असमिया पहचान असम के निवासियों की सांस्कृतिक, भाषाई और जातीय पहचान है, जो सदियों की मिश्रित परंपराओं से बनी है. यह आर्यन, मंगोलॉइड, इंडो-बर्मीज और इंडो-ईरानी समुदायों के मेल से विकसित हुई, जहां असमिया भाषा मुख्य बंधन है. इतिहासकारों के अनुसार, यह वैदिक और पूर्व-वैदिक संस्कृति से जुड़ी है, जो अहोम साम्राज्य के दौर में मजबूत हुई. ब्रिटिश काल में 'असमिया' नाम और राष्ट्रवाद उभरा, जो अब गमोसा, जापी, तमुल-पान और मेखला चादोर जैसे प्रतीकों में झलकता है.
पीएम नरेंद्र मोदी के अनुसार, यह पहचान कांग्रेस की नीतियों से खतरे में है. उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने वोट बैंक के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों को संरक्षण दिया, जिससे असम की भूमि, जंगल और सांस्कृतिक स्थलों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया . मोदी ने कहा कि कांग्रेस ने असम की डेमोग्राफी बदलने की साजिश की, जहां घुसपैठिए असमिया संस्कृति, रोजगार और सुरक्षा को नुकसान पहुंचाते हैं. उन्होंने असम अकॉर्ड (1985) को लागू न करने का जिक्र किया, जो विदेशियों की पहचान और निर्वासन के लिए था, लेकिन कांग्रेस के शासन में लापरवाही से घुसपैठ बढ़ी. घुसपैठियों से असम की भूमि मुक्त कराने के लिए रही मोदी ने असम की भाजपा सरकार की तारीफ की. हालांकि विपक्ष सरकार के इस कार्य को सांप्रदायिक बताता है. यह बहस असम की राजनीति का केंद्र है, जहां असमिया पहचान का संरक्षण और विकास के बीच संतुलन जरूरी है.
असमिया भाषाई पहचान असम की सांस्कृतिक रीढ़ है, जो इंडो-आर्यन भाषा परिवार से जुड़ी है और सदियों से विकसित हुई. 12वीं शताब्दी से पहले यह आर्यन और स्थानीय जनजातीय भाषाओं के मिश्रण से बनी, जो अहोम काल में 'असमिया' के रूप में स्थापित हुई.
अंग्रेजों ने 1836 में असमिया भाषा को सरकारी कामकाज से हटाकर बंगाली भाषा को थोप दिया था, जिसे असमिया भाषा का अंधकार युग कहा जाता है; हालांकि, मिशनरियों और स्थानीय लोगों के प्रयासों के कारण, अंग्रेजों ने 1873 में इसे फिर से आधिकारिक भाषा के रूप में बहाल कर दिया, और 1874 में असम को बंगाल से अलग कर मुख्य आयुक्त प्रांत बनाया गया.
ब्रिटिश काल में यह राष्ट्रीयता का प्रतीक बनी, लेकिन आज यह संकट में है. दर जनगणना डेटा दिखाता है कि असमिया बोलने वाले 48% हैं, लेकिन बंगाली, हिंदी और अन्य भाषाओं का प्रभाव बढ़ रहा है. पीएम मोदी के अनुसार, कांग्रेस की वजह से यह खतरा बढ़ा. उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने घुसपैठियों को वोट बैंक बनाया, जो बांग्लादेश से आए और असम की भाषाई बहुलता को प्रभावित किया.
2011 की जनगणना में मुस्लिम आबादी 34% थी, जो 1971 में 24% थी. भाषाई बदलाव का मूल कारण जनसांख्यिकीय बदवाव से जुड़ा है. घुसपैठ से बंगाली का प्रभुत्व बढ़ा, खासकर निचले असम में, जहां असमिया स्कूलों में गिरावट आई. कांग्रेस के शासन में असम अकॉर्ड का भाषाई संरक्षण हिस्सा लागू नहीं हुआ, जिससे जनजातीय भाषाएं प्रभावित हुईं. भाजपा सरकार ने असमिया को आधिकारिक भाषा बनाने के प्रयास किए, लेकिन चुनौतियां बनी हुई हैं.
लैंड एनक्रोचमेंट से भाषाई समुदायों में टकराव बढ़ा, और सीएए-एनआरसी ने भाषाई विभाजन को उजागर किया. असम साहित्य सभा जैसे संगठन भाषा संरक्षण की मांग करते हैं, लेकिन राजनीतिक वोट बैंक ये संभव नहीं हुआ. समाधान के लिए शिक्षा और नीतिगत हस्तक्षेप जरूरी है, वरना असमिया पहचान और कमजोर हो सकती है.
2-धार्मिक पहचान का संकट
असम की धार्मिक पहचान विविध है, जहां हिंदू (61%), मुस्लिम (34%) और अन्य समुदाय हैं. यह शंकरदेव के भक्ति आंदोलन से प्रभावित है, जो वैष्णववाद और जनजातीय रीति-रिवाजों का मिश्रण है. लेकिन धार्मिक संकट डेमोग्राफिक बदलाव से उभरा, जहां मुस्लिम आबादी की वृद्धि को घुसपैठ से जोड़ा जाता है. 1951 से 2011 तक मुस्लिम पॉपुलेशन 34% हो गया, जबकि हिंदू घटते गए. मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उन्होंने वोट बैंक के लिए घुसपैठियों को संरक्षण दिया, जो असम की धार्मिक पहचान को खतरे में डालता है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने जंगलों और सत्रों (धार्मिक स्थलों) को कब्जा होने दिया, जिससे हिंदू-जनजातीय संस्कृति प्रभावित हुई. 2021-2025 के बीच राज्य में मुस्लिम आबादी 38% तक पहुंच गई है. जो भाजपा को 'असमिया पहचान' के लिए खतरा लगती है. कांग्रेस के दौर में असम आंदोलन (1979-85) धार्मिक विभाजन से जुड़ा, लेकिन अकॉर्ड लागू न होने से समस्या बढ़ी.
भाजपा ने एविक्शन ड्राइव से 1.5 लाख बीघा भूमि मुक्त की, लेकिन विपक्ष इसे मुस्लिम-विरोधी बताता है. धार्मिक संकट में सीएए का मुद्दा प्रमुख है, जो गैर-मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता देता है, लेकिन मुस्लिमों को बाहर रखता है. इससे असम में हिंदू-मुस्लिम तनाव बढ़ा है. जनजातीय समुदायों में ईसाईकरण भी मुद्दा है, जहां मिशनरी गतिविधियां स्थानीय परंपराओं को चुनौती देती हैं.
3-जनजातियों की अपनी शिकायत
असम की जनजातियां बोरो, मिसिंग, कार्बी, दिमासा आदि राज्य की कुल आबादी की 15% हैं. जिनकी शिकायतें भूमि, संस्कृति और प्रतिनिधित्व से जुड़ी हैं. वे असमिया पहचान का हिस्सा हैं, लेकिन मुख्यधारा से अलगाव महसूस करती हैं. मुख्य शिकायत घुसपैठ से भूमि कब्जा होने का है. जहां बांग्लादेशी प्रवासी जनजातीय क्षेत्रों में घुसे, जिससे रोजगार और संसाधन उनसे छिनते गए.
2011 जनगणना में जनजातीय आबादी की हिस्सेदारी स्पष्ट रूप से कम होती दिखती है. जिसका मूल कारण इन्फिल्ट्रेशन से जुड़ा है. मोदी ने कहा कि कांग्रेस ने जनजातीय क्षेत्रों में जानबूझकर भूमि कब्जा होने दिया, जो उनकी संस्कृति को नुकसान पहुंचाता है. असम अकॉर्ड में जनजातीय संरक्षण का वादा था, लेकिन कांग्रेस के शासन में लागू नहीं हुआ. बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) जैसे समझौते अधर में रहे, जिससे विद्रोह बढ़ा. जनजातियां शिकायत करती हैं कि विकास योजनाएं उन्हें बाईपास करती हैं, और राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम है.
भाजपा सरकार ने बोडो पीस अकॉर्ड (2020) जैसे कदम उठाए, लेकिन एविक्शन ड्राइव से जनजातीय भूमि मुक्त होने के दावे विवादित हैं. झारखंड में जनजातीय आबादी के कम होने का उदाहरण देकर मोदी ने असम की स्थिति पर चेतावनी दी. जनजातीय संगठन जैसे ऑल असम ट्राइबल संघ भूमि अधिकार और ऑटोनॉमी की मांग करते हैं. वोट बैंक पॉलिटिक्स में जनजातियां इस्तेमाल होती हैं, लेकिन लाभ कम मिलता है. समाधान के लिए छठी अनुसूची का मजबूत क्रियान्वयन और विकास परियोजनाएं जरूरी हैं, वरना उनकी शिकायतें असम की एकता को चुनौती देंगी.
4-बांग्लादेशी घुसपैठ, और मुस्लिम आबादी का बढ़ता अनुपात, और वोटबैंक पॉलिटिक्स
बांग्लादेशी घुसपैठ असम की प्रमुख समस्या है, जो डेमोग्राफिक बदलाव और वोट बैंक पॉलिटिक्स से जुड़ी है. 1951-2011 में मुस्लिम आबादी 25% से 34% हुई, जो इन्फिल्ट्रेशन से लिंक्ड है. 2021 ट्रेंड्स में यह 38% पहुंची, जबकि हिंदू घटे हैं. घुसपैठिए भूमि कब्जा करते हैं, जो संस्कृति और सुरक्षा को प्रभावित करता है.
मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उन्होंने वोट बैंक के लिए घुसपैठियों को संरक्षण दिया, असम की डेमोग्राफी बदली. कांग्रेस ने बंगाली मुस्लिमों को वोटर बनाया, जिससे 32% विधानसभा सीटों पर प्रभाव पड़ा. 1971 के बाद लाखों घुसपैठिये असम में घुसे लेकिन वोट बैंक की पॉलिटिक्स के चलते उनका डिपोर्टेशन नहीं हो सका. भाजपा का कहना है कि कांग्रेस की अपीजमेंट पॉलिसी से जनजातीय क्षेत्र की डेमोग्रैफी प्रभावित हुई.
यूएन रिपोर्ट्स में बांग्लादेश से 10 मिलियन लोग गायब बताए जाते हैं, जाहिर है कि इसमें अधिकत भारत में घुसे लोग हैं. भाजपा सरकार बनने के बाद असम में घुसपैठियों से अवैध भूमि मुक्त कराई गई पर डिपोर्ट करने में सरकार नाकामयाब रही. केवल 1,676 लोगों को बांग्लादेश भेजने में असम सरकार सफल हुई. दुर्भाग्य यह है कि अभी भी घुसपैठ जारी है. इस समस्या के समाधान के लिए जिस तरह की बॉर्डर फेंसिंग और सख्त नीतियां बननी चाहिए थीं वह अब भी नहीं बन सकीं हैं.
5-भाजपा सरकार के सामने चुनौतियां
मोदी ने कहा कि घुसपैठ से असम की पहचान को खतरा है, और असम की भाजपा सरकार इसे रोक रही है. जाहिर है कि आने वाले विधानसभा चुनावों के पहले आइडेंटिटी पॉलिटिक्स बढ़ेगी. इंटर-रिलिजियस लैंड ट्रांसफर पर पुलिस क्लियरेंस जैसे कानूनों के चलते सांप्रदायिक तनाव चरम पर पहुंच सकता है.
सबसे बड़ी चुनौती घुसपैठ कंट्रोल है,जो अभी भी ऊंट के मुंह में जीरा है. भाजपा ने एविक्शन से भूमि मुक्त की, लेकिन 40 लाख अवैध प्रवासियों वाले राज्य में केवल 1,676 ही डिपोर्ट हुए. विपक्ष का इसे चुनावी स्लोगन बताना सही ही है , क्योंकि जब बीजेपी की डबल इंजन सरकार में अवैध प्रवासियों को बाहर करना संभव नहीं है तो इसे क्या कहा जा सकता है? असम में अभी भी डेमोग्राफिक बदलाव जारी है, मुस्लिम आबादी बढ़ रही, और जनजातीय शिकायतें बनी हुई हैं.
बांग्लादेश में रैडिकलाइजेशन का खतरा असम को प्रभावित कर सकता है. भाजपा की हिंदू पहचान पर जोर असमिया राष्ट्रवाद से टकराता है. विकास परियोजनाएं जैसे काजीरंगा कॉरिडोर सराही गईं, लेकिन पर्यावरण और जनजातीय अधिकारों पर सवाल हैं. चुनाव में कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा को चुनौती देंगी, जहां पहचान और विकास का बैलेंस जरूरी है.
संयम श्रीवास्तव