फारस की खाड़ी का नीला पानी आजकल बेहद खामोश है. लेकिन यह वो खामोशी है, जो किसी बड़े तूफान से पहले आती है. दुनिया की निगाहें ईरान के खार्ग आईलैंड (Kharg Island) पर टिकी हैं. चर्चा गरम है कि क्या अमेरिका यहां कोई बड़ा दुस्साहस करने वाला है? क्या राष्ट्रपति ट्रंप एक ऐसी जंग की ओर बढ़ रहे हैं, जो अमेरिकी मरीन्स के लिए 'सुसाइड मिशन' साबित हो सकती है?
जब हम समुद्र के रास्ते किसी बड़े हमले की बात करते हैं, तो जेहन में 6 जून 1944 की तारीख कौंध जाती है. जिसे दूसरे विश्वयुद्ध का D-Day कहा जाता है. तब अमेरिका और ब्रिटेन की फौजों ने फ्रांस के नॉर्मंडी बीच पर उतरने का फैसला किया था. मकसद था हिटलर की नाजी सेना को उखाड़ फेंकना. हजारों जहाज और लाखों सैनिक समुद्र के सीने पर सवार होकर निकले थे. ब्रिटेन से निकले इस आक्रामक दस्ते को इंग्लिश चैनल को पार करके फ्रांस के नॉर्मंडी तट पर पहुंचना था. ये वैसी ही चुनौती है, जिसे कतर, बहरीन, सऊदी अरब और कुवैत से चलकर अमेरिकी मरीन्स खार्ग पहुंचना चाहें.
लेकिन जैसे ही यूएस मरीन्स और सैनिकों ने नॉर्मंडी के किनारों पर कदम रखा, नजारा बदल गया. जर्मन सेना ऊपर पहाड़ियों और बंकरों में छिपी बैठी थी. उनके पास मशीनगनें थीं. जैसे ही लैंडिंग क्राफ्ट के दरवाजे खुले, अमेरिकी सैनिकों पर गोलियों की बौछार हो गई. समंदर का पानी लाल हो गया. हजारों जवान किनारे तक पहुंचने से पहले ही ढेर हो गए. नॉर्मंडी की वो जीत 'खून की कीमत' पर मिली थी. तीन महीने में करीब 15 लाख सैनिकों ने जर्मनी के खिलाफ इस हमले में हिस्सा लिया. जिसमें से सवा दो लाख ढेर हो गए. आज सवाल यह है कि क्या ट्रंप प्रशासन ईरान के मामले में वही गलती दोहराने जा रहा है?
1. खार्ग आईलैंड: ईरान की दुखती रग और मजबूत ढाल
8 किमी लंबा और 4-5 किमी चौड़ा खार्ग आईलैंड ईरान के लिए सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं है. यह ईरान की अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन है. ईरान का 90% कच्चा तेल यहीं से एक्सपोर्ट होता है. 30 मिलियन बैरल क्रूड ऑयल स्टोरेज क्षमता वाले इस आइलैंड पर 18 मिलियन बैरल तेल अब भी मौजूद है. इजरायल तो चाहता है कि खार्ग आइलैंड समेत ईरान की सभी ऑयल फील्ड्स को तबाह कर दिया जाए. लेकिन ट्रंप के लिए ये आसान फैसला नहीं है. खार्ग की भौगोलिक बनावट किसी किले जैसी है. फारस की खाड़ी के इस हिस्से में समुद्र उथला है, लेकिन तट तक पहुंचते ही पहाड़ी इलाका शुरू हो जाता है. यह इलाका अमेरिकी मरीन्स के लिए किसी भूलभुलैया से कम नहीं होगा. अमेरिका इस आइलैंड पर पहले बमबारी कर चुका है. लेकिन हवाई हमले और जमीनी जंग में जमीन-आसमान का फर्क होता है.
2. मरीन्स का चैलेंजः अपनी जान बचाएं या खार्गवासियों की
हाल ही में दो 'मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट' (MEU) तैनात की गई हैं, जो जमीनी और समुद्री हमलों, और छापेमारी में माहिर हैं. खार्ग तक पहुंचने के लिए अमेरिकी जहाजों को हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरना होगा, जहां ईरानी ड्रोन, मिसाइलें और माइन्स उनका इंतजार कर रही होंगी. इस आइलैंड के आसपास ईरान ने कितनी समुद्री माइन्स बिछाई हैं, कोई नहीं जानता. उसके कितने समुद्री ड्रोन्स घात लगाकर हमले की तैयारी में हैं, यह सस्पेंस है. मरीन्स को आइलैंड के चारों ओर 100 मील तक कवर चाहिए ही. साथ ही, खार्ग पर ऑयल कंपनियों में काम करने वाले हजारों श्रमिकों की सुरक्षा और ईरानी जवाबी हमले का बड़ा खतरा है. रणनीतिक रूप से भी यह साफ नहीं है कि खार्ग खोने के डर से ईरानी शासन झुकेगा या नहीं. और यदि ईरान ने अपने तटीय इलाकों से इस आइलैंड पर मिसाइलों से हमला शुरू कर दिया तो मरीन्स यहां कब तक महफूज रहेंगे.
3. क्या मरीन्स बनेंगे 'आसान शिकार'?
ईरान की रणनीति सीधी है- दुश्मन को किनारे पर आने दो और फिर उसे चारों तरफ से घेर लो. नॉर्मंडी में कम से कम दुश्मन सामने था. यहां दुश्मन पहाड़ियों के अंदर छिपा है. अमेरिकी मरीन्स जैसे ही अपनी नावों से बाहर निकलेंगे, वे IRGC की स्नाइपर राइफल्स और गाइडेड मिसाइलों की जद में होंगे. ईरान की 'जियोग्राफी' ही उसकी सबसे बड़ी सेना है. संकरी खाड़ी में अमेरिकी युद्धपोतों को मुड़ने की जगह नहीं मिलेगी. वे आसान टारगेट्स (Sitting Ducks) बनकर रह जाएंगे.
4. IRGC का 'डेथ ट्रैप': बंकर, मिसाइल और ड्रोन
ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने बरसों से इस आईलैंड और इसके आसपास के तटीय इलाकों को एक अभेद्य किले में बदल दिया है. यहां की तैयारी वैसी नहीं है जैसी सद्दाम हुसैन की थीं. ईरान ने पहाड़ियों को काटकर उनके अंदर गहरे बंकर बनाए हैं. इन पर अमेरिकी बमबारी का असर होना नामुमकिन के बराबर है. IRGC के पास 'एंटी-शिप' मिसाइलों का भंडार है. अगर अमेरिकी बेड़ा करीब आता है, तो एक साथ सैकड़ों मिसाइलें आसमान से गिरेंगी. ईरान के पास ऐसे ड्रोन्स हैं जो झुंड में हमला करते हैं. ये ड्रोन इतने छोटे और तेज हैं कि रडार उन्हें पकड़ नहीं पाते.
ऐसे में सोचिए, अगर अमेरिकी मरीन्स खार्ग के तट पर उतरने की कोशिश करते हैं, तो उनका मुकाबला सिर्फ सैनिकों से नहीं, बल्कि एक 'डिजिटल मौत' से होगा.
5. ट्रंप का दांव बहादुरी वाला या ऐतिहासिक भूल?
डोनाल्ड ट्रंप अपनी 'मैक्सिमम प्रेशर' पॉलिसी अपना रहे हैं. वे अपनी ताकत दिखाना चाहते हैं. लेकिन युद्ध विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान पर जमीनी हमला करना मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा है. क्या ट्रंप प्रशासन उन हजारों ताबूतों के लिए तैयार है, जो खार्ग की पहाड़ियों से लौटेंगे? क्या अमेरिका एक और वियतनाम या एक और 'नॉर्मंडी' बर्दाश्त कर पाएगा? दूसरे नॉर्मंडी में हुई अमेरिकी सैनिकों की मौतों को इसलिए स्वीकार कर लिया गया, क्योंकि वहां सामने एक हिटलर से मुकाबला था. जबकि ट्रंप अभी ईरान युद्ध में अपने दुश्मन को ‘हिटलर’ साबित नहीं कर पाए हैं. आयतुल्ला खामनेई की मौत के बाद तो ईरान युद्ध को लेकर उनके उद्देश्य बार-बार बदल ही रहे हैं.
खार्ग आईलैंड पर हमले का मतलब है ईरान युद्ध का और घातक हो जाना. ईरान अपने आसपास के अरब देशों में मौजूद ऑयल फील्ड्स पर हमले कर सकता है. यानी पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था बैठ जाने का खतरा. और हजारों सैनिकों की बलि चढ़ना. इतिहास गवाह है कि पहाड़ियों और बंकरों में बैठे दुश्मन को हराना नामुमकिन नहीं तो बेहद खौफनाक जरूर होता है. नॉर्मंडी की रेत ने बहुत खून पिया था. फारस की खाड़ी उस इतिहास को दोहराने के लिए बेताब दिख रही है.
धीरेंद्र राय