बंगाल सरकार के फैसले से मुस्लिम ओबीसी कोटा पॉलिटिक्स खतरे में

पश्चिम बंगाल की सत्ता में आई भाजपा की शुभेंदू अधिकारी सरकार ने राज्य की ओबीसी लिस्ट को ही रद्द कर दिया है. कारण ये है कि लेफ्ट और फिर ममता सरकार ने पिछले दरवाजे से 90 फीसदी मुसलमानों को ओबीसी में शामिल करवा दिया था.

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बंगाल में लेफ्ट और ममता बनर्जी सरकारों ने मुस्लिम ओबीसी का जो कार्ड खेला था, शुभेंदु अधिकारी ने उस पर से पर्दा हटा दिया. बंगाल में लेफ्ट और ममता बनर्जी सरकारों ने मुस्लिम ओबीसी का जो कार्ड खेला था, शुभेंदु अधिकारी ने उस पर से पर्दा हटा दिया.

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 20 मई 2026,
  • अपडेटेड 1:58 PM IST

पश्चिम बंगाल में शुभेंदु सरकार ने अपनी पहली ही कैबिनेट बैठक में सूबे की पूरी OBC लिस्ट को रद्दी की टोकरी में डाला, तो दिल्ली से लेकर कोलकाता तक सियासी गलियारों में भूचाल आना तय था. यह सिर्फ एक प्रशासनिक ऑर्डर नहीं है, बल्कि यह उस 'मुस्लिम सब-कोटा पॉलिटिक्स' की रीढ़ पर सीधा प्रहार है जिसने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को लंबे समय से एक खास ढर्रे पर चला रखा था. बंगाल में शुभेंदु अधिकारी ने जो किया, वह महज एक कानूनी दांवपेच नहीं है, बल्कि यह उस तुष्टिकरण की राजनीति की ग्राउंड रियलिटी है जो आखिरकार अपने ही बुने जाल में आकर फंस गई है.

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इस पूरे विवाद की स्क्रिप्ट साल 2010 में लिखना शुरू हुआ था. तब राज्य की सत्ता खोती वामपंथी सरकार ने और उसके ठीक बाद सत्ता में आईं ममता बनर्जी ने मुस्लिम वोटों की एक ऐसी सॉलिड फसल तैयार करने की सोची, जिसका तोड़ कोई दूसरा दल न ढूंढ सके. इसके लिए संविधान के कायदे-कानूनों को ताक पर रखकर एक ऐसा शॉर्टकट निकाला गया, जिसने सामाजिक न्याय के पूरे ढांचे को हिलाकर रख दिया.

ममता सरकार के दौर में राज्य की पिछड़ा वर्ग सूची में 140 से ज्यादा नई उप-जातियां जोड़ी गईं. हैरान करने वाला फैक्ट यह है कि इनमें से करीब 80 फीसदी जातियां सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम समुदाय से थीं. 2011 की जनगणना के मुताबिक बंगाल में मुसलमानों की आबादी 2.46 करोड़ थी, जिसमें से 2.1 करोड़ को ओबीसी के दायरे में ले आया गया. यानी फाइलों पर एक ऐसा सियासी करिश्मा कर दिया गया, जहां राज्य का लगभग हर मुसलमान रातों-रात 'ओबीसी' घोषित हो गया. राज्य में अतिपिछड़ों के लिए OBA-A कैटेगरी थी. और इसी कैटेगरी में मुस्लिम जातियों को शामिल कर लिया गया. नतीजा यह हुआ कि नौकरियों और शिक्षा में मिलने वाले आरक्षण पर एकतरफा कब्जा होने लगा और मूल हिंदू पिछड़ी जातियां हाशिए पर चली गईं. खास तौर पर चुनिया, कलवार, या अन्य छोटे शिल्पी वर्ग संख्याबल और मुकाबले में पीछे छूट गए. और राज्य की बड़ी ओबीसी जातियां महेष्य, सद्गोप, यादव, कुर्मी तो और पीछे चले गए.

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हाई कोर्ट की एंट्री: साल 2024 में जब यह मामला कलकत्ता हाई कोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने साफ कहा कि बिना किसी सर्वे और बिना किसी साइंटिफिक डेटा के, केवल धार्मिक तुष्टिकरण के लिए पूरी की पूरी आबादी को ओबीसी बना देना सरासर असंवैधानिक है. कोर्ट ने इस लिस्ट को खारिज किया था, और अब नई शुभेंदु सरकार ने उसी अदालती फैसले को जमीन पर उतारते हुए इस 'सब-कोटा' सिस्टम को हमेशा के लिए लॉक कर दिया है.

बंगाल के पूरे ओबीसी सिस्टम को मिलेगा नया रूप

सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस ली: शुभेंदु सरकार ने पहला बड़ा कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में ममता सरकार द्वारा दायर की गई उस रीव्यू याचिका को आधिकारिक तौर पर वापस ले लिया है, जिसमें हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी. इसका मतलब है कि राज्य सरकार ने अब कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है.

मौजूदा OBC सूची रद्द व नए पैनल का गठन: कैबिनेट ने कहा है कि राज्य में नई ओबीसी सूची बनेगी, जिसमें समुदायों की पात्रता तय करने के लिए एक नए निष्पक्ष पैनल/आयोग का गठन किया जाएगा. जो बिना किसी धार्मिक भेदभाव के संवैधानिक नियमों के तहत काम करेगा.

1.69 करोड़ जाति प्रमाणपत्रों की दोबारा जांच: सरकार ने 2011 (जब टीएमसी सत्ता में आई थी) के बाद से जारी किए गए सभी 1.69 करोड़ जाति प्रमाणपत्रों (SC, ST और OBC) की व्यापक स्तर पर री-वेरिफिकेशन (दोबारा जांच) के आदेश दिए हैं. इसमें विशेष रूप से टीएमसी की 'द्वारे सरकार' कैंपों के जरिए बांटे गए सर्टिफिकेट्स और हाल ही में 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) के तहत वोटर लिस्ट से हटाए गए संदिग्ध नामों के प्रमाणपत्रों की जांच होगी.

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देश के बाकी सूबों में 'वोटबैंक' का पुराना फॉर्मूला

भारत के कई राज्यों में मुस्लिम समुदायों की विभिन्न जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की सूची में शामिल करने पर गंभीर विवाद उभरे हैं. जिसका जोर 'धर्म-आधारित आरक्षण' की वैधता और मूल पिछड़ा वर्ग के हक को लेकर हैं.

कर्नाटक: यहां 1994-95 में मुस्लिमों के लिए ओबीसी सूची के तहत 'कैटेगरी 2B' बनाकर 4% का सब-कोटा तय किया गया था. मार्च 2023 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने इसे असंवैधानिक बताते हुए खत्म कर दिया. फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है.

केरल: यहां 1952 से ही लगभग पूरी मुस्लिम आबादी को ओबीसी का लाभ मिल रहा है. मुख्य विवाद 'रिसोर्स शेयरिंग' को लेकर है, जहां हिंदू पिछड़ा जातियों का आरोप है कि सशक्त मुस्लिम वर्ग कोटे का बड़ा हिस्सा ले जाता है.

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना: 2004-05 में पूरी मुस्लिम आबादी को एकमुश्त आरक्षण देने के प्रयास को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था. बाद में चुनिंदा जातियों की पहचान कर 'ओबीसी कैटेगरी-E' (4%) बनाई गई, जो वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के अधीन है.

बिहार: यहां मंडल कमीशन के तहत मुस्लिम समाज की केवल पेशेवर और सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों (जैसे अंसारी, कुरैशी) को अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) में रखा गया है. विवाद हालिया जाति सर्वे के बाद अगड़ी मुस्लिम जातियों को इसमें शामिल करने की मांग पर है.

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संवैधानिक सवाल:

संविधान का अनुच्छेद 16(2) धर्म के आधार पर आरक्षण को प्रतिबंधित करता है, जबकि अनुच्छेद 15(4) 'सामाजिक और शैक्षणिक' पिछड़ेपन को आधार मानता है. 1992 के इंद्रा साहनी केस के अनुसार, गैर-हिंदू जातियों को ओबीसी में जोड़ा जा सकता है, बशर्ते वैज्ञानिक डेटा के आधार पर उनका पिछड़ापन सिद्ध हो. जब भी राज्य सरकारें बिना ठोस सर्वे के थोक में मुस्लिम समुदायों को शामिल करती हैं, तो वह कानूनी और सामाजिक विवाद का कारण बनता है.

हिंदू बनाम मुस्लिम जातिगत पॉलिटिक्स: शतरंज की बिसात

इस देश की राजनीति का सबसे कड़वा सच यही है कि जातियों का इस्तेमाल हर दल अपने-अपने नफे-नुकसान के हिसाब से करता है. भाजपा और विपक्षी दलों के बीच चल रही यह जंग दरअसल शतरंज की एक ऐसी बिसात है, जहां दोनों खिलाड़ियों के नियम एक-दूसरे से बिल्कुल उलटे हैं.

भाजपा का गेमप्लान: भाजपा की पूरी पॉलिटिक्स 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' और 'हिंदू एकता' के इर्द-गिर्द घूमती है. भाजपा को अच्छी तरह पता है कि अगर हिंदू समाज अगड़ा, पिछड़ा और दलित की पहचान में उलझा रहा, तो क्षेत्रीय दलों को हराना नामुमकिन हो जाएगा. इसलिए भाजपा चाहती है कि तमाम हिंदू जातियों के बावजूद 'सनातनी पहचान' के नाम पर एक रहें.

इसके उलट, भाजपा मुस्लिम समाज के भीतर की उस परत को खोलना चाहती है जिसे सेक्युलर दलों ने हमेशा छिपाकर रखा. यानी 'अशराफ बनाम पसमांदा' का फर्क. मुस्लिम समाज के ऊंचे तबके (सैयद, शेख, पठान) ने हमेशा सत्ता का मजा लिया, जबकि जो गरीब और पिछड़े मुस्लिम (जुलाहे, कसाई, बुनकर) हैं, वे आज भी बदहाल हैं. भाजपा पसमांदा मुसलमानों को फोकस में लाकर उनके 'एकमुश्त' वोटबैंक वाले नैरेटिव को तोड़ने की कोशिश में है.

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विपक्षी दलों का दांव: इसके ठीक विपरीत, कांग्रेस, टीएमसी, सपा और राजद जैसे क्षेत्रीय दलों का पूरा वजूद ही इस बात पर टिका है कि हिंदू कभी एक न हो पाएं. राहुल गांधी का जातिगत जनगणना वाला दांव इसी रणनीति का हिस्सा है. इसलिए वे लगातार जातिगत आधार पर 'जितनी आबादी, उतना हक' का नैरेटिव सेट करते हैं. विपक्ष की कोशिश होती है कि हिंदू समाज अपनी जातियों में बंटा रहे, ताकि वे जातियों के छोटे-छोटे ब्लॉक बनाकर चुनाव जीत सकें.

लेकिन जब बात मुसलमानों की आती है, तो विपक्ष कभी नहीं चाहता है कि मुसलमान जातियों या 'अशराफ-पसमांदा' के भेद में बंटे. वे चाहते हैं कि मुसलमान अपनी तमाम आंतरिक जातियों के बावजूद सिर्फ एक 'धार्मिक पहचान' (Muslim Identity) के तहत एकमुश्त वोटबैंक बने रहें. इसके लिए वे मुसलमानों के मन में 'सुरक्षा का डर' पैदा करते हैं और उन्हें एकमुश्त अपनी तरफ खींचते हैं.

बॉटम लाइनः इस्लाम में जातियों का तसव्वुर नहीं, लेकिन...

थियोलॉजी के हिसाब से देखें तो इस्लाम में जाति का कोई स्थान नहीं है. और यही तर्क मुस्लिम-ओबीसी विवाद को धार्मिक दायरे में ले जाता है. जबकि समाज विज्ञानी मानते हैं कि दक्षिण एशिया, खासकर भारत में कई हिंदू जातियों के लोगों का धर्मांतरण कराया गया. जिसमें उनकी पहचान तो मुसलमान के रूप में बन गई, लेकिन उनका जातिगत नाता नहीं टूट पाया. यही कारण है कि राजनीतिक विमर्श में मुसलमान जातियों में बंटे होने के बावजूद खूद को एक इकाई के रूप में सामने रखते हैं. लेकिन, बात जब संसाधनों में हिस्सेदारी या नौकरी की आती है तो मुस्लिम समुदाय अपनी आर्थिक-सामाजिक स्थिति को प्राथमिकता देता है. जहां, मंसूरी, अंसारी के हालात सैयद और शेख के सामने वैसे ही हैं, जिसे सवर्णों के सामने दलित या पिछड़े. दिलचस्प ये है कि इस्लाम में फिरकों या जातियों का विरोध करने वाले मौलाना और अन्य कट्टरपंथी भी ओबीसी रिजर्वेशन मिलने का विरोध नहीं करते हैं. ऐसा होना जायज भी है. मजहब से बड़ी चुनौती है पिछड़ापन.

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