केजरीवाल के केस ने तो बाकी दलों के लिए खतरा पैदा कर दिया है!

दिल्ली हाईकोर्ट का ये मान लेना कि आम आदमी पार्टी भी एक कंपनी की ही तरह है, बाकी राजनीतिक दलों के लिए भी बड़ी मुसीबत है. भ्रष्टाचार के मामलों में अब तो जिम्मेदार पदाधिकारी भी जांच के दायरे में आ जाएंगे - और क्षेत्रीय दलों के लिए तो और भी मुसीबत है जहां परिवार ही पार्टी चलाता है.

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अरविंद केजरीवाल की राजनीति का साइड इफेक्ट बाकी पार्टियों पर भी पड़ सकता है. अरविंद केजरीवाल की राजनीति का साइड इफेक्ट बाकी पार्टियों पर भी पड़ सकता है.

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 10 अप्रैल 2024,
  • अपडेटेड 5:32 PM IST

भले ही दिल्ली शराब नीति केस कारण बना हो. भले ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद का हाई कोर्ट में गिरफ्तारी को चैलेंज करना उलटा पड़ा हो. भले ही आम आदमी पार्टी PMLA की धारा 70 के तहत जांच के दायरे में आने वाली पहली पार्टी हो - लेकिन ये मामला देश के सभी राजनीतिक दलों के लिए जोर जोर से खतरे की घंटी बजा रहा है, खासतौर से क्षेत्रीय दलों के लिए.

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करीब छह महीने पहले सुप्रीम कोर्ट में पहली बार ये मामला उठा था. अक्टूबर, 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय से सवाल किया था कि दिल्ली शराब नीति केस में अगर आम आदमी पार्टी को फायदा हुआ है, तो उसे आरोपी क्यों नहीं बनाया गया? 

और उसके बाद से ही प्रवर्तन निदेशालय इसके कानूनी पहलुओं पर विचार करने लगा था. जब अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपनी गिरफ्तारी और रिमांड को चैलेंज किया तो सुनवाई के दौरान केस को मजबूत करने के लिए ईडी ने दावा किया कि शराब घोटाले से आम आदमी पार्टी को फायदा हुआ है. इस तरह आम आदमी पार्टी ने अपराध किया है - और दिल्ली हाई कोर्ट ने ईडी की ये बात मान भी ली.

ऐसा होते ही अब आम आदमी पार्टी को भी दिल्ली शराब नीति केस में आरोपी बनाने का रास्ता साफ हो गया है. हाई कोर्ट के फैसले से ये साफ हो गया है कि दिल्ली शराब घोटाला केस में पूरी आम आदमी पार्टी ही जांच के दायरे में आ सकती है - दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में माना है कि राजनीतिक दल होते हुए भी आम आदमी पार्टी एक कंपनी जैसी ही है.

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अब बात जब हाई कोर्ट से 'निकली है तो दूर तलक जाएगी' - मतलब, अगर कोई भी राजनीतिक दल ऐसे कथित घोटाले या भ्रष्टाचार की जांच के दायरे में आ सकता है. जाहिर है, उसके जिम्मेदार पदाधिकारी भी जांच के दायरे होंगे - और क्षेत्रीय दलों के लिए तो और भी मुश्किल खड़ी हो सकती है.

राजनीतिक दल या प्राइवेट लिमिटेड कंपनी?

अगर तकनीकी परिभाषा के चक्कर में न पड़ें तो कंपनियां कारोबार के लिए बनाई जाती हैं, लेकिन राजनीतिक दलों का मकसद अलग होता है. एनजीओ जिन्हें गैर-सरकारी संगठन भी कहते हैं, उनका मकसद तो सेवा ही है, राजनीतिक दलों के नेता भी अपना पेशा समाजसेवा ही बताते रहे हैं - लेकिन अब तो लगता है, राजनीतिक दलों को भी कंपनी की तरह ही देखा जाने लगेगा. मानो वे 'प्रॉफिट मेकिंग' के लिए बनाए गए हों.

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत राजनीतिक दल की परिभाषा भी 'association or body of individuals' होती है, और PMLA की धारा 70 के तहत कंपनी की परिभाषा भी 'association of individuals' यानी लोगों का समूह ही है. हाई कोर्ट ने ईडी की तरफ से पेश वो दलील मान ली है कि आम आदमी पार्टी भी एक कंपनी की तरह काम कर रही थी - और इसे PMLA की धारा 70 के तहत कंपनी के रूप में ही देखा जाना चाहिये.

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दिल्ली शराब नीति केस में हाई कोर्ट के ताजा फैसले को ध्यान से देखें तो कुछ बातें साफ हो जाती हैं - और सबसे खास बात है कि राजनीतिक दल और प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बहुत फर्क नहीं रह गया है. 

1. अदालत की टिप्पणी को समझें तो अब राजनीतिक दलों को मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के दायरे में लाने की अनुमति दे दी गई है - और प्रवर्तन निदेशालय के लिए अब अरविंद केजरीवाल और दूसरे नेताओं सहित आम आदमी पार्टी को भी आरोपी बनाने का रास्ता साफ हो गया है. 

2. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा है कि राजनीतिक पार्टी भी PMLA यानी प्रिवेन्शन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट की धारा 70 के दायरे में आती है, क्योंकि ये भी कंपनी की तरह ही 'एसोसिएशन ऑफ इंडीविडुअल्स' है. 

3. PMLA की धारा 70 में किसी कंपनी के किये अपराधों के लिए सजा का प्रावधान किया गया है. धारा 70 के अनुसार, जब कोई कंपनी मनी लॉन्ड्रिंग करती है, तो हर व्यक्ति जो अपराध के समय उस कंपनी का प्रभारी या जिम्मेदार था, उसे भी दोषी माना जाएगा - और उसके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी. 

अब तो पूरी आम आदमी पार्टी ही जांच के दायरे में

देखा जाये तो अब सिर्फ अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया या संजय सिंह ही नहीं, बल्कि पूरी आम आदमी पार्टी ही जांच के दायरे में. जो भी पदाधिकारी किसी ऐसे ओहदे पर है जो पार्टी के संचालन से सीधे सीधे जुड़ा है, सभी आरोपी बन सकते हैं. 

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1. हाई कोर्ट में ED की दलील थी कि पीएमएलए की धारा 70 के तहत आम आदमी पार्टी को एक कंपनी माना जाएगा और पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक होने के नाते अरविंद केजरीवाल इसके तहत होने के वाले कामकाज के जिम्मेदार होंगे. और ऐसे में, ईडी के मुताबिक, पीएमएलए की धारा 70 (1) के तहत अरविंद केजरीवाल ही सारी बातों के लिए उत्तरदायी हैं.

2. अदालत में ईडी की दलील थी कि अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय स्तर पर आम आदमी पार्टी के प्रभारी होने के साथ साथ पार्टी की सभी प्रमुख गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं - लिहाजा, अरविंद केजरीवाल ही चुनाव के लिए फंड के रिलीज करने और खर्च के लिए भी जिम्मेदार हैं.

3. ईडी ने अदालत को बताया है कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली शराब नीति घोटाले की साजिश में आंतरिक रूप से शामिल रहे हैं - और सबसे खास बात, उसमें अपराध की कमाई का इस्तेमाल आम आदमी के गोवा चुनाव कैंपेन में किया गया.

4. ईडी ने बताया कि ये सब न सिर्फ सोच समझकर, बल्कि अरविंद केजरीवाल की सक्रिय भागीदारी और मिलीभगत से किया गया है. ईडी की दलील और पेश कागजात को देखते हुए अदालत ने भी माना है कि अरविंद केजरीवाल से जुड़ी सामग्री  रिकॉर्ड पर पर्याप्त है.

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बाकी राजनीतिक दलों पर क्या असर होगा?

दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को आम आदमी पार्टी से आगे बढ़ कर देखें तो सभी राजनीतिक दलों के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है. अब तो ऐसा लगता है कि कंपनियां भले ही इलेक्टोरल बॉन्ड लेने के योग्य न हों, लेकिन आगे चल कर राजनीतिक दलों के लिए भी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी तय की जा सकती है. 

मतलब, ये भी है कि अभी तक इलेक्टोरल बॉन्ड पर जो बवाल हो रहा है, आगे चल कर उसका भी हिसाब किताब देना पड़ सकता है - और अगर उसमें पाया गया कि वो किसी पार्टी को रिश्वत के रूप में मिला है, तो इस बात की भी जांच हो सकती है कि कहीं चुनावों में उसका दुरुपयोग तो नहीं हुआ है - जैसे आम आदमी पार्टी के केस में गोवा चुनाव में मनी ट्रेल की बात की जा रही है. 

अगर लालू यादव को चारा घोटाले में मिली सजा को मिसाल के तौर पर लें, तो सजा वो अकेले भुगत रहे हैं. राष्ट्रीय जनता दल पर कोई असर नहीं हुआ है. सजा होने के बाद भी वो आरजेडी के अध्यक्ष बने रहे हैं - और भ्रष्टाचार को लेकर न तो आरजेडी पर कोई असर पड़ा है, न ही तेजस्वी यादव या परिवार के बाकी नेताओं पर - लेकिन क्या आगे भी ऐसा ही होगा?

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अब तो लगता है, आरजेडी की तरह कांग्रेस जैसी पार्टी के लिए भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं जो पहले से ही AGL से जुडे़ मामलों को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ रही है. 

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