इतिहास खुद को दोहरा रहा है. भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बड़बोलापन 70 के दशक की यादें ताजा कर रहा है. ट्रंप के अनर्गल प्रलाप को लेकर मोदी का संयम और ठहराव उस रणनीति का हिस्सा है, जिसे इंदिरा गांधी ने दो अमेरिकी राष्ट्रपतियों रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर से निपटने के लिए अपनाया था.
कांग्रेस प्रधानमंत्री मोदी का मजाक बना रही है कि कैसे पीएम मोदी डोनाल्ड ट्रंप के आगे चुप और कमजोर नजर आ रहे हैं. उन्हें 'नरेंदर सरेंडर' से लेकर 'डरपोक पीएम' तक कहा जा रहा है. एक राजनीतिक विरोधी होने के नाते उनका ऐसा करना बनता भी है. लेकिन, यदि अतीत पर नजर डालें तो कांग्रेस की सबसे मजबूत प्रधानमंत्री मानी गई इंदिरा गांधी ने भी एक दौर में दो अमेरिकी राष्ट्रपतियों के प्रलाप को चुप रहकर ही हराया था. बस, चेहरे बदल गए हैं, दौर बदल गया है, लेकिन चुनौती वही है.
बिना भारत की गरिमा, संप्रभुता और राष्ट्रीय हित को गिरवी रखे अमेरिका के ऐसे राष्ट्रपति से कैसे निपटा जाए जो मनगढ़ंत बातें करता हो, धमकी देता हो और लेन-देन की भाषा में बात करता हो. इंदिरा गांधी को शायद अमेरिका के सबसे भारत-विरोधी व्हाइट हाउस का सामना करना पड़ा. निक्सन और किसिंजर सिर्फ भारत के आलोचक नहीं थे. वे खुले तौर पर अपमान करते थे. बाद में सार्वजनिक हुई ओवल ऑफिस की टेप रिकॉर्डिंग्स से साफ हुआ कि भारत और इंदिरा गांधी के लिए रेसिस्ट, भारतीय स्त्रियों के लिए अपमान और घृणा वाली भाषा का इस्तेमाल किया गया. निक्सन ने भारतीयों को 'बास्टर्ड्स' कहा. किसिंजर ने भी इंदिरा गांधी के लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया. दिलचस्प ये भी है कि जैसे आज पाकिस्तान को ट्रंप ने लाड़ला बना रखा है, वैसे ही कोल्ड वॉर के दौरान पाकिस्तान अमेरिका का मोहरा था, चाहे उसकी कीमत पर बांग्लादेश में नरसंहार ही क्यों न हो रहा हो.
लेकिन, निक्सन और किसिंजर की बदतमीजियों का जवाब इंदिरा गांधी ने उसी भाषा में नहीं दिया. न किसी भाषण में, न प्रेस कॉन्फ्रेंस में, न इंटरव्यू में. कहीं नहीं. कोई सार्वजनिक टकराव नहीं किया. उन्होंने समझ लिया था कि सत्ता की सियासत में कोई नेता ज्यादा जोर से बोल रहा है, मतलब वो कोई कमजोरी छुपा रहा है. ऐसे में चुप्पी ही बेहतर है.
1971 युद्ध से पहले निक्सन से मिलने जब इंदिरा गांधी अमेरिका पहुंचीं तो उन्हें काफी देर इंतेजार कराया गया. इंदिरा पर दबाव बनाया और बंगाल की खाड़ी में USS एंटरप्राइज भेजकर धमकाने की कोशिश की. लेकिन, तब अमेरिकी दबाव से बेपरवाह इंदिरा गांधी ने सोवियत संघ से मैत्री संधि का साहसी फैसला लिया. यह भारत का सोवियत संघ की ओर कोई वैचारिक झुकाव नहीं था, बल्कि रणनीतिक सुरक्षा कवच था. 1971 के युद्ध में भारत ने निर्णायक कार्रवाई की. दक्षिण एशिया का नक्शा बदला और बांग्लादेश अस्तित्व में आया. अमेरिकी नाराजगी के बावजूद. निक्सन की बकवास चलती रही, इंदिरा गांधी ने इतिहास रच दिया.
यही पैटर्न डोनाल्ड ट्रंप से निपटने में नरेंद्र मोदी के रवैये में दिखता है
ट्रंप भी निक्सन की तरह तमाशे की राजनीति में विश्वास रखते हैं. सहयोगियों को अपमानित करना, विरोधियों की तारीफ करना, अपने ही बयानों से पलटना. यह सब उनकी शैली रही. भारत को कभी दोस्त कहा गया, कभी टैरिफ की धमकी दी गई, कभी व्यापार घाटे पर भाषण सुनाया गया. कश्मीर पर मध्यस्थता जैसे गैर-जिम्मेदार बयान भी दिए गए. लेकिन मोदी ने कभी उस शोर पर प्रतिक्रिया नहीं दी.
मोदी ने हमेशा डायलॉग पॉलिसी अपनाई. ह्यूस्टन के 'हाउडी मोदी' और अहमदाबाद के 'नमस्ते ट्रंप' जैसे आयोजन से सौहार्द्र दिखाते रहे. इसके साथ ही कश्मीर पर तीसरे पक्ष के दखल को लेकर नीति स्पष्ट रखी. विदेश नीति पर बाहरी प्रभाव नहीं आने दिया. इतना ही नहीं, रूस के साथ रक्षा सौदे करते समय अमेरिकी दबाव को नजरअंदाज करने का आत्मविश्वास बनाए रखा.
दोनों ने दिखाया कि भारत की ताकत शोर में नहीं, धैर्य में है
दोनों नेताओं ने लहजे और फैसलों को अलग-अलग रखा. दोनों जानते थे कि अमेरिकी राष्ट्रपति अस्थायी होते हैं, लेकिन राष्ट्रहित स्थायी होता है. ट्रंप की टैरिफ धमकियों ने भारत को जल्दबाजी में झुकने पर मजबूर नहीं किया. इस रणनीति की सबसे बड़ी ताकत यही है लाउड नेताओं को वह प्रतिक्रिया न देना, जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा भूख होती है.
इसके पीछे एक गहरी वैचारिक निरंतरता भी है. इंदिरा गांधी ने भारत को किसी महाशक्ति के गुट में फंसने से इनकार किया. मोदी ने भी अमेरिकी, रूसी, चीनी या ग्लोबल साउथ जैसे लेबल से खुद को अलग रखा. कभी इसे गुटनिरपेक्षता कहा गया, आज इसे स्ट्रेटेजिक फ्रीडम कहा जाता है. लेकिन इस सबका मूल वही है. अपनी सबसे दोस्ती, नहीं किसी से बैर.
ट्रंप के बयानों पर मोदी के संयम को उनके राजनीतिक विरोधी और आलोचक कमजोरी या जरूरत से ज्यादा मित्र बना लेने की मजबूरी समझते हैं. यही आरोप ढाका में पाकिस्तान के आत्मसमर्पण से पहले तक इंदिरा गांधी पर भी लगे थे.
भारत की खामोश कूटनीति में छिपी है कठोर फैसले लेने की ताकत
नियति का न्याय देखिये. जिस निक्सन ने इंदिरा गांधी से नफरत की, उसे वाटरगेट में अपमानित होकर इस्तीफा देना पड़ा. जो ट्रंप आज पीएम मोदी पर तंज कस रहे हैं और भारत के बारे में हल्की बातें कर रहे हैं, कौन जाने कल उन्हें क्या देखना पड़े. पूरी दुनिया में उनके फैसलों का मजाक बनाया जा रहा है, भर्त्सना की जा रही है. इंदिरा गांधी आज भी भारत की सबसे निर्णायक प्रधानमंत्री मानी जाती हैं. और मोदी ने भारत को ऐसा राष्ट्र बनाया है जो न तो किसी के आगे हाथ फैलाता है, न हल्ला मचाकर टकराव चाहता है.
धीरेंद्र राय