बुक vs बुक... काश, राहुल गांधी ने गलवान मोर्चे पर तैनात रहे वायके जोशी की किताब भी पढ़ ली होती!

राहुल गांधी ने पूर्व सेनाध्यक्ष मनोज नरवणे की अप्रकाशित किताब के कंटेंट से हटने का नाम नहीं ले रहे हैं. लोकसभा में जो हंगामा सोमवार से शुरू हुआ, मंगलवार को भी जारी रहा. लेकिन, 2020 के जिस गलवान संघर्ष वाले घटनाक्रम पर नरवणे की किताब के बहाने टारगेट किया जा रहा है, उस पर नार्दर्न कमांड के चीफ रहे ले. जन. वायके जोशी की किताब दूध का दूध और पानी का पानी कर देती है.

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क्या है गलवान का सच... ले. जन. वायके जोशी और मनोज नरवणे की किताबों के बीच राहुल गांधी ने विवाद को चुनाव. क्या है गलवान का सच... ले. जन. वायके जोशी और मनोज नरवणे की किताबों के बीच राहुल गांधी ने विवाद को चुनाव.

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 04 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 11:40 AM IST

2020 में लद्दाख में चीन की हरकतों ने सबको चौंका दिया. PLA ने पूर्वी लद्दाख में घुसपैठ की. भारतीय सेना ने इसका मुंहतोड़ जवाब दिया. लेफ्टिनेंट जनरल वायके जोशी (योगेश कुमार जोशी) उस समय नॉर्दर्न कमांड के चीफ थे. उन्होंने गलवान घाटी संघर्ष के दौरान भारतीय सेना का नेतृत्व किया. उनकी किताब 'हू डेयर्स विंस: ए सोल्जर्स मेमॉयर' (who dares wins: A soldier's memoir) में सब विस्तार से लिखा है. चीन ने बड़ी ताकत के साथ गलवान पर हमला किया. अगले कुछ दिनों में पांगोंग त्सो के उत्तरी किनारे पर हमले बढ़े. हॉट स्प्रिंग्स इलाके में भी LAC का उल्लंघन हुआ. फिर भारतीय सेना ने सब संभाला. 15 जून को गलवान में हिंसक झड़प हुई. योजना और तैयारी के बाद भारतीय सेना ने जैसे को तैसा वाला हिसाब किताब शुरू किया. आखिर में ऑपरेशन स्नो लेपर्ड शुरू हुआ, जिसने एक ही रात में बाजी पलट दी. इसी ऑपरेशन पर तबके आर्मी चीफ मनोज नरवणे की एक अप्रकाशित किताब Four Stars of Destiny के कुछ अंश का हवाला देकर राहुल गांधी ने बवाल खड़ा कर दिया है. दिलचस्प है यह देखना कि एक भारतीय फौजी कमांडर जो 2020 के गलवान संघर्ष के दौरान ग्राउंड जीरो पर चीन के खिलाफ मोर्चा संभाल रहा था, उसकी नजर में सेना और सरकार का समन्वय कैसा था. ताकि, राहुल गांधी जो आरोप लगा रहे हैं उसका वजन तौला जा सके.

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जोशी अपनी किताब 'हू डेयर्स विंस' में लिखते हैं कि PLA की कार्रवाई ने भारत-चीन संबंधों को प्रभावित किया. दो साल तक चुनौतियां रहीं. लेकिन भारतीय सेना ने हालात को चतुराई से संभाला. घुसपैठ को रोका. पेंगोंग त्सो पर मजबूत पकड़ बनाई. जोशी कहते हैं कि हमने PLA को पीछे धकेला. वे हारकर लौटे. किताब में कर्गिल युद्ध के अनुभव भी हैं. लेकिन 2020 के पूर्वी लद्दाख में हुए संघर्ष पर फोकस है. वे कहते हैं कि PLA ने भारतीय सेना की ताकत को कम आंका. चीन के जूनियर कमांडरों के अतिउत्साह ने हालात बिगाड़े. लेकिन भारतीय जवानों ने सम्मान के लिए लड़ाई लड़ी. उनकी ट्रेनिंग और मोटिवेशन ने जीत दिलाई. ऑपरेशन स्नो लेपर्ड ने इतिहास रचा. यह अतीत में हुए सुमदोरोंग चू या नाथू ला से बड़ा था. हमने 5 मई को पहली घुसपैठ देखी. वो हेलीकॉप्टर से गलवान में उतरने की कोशिश थी. लेकिन भारतीय सेना ने तुरंत जवाब दिया. यूएवी से निगरानी की. ब्रिगेड को इंडक्ट किया. PLA ने रायट कंट्रोल गियर इस्तेमाल किए थे. लेकिन भारतीय सेना ने डटकर मुकाबला किया. गलवान में हमारे 20 फौजी शहीद हुए. लेकिन, PLA के 40 से ज्यादा मारे गए. हालांकि, वे इसे मानते नहीं.

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2020 में लद्दाख के रेचिन ला में आमने-सामने आए भारतीय और चीनी टैंक वापसी करते हुए.

जोशी कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने सेना को फ्री हैंड दिया. सेना ने मिलिटरी स्तर पर कार्रवाई की. चीन को ऐतिहासिक सबक मिला. फिर राजनीतिक स्तर पर डिप्लोमेसी चली. किताब के अंश से साफ है कि भारत ने इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया. सड़कें, शेल्टर, कुएं, सब तेजी से. पहले उपेक्षा थी. अब मजबूत. जोशी की किताब से पता चलता है कि भारतीय सेना ने चीन के हर मंसूबे को तोड़ा. बहादुरी और रणनीति से.

क्या थी ऑपरेशन स्नो लेपर्ड की कामयाबी

ऑपरेशन स्नो लेपर्ड ने चीन को झुका दिया. जोशी की किताब में विस्तार है. 29-30 अगस्त को PLA ने स्पांगुर गैप पर हमला किया. गुरुंग हिल्स पर. फिंगर 4 तक दावा किया. भारत ने पहले ही दक्षिणी किनारे पर ब्रिगेड तैनात की. रेजांग ला पर आर्मर लगाया. मोल्डो गैरिसन पर नजर. रात में उत्तर किनारे पर ऊंचाई ली. PLA को पता नहीं चला. सुबह सरप्राइज मिला. वे रिएक्ट नहीं कर सके. ऊंची चोटियों पर भारतीय सैनिकों का कब्जा था. फिर सेना ने चीन के रास्ते बंद कर दिए. आखिर में वे बातचीत पर आए. डिसएंगेजमेंट शुरू हुआ. फरवरी 2021 में. अप्रैल 2020 वाली स्थिति बहाल हुई. जोशी कहते हैं कि यह बड़ा ऑपरेशन था. भारत की रणनीति जीती. किताब के अंश से साफ है. PLA एक बड़ी ताकत के साथ आई. लेकिन भारत ने उसे चतुराई से हराया.

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मनोज नरवणे के बयान, उनकी कथित किताब के कंटेंट से मेल नहीं खाते

राहुल गांधी ने लोकसभा में मनोज नरवणे की अप्रकाशित किताब 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' का हवाला दिया. वे कहते हैं कि सरकार ने फैसला नहीं लिया. चीनी टैंक रेचिन ला पर आए. नरवणे ने फोन किए. लेकिन निर्देश नहीं मिले. कथित रूप से किताब में लिखा है कि 31 अगस्त 2020 को चीनी टैंक आगे बढ़े. जोशी ने नरवणे को बताया. नरवणे ने राजनाथ सिंह, अजित डोभाल, बिपिन रावत और एस जयशंकर को फोन किया. पूछा कि आदेश क्या हैं. पहले निर्देश नहीं मिले. बाद में राजनाथ ने कहा कि ‘जो ठीक लगे करो‘. नरवणे ने इसे फ्री हैंड माना. भारतीय टैंक आगे किए. चीनी रुक गए. कोई गोली नहीं चली. लेकिन राहुल गांधी इसे सरकार की अनिर्णय की मिसाल बताते हैं. किताब अप्रकाशित है. डिफेंस मिनिस्ट्री से क्लियरेंस नहीं मिला है. कुछ मीडिया कवरेज में मोदी सरकार को नीचा दिखाने की गरज से कॉमेंट्री छापी. लेकिन नरवणे के दूसरे बयान एक अलग तस्वीर पेश करते हैं.

2021 में 'एएनआई' को इंटरव्यू में नरवणे ने कहा कि एक इंच जमीन नहीं खोई. हम अप्रैल 2020 की स्थिति में हैं. डिसएंगेजमेंट से सब संभला. कोई क्षेत्र नहीं गंवाया. वे कहते हैं कि भारत ने चीन को चौंका दिया. कैलाश रेंज पर कब्जा किया. गलवान के बाद प्रधानमंत्री ने सेना को फ्री हैंड दिया. राजनीतिक स्तर पर बातचीत चली. सेना ने मिलिटरी कार्रवाई की. उनके बयानों से साफ है कि समन्वय अच्छा था. गलवान में 20 जवान शहीद हुए. लेकिन भारत ने PLA को सबक सिखाया. नरवणे कहते हैं कि अगर फायरिंग होती तो कुछ भी हो सकता था. लेकिन संयम रखा. सरकार और सेना ने मिलकर काम किया.

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'रेडिफ' को दिए इंटरव्यू में कहा कि सैनिकों ने बहादुरी दिखाई. चीन को रोका. उनके संस्मरण में एक घटना का जिक्र है. लेकिन कुल मिलाकर भारत की जीत है. राहुल गांधी चुनिंदा अंश उठाते हैं. लेकिन नरवणे के इंटरव्यू से पता चलता है कि सरकार ने सेना का साथ दिया. इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाया. फोर्स लेवल मजबूत किया. डिसएंगेजमेंट हुआ. अक्टूबर 2024 तक पूरा एलएसी पर. डेमचोक और डीबीओ पर भी. नरवणे कहते हैं कि हमारी स्थिति मजबूत है. चीन को पीछे जाना पड़ा. फिंगर 8 से आगे. पांगोंग त्सो पर. यह समन्वय का नतीजा है. किताब में एक रात की बात है. लेकिन कुल संघर्ष में सरकार और सेना एक थे. जोशी की किताब भी यही कहती है. प्रधानमंत्री ने फ्री हैंड दिया. सेना ने कार्रवाई की.

राहुल गांधी का नैरेटिव पॉलिटिकल है, उसे समझा जा सकता है. खासतौर पर तब जबकि भाजपा की ओर से 1962 के चीन युद्ध को लेकर नेहरू पर तमाम तरह के आरोप लगाए जाते हैं. लेकिन, नरवणे के सार्वजनिक बयानों से साफ है कि राहुल गांधी जो तस्वीर दिखाना चाह रहे हैं, हकीकत उससे कुछ अलग है. भारत ने चीन को हराया है. सीमा मजबूत की है.

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