क्या विपक्ष की 'मुस्लिम पॉलिटिक्स' ने भाजपा का काम आसान कर दिया

विधानसभा चुनावों के नतीजों ने साबित किया कि अब सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि मजबूत 'नैरेटिव' ही चुनाव जिताता है, केरल से लेफ्ट की विदाई और बंगाल में भाजपा के प्रवेश के पीछे के असली चुनावी और सामाजिक कारण क्या हैं?

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क्या अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीति विपक्ष पर ही भारी पड़ गई (Photo-ITG) क्या अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीति विपक्ष पर ही भारी पड़ गई (Photo-ITG)

अंजना ओम कश्यप

  • नई दिल्ली ,
  • 05 मई 2026,
  • अपडेटेड 3:45 PM IST

पश्चिम बंगाल और असम के चुनावी नतीजों से देश के सियासी गलियारों में हलचल है. आखिर भाजपा ने बंगाल का अभेद्य किला कैसे ढहाया और असम में अपनी जड़ें और मजबूत कैसे कीं. 'पहचान की राजनीति' से लेकर 'संगठनात्मक कमजोरी' तक, इस चुनाव के हर उस पहलू को समझने के लिए पढ़िए TVTN की मैनिजिंग एडिटर अंजना ओम कश्यप का विश्लेषण, जो बताता है कि क्यों बंगाल और असम की जमीन पर 'तुष्टीकरण' का मुद्दा विकास और क्षेत्रीय पहचान पर भारी पड़ गया.

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  • असम और पश्चिम बंगाल में BJP की बढ़त की एक अहम वजह लगातार चलाया गया अभियान भी था, जिसमें TMC और कांग्रेस पर अल्पसंख्यकों को खुश करने का आरोप लगाया गया था. यह बात मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को सही लगी और हर बार जब इन पार्टियों ने यह ज़ोर देकर कहा कि उनके लिए मुसलमानों के वोट मायने रखते हैं, तो असल में वे BJP के विस्तार के लिए जमीन तैयार कर रही थीं.
  • असम में, पहचान, प्रवासन और नागरिकता से जुड़ी पुरानी चिंताओं को राजनीतिक रूप से लामबंद किया गया, जिससे BJP को पारंपरिक जातिगत और क्षेत्रीय सीमाओं से परे जाकर अपना समर्थन मजबूत करने का मौका मिला.
  • पश्चिम बंगाल में भी इसी तरह का ध्रुवीकरण देखा गया, जहां ममता बनर्जी के खिलाफ 'चुनिंदा कल्याणकारी योजनाओं' और 'मुस्लिम समुदायों के प्रति झुकाव' के आरोपों को चुनावी अभियान का मुख्य मुद्दा बनाया गया. 
  • असम विधानसभा में विपक्षी खेमे के विधायकों पर नज़र डालें, तो उनमें मुस्लिम विधायकों की तादाद काफी ज़्यादा है. यह दो वजहों को साफ दिखाता है पहली यह कि कुछ इलाकों में मुस्लिम आबादी काफी घनी है, और दूसरी यह कि इस समुदाय ने एकमुश्त होकर विपक्ष को वोट दिया है.
  • हालांकि, कांग्रेस और TMC की चुनावी असफलताओं को केवल तुष्टीकरण तक सीमित कर देना स्थिति को बहुत ज़्यादा सरल बना देता है. संगठनात्मक कमज़ोरी, नेतृत्व में कमी और BJP की मजबूत जमीनी रणनीति भी उतनी ही निर्णायक कारक थीं.
  • कुल मिलाकर, दोनों राज्यों के चुनाव इस बात को उजागर करते हैं कि धारणा, नैरेटिव-बिल्डिंग और पहचान की राजनीति किस तरह मतदाताओं के व्यवहार को प्रभावित कर सकती है. बंगाल में BJP की जीत इस बात को साबित करती है. 

यह भी पढ़ें: 'हिंदुत्व अब बंगालियों के मन में भी बैठ गया', पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी की बढ़त पर बांग्लादेश की मीडिया क्या कह रही

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