एकनाथ शिंदे ने यूं ही नहीं छोड़ा सीएम की कुर्सी का मोह, 3 मजबूरियों ने बागी होने से रोक दिया | Opinion

कुछ तो मजबूरियां रही होंगी , वरना एकनाथ शिंदे यूं ही नहीं छोड़ने वाले थे महाराष्ट्र के सीएम की कुर्सी का मोह. जिस तरह एकनाथ शिंदे ने सीएम पद के लिए अचानक आज सरेंडर किया वह यू्ं ही नहीं है. उसके पीछे उनकी 3 राजनीतिक मजबूरियां तो स्पष्ट दिखाई देती हैं. यह अच्छा है कि समय रहते ही उन्होंने अपना भविष्य देख लिया.

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एकनाथ शिंदे ने महाराष्ट्र के मतदाताओं को धन्यवाद दिया और कहा कि उन्होंने कभी खुद को सीएम के रूप में नहीं सोचा था. (छवि: पीटीआई) एकनाथ शिंदे ने महाराष्ट्र के मतदाताओं को धन्यवाद दिया और कहा कि उन्होंने कभी खुद को सीएम के रूप में नहीं सोचा था. (छवि: पीटीआई)

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 27 नवंबर 2024,
  • अपडेटेड 6:30 PM IST

महाराष्ट्र में अगले मुख्यमंत्री को लेकर अब महायुति में रास्ता साफ है. शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके साफ कर दिया कि उन्हें बीजेपी का सीएम मंजूर है. इस दौरान उन्होंने ऐलान किया कि मैं अपने आप को कभी मुख्यमंत्री नहीं समझता हूं. मैं हमेशा अपने आपको कॉमन मैन समझता हूं. शिंदे ने कहा कि मैंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन किया था. मैंने उनसे कहा कि हमारी तरफ से मुख्यमंत्री को लेकर कोई अड़चन नहीं आएगी. हमारा पूरा सहयोग रहेगा. पर सवाल यह उठता है कि चार दिन से जो उठापटक चल रही थी वो किस लिए था?. कहीं न कहीं से शिंदे के मन में चल रहा था कि हो सकता है कि बीजेपी का मन जिस तरह पिछली बार बदल गया था जब वो शिवसेना को तोड़कर आए थे, वैसा ही कुछ इस बार भी हो जाए. पर इस बार परिस्थितियां बिल्कुल भिन्न थीं. यह बात शिंदे को समझने में भले ही चार दिन लगे पर उन्होंने अपनी वाणी पर संयम पहले ही दिन से नहीं खोया था. क्यों कि उन्हें पता था कि इस बार बीजेपी रुकने वाली नहीं है. आइये देखते हैं कि एकनाथ शिंदे की क्या मजबूरियां थीं जिसके चलते उन्होंने बहुत विनम्रता से अपना रास्ता अलग कर लिया.

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1-बीजेपी को अपनी सरकार बनाने के लिए केवल 4 विधायकों की और जरूरत

एकनाथ शिंदे यह जानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी को महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए बहुमत जुटाने में मुश्किल नहीं आने वाली है. अगर एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी अपना समर्थन वापस भी कर लें तो बीजेपी को केवल 4 विधायकों की जरूरत होने वाली है.

महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में बीजेपी को कुल 132 सीटों पर सफलता मिली है. महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए कुल 145 विधायकों की जरूरत होगी. यानि कि बीजेपी को कुल 13 विधायकों की और जरूरत होगी. दो निर्दलीयों ने चुनाव जीता है. इसके अलावा 10 सीटें छोटी पार्टियों ने भी जीती है. समाजवादी पार्टी के दो विधायक, सीपीआई एम के एक विधायक को छोड़ दें तो इनमें से 7 विधायकों का समर्थन भारतीय जनता पार्टी आसानी से जुटा लेगी. इस तरह भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने के लिए केवल 4 विधायकों की जरूरत होगी. जो लोग महाराष्ट्र की राजनीति को जानते हैं उन्हें पता है कि 4 विधायक जुटाना कोई कठिन कार्य नहीं है. हो सकता है कि समाजवादी पार्टी और सीपीआई के विधायक भी बीजेपी की सरकार को सपोर्ट कर दें. यही कारण है कि सीएम पद के लिए एकनाथ शिंदे बहुत मोलभाव करने की हैसियत में नहीं थे. इसलिए उन्होंने शांति का रास्ता अख्तियार किया.

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2-दूसरी बार शिवसेना के टूटने का डर 

महाराष्ट्र की राजनीति में जिस तरह की घटनाएं पिछले पांच साल में हुई हैं उसे देखकर बीजेपी को छोड़कर कोई भी नेता अपनी पार्टी के विधायकों को लेकर आश्वस्त नहीं रहता है. सबको पता है कि यहां की राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है. चाहे शिवसेना (एकीकृत)  का एमवीए गठबंधन में जाना रहा हो या बाद में टूटकर 2 हिस्सों में होना रहा हो , अजित पवार का 2019 में अपने चाचा का साथ छोड़कर आना और 80 घंटे के अंदर फिर से वापस हो जाना हो, अजित पवार का फिर से अपनी पार्टी को तोड़कर महायुति गठबंधन में आना हो . ये सभी घटनाक्रम अचानक हुए . कोई समझा भी नहीं कि खेला हो गया. एकनाथ शिंदे जानते हैं कि आज अगर वो 2019 के जैसे उद्धव ठाकरे की रणनीति अपनाते हैं तो कब एक दूसरा शिंदे उनकी पार्टी में सर उठा ले ये पता भी नहीं चलेगा. जब पार्टी का नेता सारा खेल सत्ता के लालच में करने लगता है तो पार्टी के विधायक भी नैतिकता को ताक पर रख देते हैं. एकनाथ शिंदे समझदार हैं और अपने पुराने साथी उद्धव ठाकरे के रास्ते पर जाने से उन्होंने अपने मन को मना लिया.

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3-उद्धव ठाकरे जैसा हश्र होने का खतरा

अगर एकनाथ शिंदे इस जिद पर आते कि उन्हें सीएम बनना ही बनना है तो उन्हें कल को अपनी विचारधारा के उलट कांग्रेस और एमवीए के साथ जाना मजबूरी हो जाता. वो अच्छी तरह से देख रहे हैं कि विचारधारा से समझौता करने का हश्र उद्धव ठाकरे के साथ क्या हुआ है. न पार्टी रही और न ही जनता में उनकी पहचान. बाला साहब ठाकरे का खून होने के बावजूद विचारधारा के चलते आज जनता ने उन्हें नकार दिया. शायद यही सब सोचकर एकनाथ शिंदे ने बगावत करने की बजाय समझौता करना ही बेहतर समझा.
 

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