गुजरात कॉमन सिविल कोड बिल: बड़ा रिफॉर्म या सिर्फ चुनावी 'कॉपी-पेस्ट'?

गुजरात में कॉमन सिविल कोड (UCC) बिल पेश हो गया है. सरकार इसे बड़ा सुधार बता रही है. कहा जा रहा है कि इससे सबके लिए एक जैसा कानून होगा. शादी, तलाक, विरासत -सबमें समानता आएगी. लेकिन क्या वाकई ऐसा है? या फिर कहानी थोड़ी अलग है?

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गुजरात विधानसभा में कॉमन सिविल कोड बिल लाया गया है, जिसे लेकर काफी बहस हो रही है. (फोटोः AI Generated) गुजरात विधानसभा में कॉमन सिविल कोड बिल लाया गया है, जिसे लेकर काफी बहस हो रही है. (फोटोः AI Generated)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 25 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 12:35 PM IST

उत्तराखंड के बाद अब गुजरात देश का दूसरा ऐसा राज्य बनने जा रहा है, जहां समान नागरिक संहिता कानून (UCC) लागू होगा. मंगलवार को मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने विधानसभा में इसका बिल पेश किया. यह विचार सैद्धांतिक रूप से बेहद मजबूत है कि शादी, तलाक और उत्तराधिकार जैसे निजी कानून सभी नागरिकों के लिए एक समान होने चाहिए. लेकिन, किसी भी बड़े कानूनी बदलाव की तरह, गुजरात के इस प्रस्तावित बिल को लेकर भी जहां एक ओर उम्मीदें हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ गंभीर सवाल भी हैं.

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भारत में 'एक देश, एक कानून' की बहस दशकों पुरानी है. लेकिन, विविधताओं से भरे इस देश में एकरूपता लाने की कोशिशें हमेशा चुनौतीपूर्ण रही हैं. भाजपा के एजेंडे में राम मंदिर निर्माण और कश्मीर से धारा 370 के खात्मे के बाद समान नागरिक संहिता ही एकमात्र महत्वाकांक्षी पड़ाव है, जिसे हासिल करने की कसमें खाती पार्टी नेतृत्व की कई पीढ़ियां खप गईं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में ही राम मंदिर और धारा 370 से जुड़े लक्ष्य हासिल हुए. जबकि UCC पर व्यापक बहस के बीच पहला कदम उत्तराखंड में रखा गया. अब जबकि गुजरात में यह बिल पेश हो गया, तो माना जा जा सकता है कि पार्टी इसके देशव्यापी स्वरूप पर गंभीरता से काम कर रही है. लेकिन, गुजरात में आया UCC बिल पुरानी बहस में नई जान फूंक रहा है. कई सवाल हैं, जिनका जवाब गुजरात सरकार और बीजेपी नेतृत्व को देना होगा.

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‘महिला अधिकार’ से आदिवासी अलग क्यों?

बिल का सबसे मजबूत पक्ष महिला सशक्तिकरण माना जा रहा है. इसमें हलाला और बहुविवाह (Polygamy) जैसी प्रथाओं पर रोक लगाने का प्रस्ताव है. सरकार ने स्पष्ट किया है कि बिल में अल्पसंख्यकों में होने वाली कजिन मैरिज की मान्यता को बरकरार रखा गया है. क्योंकि इस बिल का उद्देश्य धार्मिक मान्यताओं से छेड़छाड़ करना नहीं है. निकाल हलाला पर पाबंदी लगाने का प्रस्ताव है, क्योंकि यह महिलाओं की गरिमा के हक में नहीं है.

सकारात्मक पक्ष: समर्थकों का तर्क है कि यह कदम मुस्लिम महिलाओं को कानूनी सुरक्षा देगा और उन्हें बराबरी का हक दिलाएगा. शादी की कानूनी उम्र और तलाक के समान नियम लैंगिक समानता (Gender Equality) की दिशा में बड़ा रिफॉर्म हो सकते हैं.

उठता सवाल: लेकिन क्या इन सुधारों का लाभ सभी को मिलेगा? गुजरात की 15% आबादी आदिवासी है, जिन्हें इस बिल से बाहर रखा गया है. अगर सुधार का मकसद महिलाओं को सशक्त बनाना है, तो क्या आदिवासी बहनों को इन आधुनिक कानूनों की जरूरत नहीं है? सरकार का तर्क है कि उनकी सांस्कृतिक विशिष्टता को बचाना जरूरी है, पर यह 'समानता' के मूल विचार पर सवाल तो खड़ा करता ही है.

लिव-इन रिलेशनशिप: सुरक्षा या निजता में दखल?

बिल में लिव-इन जोड़ों के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया है. उल्लंघन पर जेल या जुर्माने का प्रावधान है.

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सकारात्मक पक्ष: सरकार का मानना है कि इससे लिव-इन में रहने वाली महिलाओं को कानूनी पहचान मिलेगी और अपराधों (जैसे श्रद्धा वाकर केस) पर लगाम लगेगी. यह रजिस्ट्रेशन उनके भरण-पोषण (Maintenance) के अधिकार को सुरक्षित करेगा.

उठता सवाल: दूसरी ओर, आलोचक इसे 'मॉरल पुलिसिंग' कह रहे हैं. क्या दो बालिगों की निजी पसंद में सरकार का हस्तक्षेप 'राइट टू प्राइवेसी' का उल्लंघन नहीं है? क्या सरकारी डेटाबेस बनने से इन जोड़ों के सामाजिक उत्पीड़न का खतरा नहीं बढ़ जाएगा?

धार्मिक स्वतंत्रता बनाम नागरिक संहिता?

संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपने धर्म के अनुसार जीने की आजादी देता है. UCC को लेकर अल्पसंख्यकों में अपनी पहचान खोने का डर है.

सकारात्मक पक्ष: सरकार का स्पष्ट कहना है कि यह किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों को समान बनाने के लिए है. यह 'पर्सनल लॉ' की विसंगतियों को दूर कर एक आधुनिक समाज बनाने की कोशिश है.

उठता सवाल: क्या इस ड्राफ्ट को बनाने से पहले सभी समुदायों के साथ पर्याप्त संवाद किया गया? विश्वास की कमी (Trust Deficit) को दूर किए बिना क्या ऐसा कानून सामाजिक सद्भाव को मजबूत कर पाएगा?

चुनावी मंशा और व्यावहारिक चुनौतियां?

गुजरात में अगले साल चुनाव होने हैं. चुनाव के करीब इस बिल का आना इसे राजनीतिक चश्मे से देखने पर मजबूर करता है. इसे उत्तराखंड मॉडल का 'कॉपी-पेस्ट' भी कहा जा रहा है.

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सकारात्मक पक्ष: सरकार का तर्क है कि एक मॉडल कानून (उत्तराखंड) के होने से पूरे देश में एकरूपता आएगी और कानून लागू करना आसान होगा. यह किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि संवैधानिक वादे (अनुच्छेद 44) को पूरा करने के लिए है.

उठता सवाल: क्या गुजरात की सामाजिक बुनावट उत्तराखंड से अलग नहीं है? उत्तराधिकार और संपत्ति के नियम ग्रामीण इलाकों में नई कानूनी पेचीदगियां पैदा कर सकते हैं. क्या हमारी अदालतें इस नए बोझ के लिए तैयार हैं?

सवाल समानता बनाम एकरूपता का है?

समान नागरिक संहिता का विचार अपने आप में प्रोग्रेसिव है. एक आधुनिक लोकतंत्र में कानून का आधार धर्म नहीं, बल्कि नागरिकता होनी चाहिए. हालांकि, असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि यह कानून 'थोपा हुआ' न लगे, बल्कि 'सुधार' के रूप में स्वीकार किया जाए. 'यूनिफॉर्मिटी' (एकरूपता) और 'इक्वालिटी' (समानता) में अंतर होता है. एक बेहतर कानून वह है जो न केवल सबको एक तराजू में तोले, बल्कि समाज के हर वर्ग को यह महसूस कराए कि उसकी गरिमा और अधिकार सुरक्षित हैं. गुजरात का यह प्रयोग सफल तभी होगा जब यह केवल कागजों पर 'समान' न होकर, समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्तियों को न्याय दिलाने में सक्षम हो.

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