पश्चिम बंगाल का यह चुनाव महज सत्ता बदलने का चुनाव नहीं था. यह बरसों से दबे गुस्से, थकान और हताशा का महाविस्फोट था. लोगों ने सिर्फ बीजेपी को जिताने के लिए वोट नहीं दिया, बल्कि उससे कहीं ज्यादा तृणमूल कांग्रेस (TMC) को हराने के लिए बटन दबाया. जो पार्टी कभी 'परिवर्तन' की मशाल लेकर आई थी, वही आज सत्ता के अहंकार, भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी का पर्याय बन चुकी थी. इसलिए यह जनादेश आया. जनता का जनादेश. बगावत का जनादेश.
तृणमूल के खिलाफ आरोपों की फेहरिस्त बहुत लंबी है. विपक्ष बरसों से चीख रहा था कि राज्य में तुष्टीकरण की राजनीति चरम पर है लेकिन पुलिस-प्रशासन तो सत्ताधारी दल की कठपुतली बन चुके थे. पंचायत से लेकर सचिवालय तक भ्रष्टाचार हो रहा था. शिक्षक भर्ती घोटाला, कटमनी कल्चर और स्थानीय नेताओं की रातों-रात बढ़ती संपत्ति ने जनता को अंदर तक झकझोर दिया. शहरों की बात नहीं है, बंगाल के गांव-गांव में लोगों ने देखा कि कल तक जिनके पास कुछ नहीं था, वे आज अकूत संपत्ति के मालिक बन बैठे हैं.
विपक्ष यह संदेश देने में कामयाब रहा कि असल औद्योगिक विकास और नौकरियों के बजाय, 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाओं के जरिए 'वोट खरीदने' की राजनीति हो रही है. सरकारी कर्मचारियों का डीए (DA) आंदोलन और भर्ती में धांधली ने पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग को ममता सरकार के खिलाफ खड़ा कर दिया. पिछले चुनावों के दौरान हुई हिंसा, बूथ कैप्चरिंग और महिलाओं की सुरक्षा पर उठते सवालों ने जनता के मन में लोकतंत्र के प्रति अविश्वास पैदा किया. सबसे बड़ी बात, लोगों को लगने लगा कि ममता बनर्जी अब वह पुरानी 'लड़ाकू दीदी' नहीं रहीं, बल्कि उनके इर्द-गिर्द अब सिर्फ चाटुकारों और सत्ता के अहंकार का घेरा है.
बंगाल कभी राजा राममोहन राय, टैगोर और विवेकानंद जैसी महान विभूतियों की कर्मभूमि था. यह वह बंगाल है जिसने पूरी दुनिया को मानवतावाद और तर्कवाद का रास्ता दिखाया. लेकिन आज? आज के बंगाल का कलाकार और साहित्यकार सत्ता की तालियों का मोहताज हो गया है. टैगोर ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अपना 'नाइटहुड' लौटा दिया था, पर आज के बुद्धिजीवी सरकारी पुरस्कारों, कमेटियों और पद के लालच में सत्ता के गुणगान में व्यस्त हैं. जब कलम चाटुकारिता करने लगे, तो समझ लीजिए कि विचार मर चुके हैं.
धर्मनिरपेक्षता का मतलब सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार होता है, लेकिन बंगाल में इसे 'वोटबैंक' की राजनीति बना दिया गया. बांग्लादेश में हिंदुओं पर होने वाले हमले और मंदिरों में तोड़फोड़ की खबरों ने पश्चिम बंगाल के हिंदुओं के मन में कट्टरपंथ को लेकर खौफ पैदा किया. राजनीतिक फायदों के लिए कट्टरवाद को दी गई ढील ने सामाजिक संतुलन बिगाड़ दिया. एक बहुमत आबादी ने देखा कि कैसे एक समुदाय को तुष्टीकरण की रेवड़ियां दी जा रही हैं और इसका दुरुपयोग करके वो बंगाल में अराजकता पैदा करने में लगे हैं. चिंताजनक यह रहा कि सरकार इसे रोकने के बजाय इसे आश्रय देती ही नज़र आई.
चुनाव के इन नतीजों ने बंगाल को और ममता बनर्जी की सरकार को ही नहीं हिलाया है, इसकी चर्चा बांग्लादेश में भी खासी हो रही है. बांग्लादेशी कट्टरपंथियों ने इस नतीजे को 'हिंदुत्व की जीत' करार दिया है. लेकिन सच यह है कि ऐसा कहना उनकी दोहरी मानसिकता को दर्शाता है. वे अपने देश में तो शरिया और मजहबी कानून चाहते हैं, लेकिन दूसरे देशों में सेकुलरिज्म की दुहाई देते हैं.
कभी बंगाल की जनता ने वामपंथियों (CPM) को भी इसी तरह उखाड़ फेंका था, क्योंकि वे जनविरोधी हो गए थे. आज ममता सरकार भी उसी रास्ते पर है. शायद वामपंथियों से भी ज्यादा बेपरवाह और आक्रामक अंदाज में. मैं खुद इस दमनकारी राजनीति की शिकार रही हूं. सीपीएम ने मेरी किताबें बैन कीं, मुझे बंगाल से निकाला और बाद में ममता सरकार ने भी मुझे वापस नहीं आने दिया. जो समाज एक लेखक की आवाज से डरता है, वह असल में आजाद ख्यालों से डरता है. वो डरता है रचनात्मकता से, कलम की ताकत से और अभिव्यक्ति की आज़ादी उसे खतरा नज़र आने लगती है. विचारों की आजादी को गुलाम या बेदखल करनेवाली सत्ता कभी भी एक स्वस्थ लोकतंत्र और स्वस्थ सामाजिक संस्कृति खड़ा नहीं कर सकती है.
आज बंगाल के पास नया जनादेश है. सरकार बदल गई है. लेकिन सिर्फ सरकार बदलने से समाज नहीं बदलता. समाज तब बदलता है जब कलाकार बिकना बंद करें, पत्रकार निडर हों और शिक्षक निष्पक्ष रहें. बंगाल ने कभी पूरे देश को दिशा दिखाई थी. आज सबसे बड़ी जरूरत सत्ता के साथ-साथ 'राजनीतिक संस्कृति' को बदलने की है. वरना इतिहास के पन्ने फिर खुद को दोहराएंगे और बंगाल के लोग इसी अंतहीन चक्र में फंसे रहेंगे.
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