कामयाब रहा ‘ट्रंप रेस्क्यू ऑपरेशन‘, लेकिन ईरान पर जमीनी हमले का प्लान ‘स्वाहा’!

ईरान के भीतर गिरे अमेरिकी फाइटर प्लेन के दोनों पायलटों को कामयाबी से निकाल लिया गया. लेकिन, इसे ‘ट्रंप रेस्क्यू ऑपरेशन‘ कहना ज्यादा ठीक रहेगा. क्योंकि यदि ये पायलट IRGC के हत्थे चढ़ जाते, तो सबसे ज्यादा भद ट्रंप की पिटती. लेकिन, इस पूरे घटनाक्रम ने ईरान पर जमीनी हमला करने का प्लान कर रहे रणनीतिकारों ने निश्चित ही सोचने पर मजबूर कर दिया होगा.

Advertisement
ईरान से पायलट निकालकर अमेरिकी फौज ने ट्रंप को बड़ी किरकिरी से बचा लिया. ईरान से पायलट निकालकर अमेरिकी फौज ने ट्रंप को बड़ी किरकिरी से बचा लिया.

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 06 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 2:12 PM IST

ईरान युद्ध के उन 48 घंटों ने, ईरान के भीतर एक अमेरिकी फाइटर जेट गिराया गया. फिर सांसें थामकर हड़बड़ी में चलाया गया दो पायलटों को दुश्मन के इलाके से निकालने का ऑपरेशन. जिसमें पायलट तो बच गए, लेकिन अमेरिकी विमानों का नुकसान हुआ. इस सबने डोनाल्ड ट्रंप के पूरे नैरेटिव को हिलाकर रख दिया है. वही ट्रंप जो सोशल मीडिया पर बयान दे रहे थे- ‘सब कुछ हमारे कंट्रोल में है’, ‘ईरान ज्यादा देर टिक नहीं पाएगा’. लेकिन जमीन पर जो हुआ, उसने बता दिया कि जंग ट्रुथ सोशल की पोस्ट से नहीं, ताकत और तैयारी से जीती जाती है.

Advertisement

ईरान वॉर की जमीनी हकीकत समझनी हो तो जरा ट्रंप की भाषा पर ध्यान दीजिए. शुरुआत में वे बेहद आक्रामक थे- ‘हम ईरान को घुटनों पर ला देंगे’, ‘अगर उन्होंने कुछ किया तो जवाब मिलेगा जैसा उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा.’ लेकिन जैसे-जैसे हालात बिगड़े, उनकी भाषा भी बिखरने लगी. बयान और सोशल मीडिया पोस्ट अस्थिर, ज्यादा इमोशनल और विरोधाभासी नजर आ रहे हैं. ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट से होने वाली जहाजों की आवाजाही को अपने नियंत्रण में ले लिया है, और ट्रंप की एक नहीं चल रही है. उन्होंने ईरान वॉर शुरू होने से पहले हमले के लिए जो कारण गिनाए जा रहे थे, अब वे नदारद हैं. पायलटों का सुरक्षित निकल आना ट्रंप के लिए राहत जरूर है, लेकिन जिस तरह से ऑपरेशन हुआ और जो नुकसान हुआ, उसने निश्चित ही उन्हें भीतर से झकझोर दिया होगा.

Advertisement

मामला सिर्फ एक F-15E के गिरने का नहीं था. यह उस पूरे दावे पर चोट थी, जिसमें अमेरिका खुद को ‘एयर सुपीरियरिटी’ का बेताज बादशाह मानता है. ट्रंप लगातार कह रहे थे कि ईरान के ऊपर आसमान में अमेरिका का पूरा कब्जा है. लेकिन जैसे ही यह फाइटर जेट गिरा, यह साफ हो गया कि ईरान का एयर डिफेंस सिस्टम अभी भी जिंदा है. सक्रिय है और खतरनाक है. यह कोई 2003 वाला इराक नहीं है, जहां पहले हफ्ते में ही आसमान पर कब्जा हो गया था. असल कहानी तो इसके बाद शुरू होती है.

पायलट रेस्क्यू ऑपरेशन के सबक

2 अप्रैल को दो अमेरिकी पायलट दुश्मन इलाके में गिरते हैं और उन्हें निकालना ‘नेशनल प्रेस्टिज’ का सवाल बन जाता है. अगर ये पायलट इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के हाथ लग जाते, तो ट्रंप की पूरी दुनिया में किरकिरी तय थी. अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए इससे बड़ी राजनीतिक और सैन्य शर्मिंदगी शायद ही कोई और होती. यही कारण था कि उन दो दिनों में ट्रंप भी सांसें थामकर बैठे रहे.

भारी दबाव में रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू हुआ. MC-130J स्पेशल ऑप्स विमान, ब्लैक हॉक हेलिकॉप्टर, ड्रोन, नेवी सील्स कमांडो— सब कुछ झोंक दिया गया. लेकिन यह कोई फिल्मी मिशन नहीं था, जहां हीरो जाता है और बिना खरोंच लौट आता है. ईरान ने इस ऑपरेशन को भी हल्के में नहीं लिया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, रेस्क्यू के दौरान अमेरिकी विमानों और ड्रोन को निशाना बनाया गया. सौ-सौ मिलियन डॉलर के दो MC-130J ईरान की जिस हवाई पट्टी पर उतरे, वे फिर उड़ ही नहीं पाए. एक ब्लैक हैलिकॉप्टर भी वहीं तबाह हुआ. जैसे-तैसे पायलट को निकाला गया. यानी अमेरिका को अपने ही दो पायलटों को बचाने के लिए काफी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. यह कीमत सिर्फ मशीनों की नहीं थी. यह उस ‘अजेय’ छवि की थी, जिसे अमेरिका दशकों से गढ़ता आया है.

Advertisement

अमेरिकी सेना के भीतर फायरिंग क्यों?

एक और दिलचस्प पहलू है अमेरिकी सेना के भीतर हो रही हलचल से जुड़ी. खबरें हैं कि कई जनरलों को हटाया गया या किनारे किया गया. सवाल उठ रहे हैं कि क्या सेना ट्रंप के जमीनी हमले के प्लान से सहमत नहीं थी? इतिहास गवाह है कि जब भी पॉलिटिकल लीडरशिप और मिलिट्री लीडरशिप के बीच दूरी बढ़ती है, तो फैसले ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं. ईरान को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यही रही है कि उसे सिर्फ प्रतिबंधों और कमजोर इकोनॉमी के नजरिये से देखा गया. लेकिन फारस की खाड़ी का भूगोल, ईरान की मिसाइल क्षमता, उसकी वॉर स्ट्रैटेजी और सबसे बढ़कर उसकी ‘असिमेट्रिक वॉरफेयर’ की तैयारी को नजरअंदाज किया गया.

इरान के साथ मुकाबला वन-साइडेड नहीं

फारस की खाड़ी कोई खुला मैदान नहीं है, जहां अमेरिका अपनी पूरी ताकत के साथ उतर जाए. अमेरिका के पास पैर फैलाने के लिए ज्यादा जगह नहीं है. फारस की खाड़ी एक संकरा समुद्री रास्ता है, जहां ईरान के पास छोटी-छोटी नावों से लेकर एंटी-शिप मिसाइलों तक का ऐसा नेटवर्क है, जो बड़े से बड़े वॉरशिप को भी चैलेंज कर सकता है. और अब यह साफ हो चुका है कि उसका एयर डिफेंस भी कमजोर नहीं है. इसके अलावा आसपास के खाड़ी देश, सहमे हुए हैं. वे अमेरिका के साथ खुलकर खड़े नहीं होना चाहते. ताकि, ईरान को उन पर बड़ा हमला करने का मौका मिले. कुल मिलाकर, जमीनी हमले की बात अब ‘आसान विकल्प’ नहीं लगती. ट्रंप की बातों से लग रहा था कि बस फैसला लिया गया और सेना अंदर चली गई. अब ऐसा होना हकीकत से काफी दूर है.

Advertisement

ईरान का हर शहर, हर पहाड़ी, हर गली वॉर जोन बन सकती है. IRGC और उससे जुड़े नेटवर्क वर्षों से इसी तरह के युद्ध के लिए तैयार हैं. उनके लिए यह सिर्फ लड़ाई नहीं, अस्तित्व का सवाल है. अमेरिका के लिए समस्या सिर्फ ईरान नहीं है. यह एक ‘मल्टी-फ्रंट’ चैलेंज बन सकती है. अगर जमीनी हमला होता है, तो इराक, सीरिया, लेबनान और यहां तक कि यमन तक इसके असर फैल सकते हैं. अमेरिकी ठिकाने, दूतावास, सहयोगी देश- सब निशाने पर आ सकते हैं.

इन 48 घंटों ने एक बात बिल्कुल साफ कर दी कि ईरान को कम आंकना भारी गलती हो सकती है. F-15E का गिरना, रेस्क्यू ऑपरेशन में मुश्किलें, अमेरिकी एसेट्स को नुकसान छोटे संकेत नहीं हैं. ये उस बड़े सच की तरफ इशारा करते हैं कि यह युद्ध ‘वन-साइडेड’ नहीं होने वाला.

फिलहाल तो जो दिख रहा है, वह यही है कि ईरान पर जमीनी हमले का प्लान कागज पर जितना आसान लगता था, हकीकत में उतना ही ‘स्वाहा’ होता नजर आ रहा है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement