यूपी उपचुनाव: क्या लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन से डर गए हैं अखिलेश यादव? | Opinion

उत्तर प्रदेश में 9 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनावों के लिए कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग के लिए अखिलेश यादव की नीयत साफ नहीं नजर आ रही थी. कम से कम एक जिताऊ सीट तो कांग्रेस को ऑफर करना ही चाहिए था, उसके साथ दो हारने वाली सीटें भी चल जातीं.

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संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 25 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 9:51 AM IST

क्या अखिलेश यादव कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में खत्म करना चाहते हैं? क्या समाजवादी पार्टी के मुखिया को कांग्रेस की बढ़ती लोकप्रियता से खतरा महसूस होने लगा है? क्या उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम को ऐसा लगता है कि कांग्रेस के यूपी में उत्थान से उनकी राजनीति खत्म हो जाएगी? इस तरह के तमाम सवाल उत्तर प्रदेश की राजनीतिक गलियारों में तब से तैर रहे हैं, जबसे अखिलेश यादव ने यह बताया है कि यूपी में समाजवादी पार्टी के सिंबल पर इंडिया गठबंधन सभी 9 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी. हालांकि अखिलेश इस बात को बताते हुए उन्‍होंने अपनी एक्स पोस्‍ट में कांग्रेस के प्रति निहायत ही सहृदयता वाली भाषा का इस्तेमाल किया है. पर यूपी के लोग जानते हैं कि पिछले कुछ दिनों से उपचुनावों की सीट शेयरिंग को लेकर किस तरह का बवाल मचा हुआ था. अखिलेश यादव जानबूझकर ऐसी चाल चल रहे थे कि कांग्रेस को पीछे हटने के अलावा और कोई चारा नहीं मिला. तमाम राजनीतिक लोग इसे अखिलेश यादव का ऐसा दांव बता रहे हैं, जिससे कांग्रेस चारों खानों चित हो गई है.

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दरअसल देश में बहुत तेजी से मजबूत हो रही कांग्रेस उत्तर प्रदेश में भी बहुत तेजी से अपने पुराने कोर वोटर्स के बीच में अपनी पैठ बना रही है. लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के अननोन प्रत्याशियों को भी भर-भर कर वोट मिले थे उसे देखकर अखिलेश का डरना स्वाभाविक ही लगता है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस एक सो रहे जानवर के समान है जो जाग गया तो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे राजनीतिक दलों का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा.

लोकसभा चुनावों में यूपी में कांग्रेस का प्रदर्शन

लोकसभा चुनावों के पहले भी अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग के लिए वही रणनीति अपनाई थी जो अभी कुछ दिनों से वह विधानसभा उपचुनावों में सीट शेयरिंग के लिए कर रहे थे. अखिलेश यादव बिना कांग्रेस की सहमति लिए अपनी ओर से पार्टी प्रत्याशियों की घोषणा करते गए. और बची -खुची सीटों के लिए कांग्रेस का नाम प्रस्तावित किया. ऐसा ही उन्होंने लोकसभा चुनावों के लिए किया था. लोकसभा में अमेठी और रायबरेली को छोड़कर कोई भी सीट ऐसी कांग्रेस को नहीं दी गई थी जहां कांग्रेस या समाजवादी पार्टी जीतने की स्थिति में थी. ऐसी गई गुजरी कुल 17 सीटें दी गईं जिसमें एक पीएम मोदी की सीट वाराणसी भी थी, जहां से हार पहले ही तय थी.

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फिर भी कांग्रेस ने 6 सीटें जीत लीं और 6 सीटों पर बहुत मामूली अंतर से वह जीतने से रह गई. बांसगांव में कांग्रेस प्रत्याशी सदल प्रसाद की जीत मात्र 3150 वोटों से रह गई थी. इस तरह कुल 17 सीटों में 12 सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत शानदार रहा. अमेठी में स्मृति इरानी की हार कुल 167000 के करीब बड़े अंतर हार गईं थीं. यह हार यूं ही नहीं थी. इसका सीधा मतलब था कि कांग्रेस को हर वर्ग के वोट मिले थे. इसी तरह राहुल गा्ंधी ने भी रायबरेली से करीब 290000 वोटों से यूपी सरकार में मंत्री दिनेश प्रताप सिंह को हराया था . सीतापुर, बाराबंकी और सहारनपुर और प्रयागराज में कांग्रेस की जीत शानदार रही. खुद अखिलेश और राहुल गांधी को भी नहीं पता था कि इस तरह की सफलता कांग्रेस को मिलेगी. 2014 और 2019 के मुकाबले कांग्रेस का वोट प्रतिशत भी यूपी में बढ़िया रहा.

सपा और कांग्रेस का एक ही प्रोडक्‍ट और एक जैसे कस्‍टमर हैं

यह बात तो जाहिर है कि अखिलेश यादव को अहसास हुआ होगा कि अगर कांग्रेस की जड़ अभी यूपी में नहीं काटी गई तो वह दोबारा से अपने पैर जमा सकती है. उनका ऐसा सोचना इसलिए भी लाजमी है कि यूपी में समाजवादी पार्टी आज जिस जमीन पर खड़ी है, वह कांग्रेस के नीचे से ही छीनी गई है. पहले कांग्रेस सेक्‍यूलरिज्‍म की बात करते हुए मुस्लिम और दलित वोट साधे रखती थी, लेकिन 90 के दशक से उसी सेक्‍यूलरिज्‍म की आड़ में सपा ने मुस्लिम और पिछड़ों का समीकरण बैठा लिया. लोकसभा चुनाव में दिखाई दिया कि दलित और मुस्लिम वोटर दोबारा कांग्रेस की तरफ जा रहे हैं. यह फीडबैक तो अखिलेश यादव के पास भी गया ही होगा. अखिलेश जिस पीडीए की बात करते हैं, उसमें दलित और अल्‍पसंख्‍यक को क्‍या वे कांग्रेस की झोली में जाते यूं ही देखते रहते. यूपी में सेक्‍यूलरिज्‍म का झंडा कोई एक ही उठा सकता है. फिलहाल तो कमान अखिलेश के हाथ है. भले उन्‍हें इंडिया गठबंधन का झंडाबर्दार मान लिया जाए.

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क्यों ऐसा लगता है कि अखिलेश ने जानबूझकर ये सब किया

अखिलेश यादव को अगर कांग्रेस को कुछ सीटें देने का मन होता तो इस तरह नहीं करते कि पहले ही जिताऊ सीटों पर अपने प्रत्याशी घोषित कर देते. अगर उनकी नियत साफ होती तो बिना कांग्रेस से बातचीत किए किसी भी सीट पर अपने प्रत्याशियों की घोषणा नहीं करते. कांग्रेस कोई इतनी छोटी पार्टी भी नहीं है कि उसके साथ इस तरह गैर पेशेवर व्यवहार किया जाए. कांग्रेस का अपना वोट बैंक है जिसका फायदा अखिलेश यादव को भी मिलता. पर अखिलेश यादव आज की तारीख में यही चाहते होंगे कि भले ही उनके प्रत्याशी न जीतें पर कांग्रेस के भी प्रत्याशी नहीं जीतने चाहिए. गाजियाबाद और खैर की सीट उन्होंने कांग्रेस को देने के लिए छोड़ रखी थी. उत्तर प्रदेश की राजनीति समझने वाले सभी लोग जानते हैं कि ये दोनों सीटें कांग्रेस ही नहीं समाजवादी पार्टी भी नहीं जीत सकती थी. अखिलेश को कम से कम एक जिताऊ सीट का भी ऑफर करना चाहिए था उसके साथ 2 हारने वाली सीटें भी चल जातीं. पर जब नियत ही नहीं थी कांग्रेस यूपी में अपने पैर पसारे तो यह कैसे होता.

क्या कांग्रेस भी अखिलेश को आईना दिखाना चाहती है?

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एक कयास यह भी है कि कांग्रेस ने जानबूझकर उपचुनाव की सीटें छोड़ दी हैं. दरअसल कांग्रेस चाहती है कि अखिलेश यादव को भी आईना दिखाया जाए. दरअसल अखिलेश यादव की उड़ान को कंट्रोल करने के लिए यह जरूरी था. कांग्रेस अगर उपचुनावों में अखिलेश यादव को सपोर्ट न करे तो समाजवादी पार्टी के लिए यह नुकसानदायक साबित हो सकता है. अगर कांग्रेस ने थोड़ी और हिम्मत दिखाते हुए अपने कैंडिडेट खड़े कर दिए होते तो अखिलेश यादव को अपनी पार्टी की कूवत पता चल जाती. दरअसल लोकसभा चुनावों मे दलित वोट जो समाजवादी पार्टी को मिले उसमें कांग्रेस का भी योगदान था. दलित और मुसलमान दोनों अपनी मूल पार्टी कांग्रेस की ओर लौट रहे हैं. अगर कांग्रेस के कैंडिडेट भी समाजवादी पार्टी के सामने खड़े होते हैं तो मुसलमान और दलित के आधे से अधिक वोट कांग्रेस की ओर ही जाएंगे. यही बात अखिलेश को खाए जा रही है.

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