बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को किस आधार पर टीएमसी अपनी जीत मान रही है?

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी और बीजेपी के बीच शह-मात का खेल चल रहा है. ममता सरकार सवा करोड़ वोटर्स के नाम काटने को केंद्र के खिलाफ साजिश का नरेटिव सेट करना चाहती है. सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले, जिसमें वोट कटने वालों का नाम सार्वजिनक रूप से प्रदर्शित करने को कहा गया है टीएमसी सरकार इसे अपना जीत बता रही है. वास्तविकता क्या है इसे समझते हैं...

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ममता बनर्जी क्या एसआईआर को लेकर केंद्र की एनडीए सरकार के खिलाफ नरेटिव तैयार कर सकेंगी? (फाइल फोटो) ममता बनर्जी क्या एसआईआर को लेकर केंद्र की एनडीए सरकार के खिलाफ नरेटिव तैयार कर सकेंगी? (फाइल फोटो)

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 20 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:54 PM IST

TMC एसआईआर (Special Intensive Revision) मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को अपनी बड़ी जीत मान रही है, मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि कोर्ट ने ECI की प्रक्रिया को पारदर्शी और मतदाता-अनुकूल बनाने के लिए सख्त निर्देश दिए हैं. याचिका चूंकि टीएमसी के लोगों ने ही दायर की थी और कोर्ट का आदेश उनकी मांगों के अनुकूल ही आया है इसलिए पार्टी का केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ नरेटिव सेट करने के लिए बयानबाजी करना समझ में आता है.

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TMC नेता अभिषेक बनर्जी ने इसे BJP और PM मोदी की अदालत में हार बताया, और कहा कि यह मां-माटी-मानुष की जीत है, क्योंकि इससे करोड़ों असली मतदाताओं के वोटिंग अधिकार बचेंगे.TMC का आधार यह है कि SC ने logical discrepancies वाली 1.25 करोड़ नामों की पूरी लिस्ट को 3 दिनों में ग्राम पंचायत, ब्लॉक और वार्ड स्तर पर सार्वजनिक करने का आदेश दिया. यह TMC की प्रमुख मांग थी, जिससे लोग आसानी से अपनी स्थिति जान सकें और दस्तावेज जमा कर सकें. साथ ही, 10 दिनों का अतिरिक्त समय, Class X admit card को उम्र प्रमाण मानना, BLA या परिवार के सदस्य को सुनवाई में साथ ले जाने की अनुमति, और दस्तावेज जमा पर रसीद देना जैसे निर्देश दिए गए हैं. 

SC ने SIR को रद्द नहीं किया, बल्कि सुधार किया है .फिर भी TMC इसे राजनीतिक जीत मान रही है, क्योंकि इससे BJP की साजिश का आरोप मजबूत होता है. सवाल उठता है कि किस आधार पर टीएमसी ऐसा सोच रही है. जबकि बिहार में भी सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ऐसा ही आदेश दिया था. विपक्ष उस समय भी इसे जीत ही मान रहा था. पर आखिर जनता ने वोटर्स के नाम कटने को वोटर लिस्ट की सफाई माना और एनडीए को बिहार में भारी बहुमत से जिताया. 

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सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा वो ECI की मौजूदा प्रक्रिया में पहले से ही 

सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा वो ECI की मौजूदा प्रक्रिया में पहले से ही मौजूद था, लेकिन बड़े स्केल और व्यावहारिक समस्याओं के कारण SC ने इसे और मजबूत और मतदाता-अनुकूल बनाने के लिए स्पष्ट निर्देश दिए. ECI की SIR प्रक्रिया में पहले से ही प्रभावित मतदाताओं को नोटिस जारी करने, दस्तावेज जमा करने का मौका देने, आपत्ति दर्ज करने (फॉर्म-7/8 के जरिए) और BLO/राजनीतिक दलों की मदद लेने की व्यवस्था थी. ड्राफ्ट लिस्ट के बाद 15-30 दिनों की समय सीमा भी पहले से तय थी, जहां लोग क्लेम/ऑब्जेक्शन कर सकते थे. 

लेकिन SC ने 19 जनवरी 2026 के आदेश में जोड़ा कि logical discrepancies वाली 1.25 करोड़ नामों की पूरी लिस्ट को 3 दिनों में ग्राम पंचायत भवनों, ब्लॉक/तालुका कार्यालयों और वार्ड ऑफिसों में सार्वजनिक (प्रकाशित) किया जाए. यह ECI की मौजूदा प्रक्रिया में स्पष्ट रूप से अनिवार्य नहीं था, जहां लिस्ट अक्सर सिर्फ BLO स्तर पर या सीमित रूप से उपलब्ध होती थी, न कि बड़े पैमाने पर लोकल स्तर पर.

दस्तावेज जमा करने के लिए 10 दिनों का अतिरिक्त समय, नजदीकी जगह (पंचायत/ब्लॉक) पर सुविधा, और Class X admit card को उम्र प्रमाण मानना जैसे कुछ अतिरिक्त सहुलियत जरूर सुप्रीम कोर्ट ने दिए है.  

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2- SC ने रद्द वोटर लिस्ट को फिर मानने से इनकार नहीं किया 

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश TMC की जीत' का मुख्य आधार हैं, क्योंकि कोर्ट ने TMC की याचिका पर ECI की प्रक्रिया में पारदर्शिता और राहत के लिए सख्त कदम उठाए, जो पार्टी की प्रमुख मांगों से मेल खाते हैं. TMC ने इसे BJP और मोदी की अदालत में हार बताया, क्योंकि SC ने logical discrepancies वाली 1.25 करोड़ नामों की लिस्ट को 3 दिनों में ग्राम पंचायत, ब्लॉक और वार्ड स्तर पर सार्वजनिक करने का आदेश दिया है.

लेकिन कोर्ट ने ड्राफ्ट वोटर लिस्ट या SIR प्रक्रिया को रद्द नहीं किया, न ही हटाए नामों को स्वतः बहाल करने का आदेश दिया. SC ने स्पष्ट कहा कि SIR का उद्देश्य फर्जी नाम हटाना है, लेकिन कोई योग्य मतदाता बाहर नहीं होना चाहिए. यह प्रक्रिया जारी रहेगी, बस अब अधिक पारदर्शी और पहुंच योग्य होगी. अगर ECI इन निर्देशों का पालन कर फर्जी नाम हटाती रही, तो TMC का चुनाव आयोग या केंद्र सरकार के खिलाफ नरेटिव सेट करने का सपना साकार नहीं होगा.

3- बिहार से तुलना: समान SC आदेश, लेकिन जनता में मुद्दा नहीं बना

बंगाल एसआईआर के संबंध में जिस तरह का आदेश SC ने दिया है बिल्कुल वैसा ही आदेश बिहार के लिए भी दिया था. लेकिन बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान जनता में यह मुद्दा नहीं बन सका. बिहार में 2025 के SIR में भी सुप्रीम कोर्ट ने समान निर्देश दिए थे 65 लाख हटाए गए नामों की बूथ-वाइज लिस्ट प्रकाशित करने, कारण बताने, और प्रभावित लोगों को क्लेम फाइल करने का मौका देने का आदेश दिया गया था.  14 अगस्त 2025 को SC ने ECI को पारदर्शिता बढ़ाने, Aadhaar जैसी दस्तावेजों को मानने का भी आदेश दिया था. बिहार में फाइनल लिस्ट में 17.87 लाख नेट नाम जुड़े (21.53 लाख नए जुड़े जबकि 3.66 लाख अतिरिक्त हटे), ज्यादातर मौत, प्रवास, डुप्लिकेट कारणों से हटाए गए थे.  जनता ने इसे सफाई अभियान माना, न कि साजिश.  बिहार का अनुभव बताता है कि अगर प्रक्रिया पारदर्शी रही और फर्जी नाम हटे, तो जनता में यह बड़ा मुद्दा नहीं बनेगा.

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4- TMC की रणनीति: बिहार की 'गलतियां' न दोहराने की चेतावनी, लेकिन राजनीतिक फायदा सीमित 

TMC ने SIR मामले में बिहार की गलतियां न दोहराने की सख्त चेतावनी दी है. TMC महासचिव अभिषेक बनर्जी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि बिहार चुनावों में विपक्षी दलों की तरह वोट चोरी का मुद्दा जनता तक नहीं पहुंच पाया, इसलिए बंगाल में 100% enumeration forms जमा करवाना और SIR प्रक्रिया पर नजर रखना टॉप प्रायोरिटी है. उन्होंने कहा कि बिहार में विपक्ष  नरेटिव सेट नहीं कर सका, जहां नाम कटने के बावजूद जनता में बड़ा विरोध नहीं हुआ और NDA जीत गया.

TMC ने कार्यकर्ताओं को वॉर रूम अलर्ट मोड पर रखा, BLA को BLO से अलग न होने दिया, और बंगाली अस्मिता व वोट चोरी की साजिश का नैरेटिव बनाया. SC के आदेश (लिस्ट प्रकाशित करना, अतिरिक्त समय, प्रमाण मानना) को BJP की हार बताकर इसे चुनावी हथियार बनाने की कोशिश हो रही है. फिर भी राजनीतिक फायदा सीमित दिखता है.

बिहार में SC के समान निर्देशों के बाद भी मुद्दा फीका पड़ गया, क्योंकि प्रक्रिया पारदर्शी रही और फर्जी नाम हटे.जनता ने इसे सफाई माना. बंगाल में TMC सत्ताधारी है, BLO पर नियंत्रण है, और ग्रासरूट मजबूत है, इसलिए नरेटिव भुनाने का मौका ज्यादा है. लेकिन अगर ECI निर्देशों का पालन कर फर्जी नाम हटाती रही और असली मतदाता प्रभावित नहीं हुए, तो जनता विकास, रोजगार पर फोकस करेगी.

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5- बंगाल में एसआईआर ममता सरकार के कर्मचारियों ने किया, टीएमसी कैसे विरोध करेगी?

बंगाल में सरकार TMC की है. जो BLO (Booth Level Officers) बनाए गए वो राज्य सरकार के ही अधिकारी हैं. और ज्यादातर TMC-समर्थित या प्रभावित माने जाते हैं. यह TMC को SIR प्रक्रिया पर मजबूत नियंत्रण देता है. TMC कार्यकर्ता BLO के साथ मिलकर सुधार वाले फॉर्म जमा करवा सकते हैं. प्रभावित मतदाताओं की मदद कर सकते हैं. और logical discrepancies वाली लिस्ट को लोकल स्तर पर मॉनिटर कर सकते हैं.

SC के आदेश (लिस्ट प्रकाशित करना, अतिरिक्त समय, प्रमाण मानना) से TMC को ग्रासरूट स्तर पर राहत पहुंचाने का मौका मिला है, जिससे वोट चोरी की साजिश का नैरेटिव आसानी से सेट किया जा सकता है. इसके विपरीत, बिहार में NDA नीतीश कुमार की सरकार थी, जहां BLO एनडीए सरकार के अधीन थे. विपक्ष (RJD, कांग्रेस) के लिए BLO पर प्रभाव कम था, और प्रक्रिया को साजिश बताना आसान था. क्योंकि पावर में विपक्ष नहीं था. बंगाल में TMC के लिए नैरेटिव सेट मुश्किल होगा. क्योंकि सरकार खुद टीएमसी के हाथ में है. आखिर किस मुंह से सरकार कहेगी कि उसकी सरकार में काम करने वाले BLO ने बीजेपी के लिए पक्षपात किया.

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