने कायरता दिखाने का आरोप लगाया.

नरवणे के बयानों से बीजेपी का राहुल पर काउंटर अटैक

बीजेपी के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने X पर पूर्व सेना प्रमुख के एक के बाद एक पुराने तीन वीडियो क्लिप साझा किए, जिनमें नरवणे साफ कहते दिखाई देते हैं कि भारत ने चीन के सामने अपनी जमीन का ‘एक इंच भी नहीं खोया‘. और हमारी सेनाओं ने दृढ़ता से डोकलाम/लद्दाख की स्थिति संभाली. इस रणनीति के जरिये BJP ने राहुल गांधी के ‘सरकार ने पीछे हटने” जैसे आरोपों को काउंटर किया है. इस सियासी टक्कर में BJP ने राहुल गांधी पर भ्रामक और अधूरा हवाला देने और संसद का समय बर्बाद करने का आरोप लगाए.

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क्या यह किताब सच में बैन है?

सरकारी तौर पर इस किताब पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाया गया है. न ही ऐसा कोई आदेश मौजूद है, जिसमें कहा गया हो कि किताब प्रकाशित नहीं हो सकती. तकनीकी रूप से यह किताब ‘बैन‘ नहीं है, बल्कि सरकारी समीक्षा और अनुमति की प्रक्रिया में फंसी हुई है. यही फर्क इस पूरे विवाद को जटिल बनाता है.

पहले भी क्या सैन्य अधिकारियों की किताबें छपी हैं?

भारत में पहले भी कई पूर्व सेना प्रमुखों और वरिष्ठ अधिकारियों की किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. जिनमें पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक और जनरल वीके सिंह की किताबें शामिल हैं. फर्क यह रहा है कि उनमें या तो रणनीतिक विवरण सीमित थे, या वे पूरी तरह आत्मकथाएं थीं. नरवणे की किताब को लेकर समस्या यह मानी जा रही है कि उसमें हालिया और संवेदनशील सैन्य-राजनीतिक घटनाओं का सीधा उल्लेख है.

यह विवाद क्यों अहम है?

यह विवाद सिर्फ एक किताब या एक भाषण का नहीं है. यह सवाल उठाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक पारदर्शिता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए. क्या सेना के अनुभव जनता से पूरी तरह साझा किए जा सकते हैं? क्या सरकार समीक्षा प्रक्रिया का इस्तेमाल असहज सवालों को टालने के लिए कर सकती है? और क्या संसद में नियमों का उपयोग राजनीतिक बहस को सीमित करने के लिए हो रहा है?

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आगे क्या?

सोशल मीडिया पर बहस जारी है. दरअसल, यह गलवान घाटी के संघर्ष का सच जानने से ज्यादा नैरेटिव वॉर में अपना पक्ष मजबूत करने की सियासी लड़ाई है. सोमवार को बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा करते हुए भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने यूपीए दौर की कमजोरियों का हवाला देते हुए यह कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने बताया है कि देशभक्ति क्या होती है, तो इसी पर राहुल गांधी उखड़ गए. अब यह मुद्दा नरवणे की किताब का भी नहीं है. कांग्रेस उस उलाहने का भी हिसाब बराबर करना चाहती है जिसमें 1962 के चीन युद्ध की नाकामी के लिए नेहरू को कोसा जाता है. राहुल गांधी का नरवणे की अप्रकाशित किताब पर अटके रहना बता रहा है कि वे यह साबित करना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी भी गलवान संघर्ष के दौरान फैसले नहीं ले पा रहे थे.

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