सलवा जुडूम को लेकर टर्निंग पॉइंट 2011 में आया लेकिन बस्तर के जंगलों में नहीं बल्कि दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट के बड़े से कोर्टरूम में. यहां सलवा जुडूम को मजबूर लोगों के एक आंदोलन के रूप में नहीं देखा गया. इसे एक कानूनी सवाल बना दिया गया. ऐसा सवाल जिसमें न उसका संदर्भ था, न इतिहास, न जमीनी सच्चाई.
एक्टिविस्ट और सिविल राइट्स ग्रुप्स ने याचिकाएं दायर कीं. उन्होंने इस आंदोलन को असंवैधानिक बताया. कहा गया कि सरकार ने अपनी शक्तियां लापरवाही से आम लोगों को आऊटसोर्स कर दी हैं. एक तरह की छद्म-अर्धसैनिक ताकत, जो काउंटर-इंसर्जेंसी के नाम पर खड़ी की गई थी.
बहस के दौरान कोर्ट में आदिवासी परिवारों का दर्द, उनका डर, उनकी घुटी हुई आवाजें शायद ही कहीं दर्ज हुईं. ऐसा नहीं था कि ये बातें मायने नहीं रखती थीं. लेकिन कानून के पास ऐसी भावनात्मक सच्चाई को समझने का तरीका ही नहीं था.
जब फैसला आया, तो वह बहुत सख्त था. बिल्कुल साफ और बिना नरमी के. सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल पुलिस ऑफिसर्स की तैनाती को असंवैधानिक बता दिया. इनमें से कई युवा आदिवासी थे, जिन्हें अपने गांव की रक्षा के लिए ट्रेन किया गया था. एक ही फैसले में सलवा जुडूम की पूरा ढांचा ढह गई.
कोर्ट के बाहर एक्टिविस्ट्स ने इस फैसले को संविधान की जीत बताया. लेकिन दंतेवाड़ा में माहौल अलग था. वहां खुशी नहीं थी. डर था. जो कैंप लोगों को सुरक्षा दे रहे थे, वे अचानक असुरक्षित लगने लगे. माओवादियों को मौका दिखा. संदेश साफ था. शायद जानबूझकर या अनजाने में, कि अब आम लोगों का विरोध करना वैध नहीं है. बस्तर की रक्षा वही करेंगे जो वहां की सच्चाई से कोसो दूर रहते हैं.
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जो लोग दशकों बाद पहली बार बोले थे, वे खुद को अकेला महसूस करने लगे. यह आंदोलन हमला नहीं था, यह जीने की कोशिश थी. लेकिन अब इसे गैरकानूनी बना दिया गया. और इस खामोशी के खालीपन में माओवादी तेजी से आगे बढ़े.
जिन गांवों ने माओवादियों की बात नहीं मानी थी, उन्हें सजा मिली. जो लोग सरकारी कैंपों में चले गए थे, उन्हें चेतावनी दी गई - जब तक वफादारी साबित नहीं करोगे, गांव वापस मत आना. माहौल बदल गया. डर फिर से हावी हो गया.
शासन और सरकार मौजूद थे, लेकिन लोगों पर उनका भरोसा खत्म हो गया था. पुलिस थी, लेकिन उसे वो जमीनी जानकारी नहीं मिल रही थी, जो सिर्फ स्थानीय लोगों से मिल सकती थी. माओवादियों ने पहले कुछ इलाके खोए थे. लेकिन अब उन्होंने उससे भी ज्यादा बड़ी चीज वापस पा ली - डर.
दिल्ली में सरकार चाहती तो इस फैसले को चुनौती दे सकती थी. रिव्यू मांग सकती थी. या कम से कम कोई नया ढांचा बना सकती थी, ताकि आंदोलन को खत्म करने के बजाय सुधारा जा सके. लेकिन UPA सरकार चुप रही. न कोई अपील हुई. न कोई कानून बना. न कोई कोशिश हुई कि जो हासिल हुआ था, उसे बचाया जाए.
सरकार दूर से सब देखती रही. जैसे यह कोई छोटी सी बात हो. जबकि हजारों लोगों के लिए यह लाइफलाइन थी. इसी राजनीतिक हिचकिचाहट और न्यायिक सख्ती के बीच महेंद्र कर्मा अकेले पड़ते गए. माओवादी उनसे नफरत करते थे. उनके लिए कर्मा गद्दार थे. विद्रोही थे. और सबसे बड़ी बात - वह एक मिसाल थे. उन्होंने दिखाया था कि डर को तोड़ा जा सकता है. और जो विचारधारा डर पर टिकी हो, उसके लिए यह सबसे बड़ा खतरा था.
2012 तक माओवादियों का एजेंडा साफ था - महेंद्र कर्मा को मरना होगा. लेकिन कर्मा पीछे नहीं हटे. बल्कि और मजबूत हो गए. उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों से बात की. कहा कि माओवाद से लड़ाई सिर्फ पुलिस या फोर्स के भरोसे नहीं जीती जा सकती. उन्होंने चेतावनी दी - अगर लोगों का आंदोलन पीछे हटेगा, तो माओवादी फिर से मजबूत होंगे.
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जल्द ही यह बात सच साबित हुई. और बहुत खूनखराबे के साथ. 25 मई 2013 को दरभा घाटी में हमला हुआ. यह माओवादियों के सबसे खतरनाक हमलों में से एक था. कांग्रेस नेताओं का काफिला बस्तर से गुजर रहा था. अचानक घेर लिया गया. पूरी योजना के साथ हमला हुआ.
लैंडमाइंस फटे. चारों तरफ से गोलियां चलीं. बचने का कोई रास्ता नहीं था. बाद में गवाहों ने बताया - और माओवादियों ने खुद भी कहा - कि असली निशाना महेंद्र कर्मा थे. उन्हें जिंदा पकड़ा गया. ताकि धीरे-धीरे मारा जा सके. सजा देने के लिए. डर फैलाने के लिए.
उनके शरीर को गोलियों से छलनी किया गया. सिर कुचल दिया गया. यह सिर्फ हत्या नहीं थी. यह एक मैसेज था. एक ऐसा आदमी जिसने लोगों को खड़ा होना सिखाया, उसे आसान मौत भी नहीं दी गई. कर्मा की हत्या के साथ आंदोलन की रीढ़ टूट गई.
वह एक आवाज थे जिसमें राजनीतिक ताकत, नैतिक हिम्मत और जमीनी सच्चाई तीनों थे. उनके जाने के बाद सब खामोश हो गया. बस्तर में माहौल भारी था. सिर्फ दुख नहीं था. उम्मीद खत्म होने की चुप्पी थी. कहा जाने लगा कि सलवा जुडूम दो बार खत्म हुआ. एक बार कोर्ट में. और दूसरी बार दरभा घाटी में.
जो सबसे खराब थी, वह थी इस घटना पर हुई सियासत. माओवादियों की क्रूरता पर बात करने के बजाय, कुछ राजनीतिक और वैचारिक लोग फिर से कर्मा की आलोचना करने लगे. उनकी हत्या को एक नेता की हत्या नहीं माना गया, जो आतंकवाद से लड़ रहा था. बल्कि इसे ‘राजनीतिक परिणाम’ कहकर समझाया गया. कुछ जगहों पर तो इसे सही ठहराने की कोशिश भी हुई.
ऐसा लगा जैसे माओवाद के खिलाफ लड़ाई अब राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं रही. यह एक बौद्धिक बहस बन गई. जिसमें आदिवासियों की जिंदगी सिर्फ फुटनोट बनकर रह गई. सालों बाद जब सलवा जुडूम की याद धुंधली पड़ गई, तब एक और झटका लगा. इस बार हिंसा नहीं, राजनीति से.
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2025 में कांग्रेस पार्टी ने जस्टिस सुदर्शन रेड्डी को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया. वही जज जिन्होंने 2011 में सलवा जुडूम को बंद करने वाला फैसला लिखा था. जो लोग बस्तर की कहानी को समझते थे, उनके लिए यह सिर्फ एक नामांकन नहीं था. यह एक संकेत था. जिन लोगों ने यह संघर्ष जिया था, माओवाद का दर्द झेला था, और आंदोलन को टूटते देखा था - उनके लिए यह एक चक्र पूरा होने जैसा था.
एक ऐसे जज को ऊंचा पद दिया गया, जिसने नक्सलवाद के खिलाफ खड़े हुए एकमात्र जन आंदोलन को रोक दिया था. और वही पार्टी, जिसने उसे बचाने की कोशिश नहीं की, अब उसे आगे बढ़ा रही थी. बस्तर के कई लोगों के लिए यह सिर्फ विडंबना नहीं थी. यह एक कड़वा सच था.
उन्हें लगा - उनकी पीड़ा कभी मायने रखती ही नहीं थी. उन लोगों के लिए तो बिल्कुल नहीं, जो माओवाद को विचारधारा का संघर्ष मानते रहे, आतंक नहीं.
(लेखन- तुहिन सिन्हा है. यह तुहिन ए सिन्हा की किताब NAXAL TERROR VANQUISHED का एक अंश है)
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