महाराष्ट्र की राजनीति में हमेशा से गठबंधनों का खेल रहा है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने विशेषकर बीएमसी चुनावों के बाद एक नई बहस छिड़ गई है. क्या भारतीय जनता पार्टी को अब अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की जरूरत बची है? दरअसल स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों ने इस सवाल को प्रासंगिक बना दिया है. जहां बीजेपी ने जबरदस्त जीत हासिल की है, जबकि अजित पवार की एनसीपी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. एक तरफ बीजेपी के राज्य स्तर के नेता एनसीपी से दूरी बनाने की पैरवी कर रहे हैं, वहीं केंद्र स्तर पर पार्टी चैनल खुले रखना चाहती है. तो क्या महाराष्ट्र में बीजेपी की बढ़ती ताकत और एनसीपी की कमजोरियां इस गठबंधन को तोड़ने की ओर इशारा कर रही हैं.
महाराष्ट्र की राजनीतिक पृष्ठभूमि और महायुति गठबंधन का उदय
महाराष्ट्र की राजनीति हमेशा से जटिल रही है, जहां जातीय समीकरण, क्षेत्रीय प्रभाव और वैचारिक गठबंधन मिलकर सत्ता का खेल खेलते रहे हैं. 2019 के विधानसभा चुनावों के बाद उद्धव ठाकरे की शिवसेना, शरद पवार की एनसीपी और कांग्रेस ने महा विकास अघाड़ी (एमवीए) बनाकर सरकार बनाई थी. लेकिन 2022 में एकनाथ शिंदे की बगावत और 2023 में अजित पवार के एनसीपी स्प्लिट ने राजनीतिक परिदृश्य बदल दिया. अजित पवार ने शरद पवार से अलग होकर अपनी एनसीपी बनाई और बीजेपी-शिवसेना (शिंदे गुट) के साथ महायुति गठबंधन में शामिल हो गए. इससे बीजेपी को महाराष्ट्र में मजबूती मिली, खासकर मराठा और ग्रामीण वोट बैंक के जरिए.
महायुति गठबंधन में बीजेपी की भूमिका प्रमुख है, लेकिन एनसीपी के साथ संबंध असहज रहे हैं. इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार बीजेपी के एक अंदरूनी सूत्र का बयान है कि आगामी चुनावों में बीजेपी एनसीपी के साथ कोई चुनाव पूर्व समझौता नहीं करेगी. यह एनसीपी के खराब प्रदर्शन और दशक पुरानी असुविधा का संकेत है, जो अजित पवार के सिंचाई घोटाले से जुड़ी है. केंद्र बीजेपी एनसीपी और एनसीपी (एसपी) के मर्जर के बाद भी संबंध खुले रखना चाहती है, लेकिन राज्य स्तर पर एक वर्ग संगठनात्मक विस्तार पर फोकस करना चाहता है. बीजेपी का लक्ष्य 51% वोट शेयर हासिल करना है, जो फिलहाल अभी 26% प्रतिशत के करीब ही है. अन्य स्रोतों से पता चलता है कि 2024 लोकसभा चुनावों में बीजेपी की सीटें घटने (महाराष्ट्र में 9 सीटें) के बाद गठबंधन में दरारें आईं.
दरअसल बीजेपी का एनसीपी के साथ गठबंधन से आरएसएस नेता भी खुश नहीं थे. आरएसएस के मुखपत्र 'ऑर्गनाइजर' ने बीजेपी की आलोचना की थी कि भ्रष्टाचार के आरोपी अजित पवार के साथ गठबंधन करने की क्या जरूरत थी. तमाम राजनीतिक विश्लेषकों ने भी माना कि बीजेपी ने अजित पवार के साथ गठबंधन करके भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी लड़ाई को कमतर कर दिया. यह भी कहा गया था कि इससे पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है. पर जिस तरह महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में लोगों ने महायुति को समर्थन दिया था उससे इस तरह की आलोचना करने वालों के मुंह सिल गए थे.
2026 स्थानीय निकाय चुनाव, बीजेपी की लैंडस्लाइड विक्ट्री और एनसीपी की दुर्गति
जनवरी 2026 में हुए 29 नगर निगमों, जिला परिषदों और पंचायत समितियों के चुनावों ने महाराष्ट्र की राजनीति को नया मोड़ दिया. बीजेपी ने महायुति गठबंधन के साथ 6859 वार्ड सीटों में से 3091 सीटें जीत ली. नगर निगमों में बीजेपी ने 1425 सीटें जीतीं, जबकि शिंदे शिवसेना को 399, कांग्रेस को 324, अजित एनसीपी को 167 और उद्धव शिवसेना को 155 सीटें मिलीं.
बीजेपी ने पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ में पवार परिवार के गढ़ को तोड़ा, जहां अजित और शरद पवार ने गठबंधन किया लेकिन हार गए. पुणे नगर निगम में बीजेपी ने 119 सीटें जीतीं, जबकि अजित एनसीपी को 27 और शरद एनसीपी को 3 सीटें मिलीं. पिंपरी-चिंचवाड़ में बीजेपी ने 84 सीटें जीतीं. बीजेपी ने पवारों को उनके गढ़ में हराया, जो महायुति की ताकत दिखाता है.
अजित पवार ने हार स्वीकार की और मीडिया से कहा कि जनादेश सर्वोपरि है, हम चर्चा करेंगे. लेकिन यह हार एनसीपी की कमजोरी उजागर करती है. दरअसल पवारों के गठबंधन को आम लोगों ने मौकापरस्ती समझा जिसके चलते बैकफायर हो गया. वोट स्प्लिट से बीजेपी को फायदा मिला पार्टी ने मुंबई बीएमसी में 30 साल के शिवसेना कंट्रोल को तोड़ा, 1372 सीटें जीत ली.
बीजेपी को क्यों नहीं रही अजित पवार की जरूरत?
बीजेपी की हालिया जीत से स्पष्ट है कि पार्टी अब एनसीपी पर निर्भर नहीं है. बीजेपी नेता कहते हैं कि एनसीपी से अलग होकर संगठन विस्तार पर फोकस करेंगे. अजित पवार के सिंचाई घोटाले की वजह से आम लोगों के बीच पैठ बनाने में मुश्किल आती है. इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट में लिखा है कि राज्य बीजेपी का एक वर्ग एनसीपी से छुटकारा चाहता है, क्योंकि लोकल इलेक्शन्स ने बीजेपी को आत्मनिर्भर बना दिया है.
पवार परिवार की हार से एनसीपी की प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहा है. आलोचक कह रहे हैं कि बीजेपी का यूज एंड थ्रो पॉलिसी के शिकार अजित पवार भी हो सकते हैं. बीजेपी का लक्ष्य 10-15% अधिक वोट है, जो एनसीपी के बिना संभव लगता है. बीजेपी की शिंदे शिवसेना के साथ वैचारिक एकता है, क्योंकि शिवसेना हिंदुत्व से जुड़ी है, एनसीपी से नहीं . लेकिन शिंदे के साथ भी टकराव हैं.
शिंदे सेना और बीजेपी से टकराव की खबरों से पवार को कुछ दिन का मिल सकता है राहत
बीएमसी चुनावों के बाद खबर आ रही है कि शिंदे के कॉर्पोरेटर्स को होटल में शिफ्ट किया गया, ब्रेकअप की अफवाहें हैं. दूसरी तरफ डोंबीवली-कल्याण से ऐसी खबरें हैं कि शिंदे और राज ठाकरे ने यहां हाथ मिला लिया है. महाराष्ट्र की राजनीति कभी भी किसी तरफ मुड़ सकती है. जाहिर है कि ऐसी दशा में बीजेपी कतई नहीं चाहेगी कि एक और साथी से हाथ धो बैठे. इसके उलट व्यवहारिक दृष्टि से यह भी संभव है कि एनसीपी (शरद पवार गुट ) को भी महायुति में ले आया जाए. इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार राज्य भाजपा के एक नेता ने कहा कि गठबंधन की राजनीति से इनकार नहीं किया जा सकता. अगर शरद पवार की एनसीपी (एसपी) अजीत पवार की एनसीपी के साथ सुलह के बाद भाजपा के साथ भी संबंध सुधार लेती है, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए. शरद पवार की पार्टी के पास लोकसभा में 8 सांसद हैं. अगर हम उनका समर्थन हासिल कर लेते हैं, तो भाजपा की शिंदे पर निर्भरता कम हो जाएगी.
संयम श्रीवास्तव