मध्य प्रदेश की राजनीति के बेताज बादशाह कहलाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का राज्यसभा का कार्यकाल अप्रैल 2026 में खत्म हो रहा है. राज्य में कांग्रेस विधायकों की संख्या के आधार पर दिग्विजय सिंह आसानी से संसद पहुंच सकते हैं, लेकिन लगातार तीसरी बार राज्यसभा जाने से अपने कदम पीछे खींच लिए हैं. उन्होंने ऐलान किया है कि अब राज्यसभा नहीं जाएंगे.
दिग्विजय सिंह राज्यसभा जाने से इनकार कर सिर्फ अपने समर्थकों को ही हैरान नहीं किया बल्कि कांग्रेस के भीतर राज्यसभा की खाली होने वाली सीट के लिए सियासी जंग छेड़ दिया है.
सवाल उठता है कि आखिर दिग्विजय सिंह ने राज्यसभा जाने की हैट्रिक लगाने से क्यों पीछे हट गए और अब उनकी जगह कांग्रेस का कौन नेता राज्यसभा जाएगा?
दिग्गी राजा नहीं जाएंगे राज्यसभा
दिग्विजय सिंह अब राज्यसभा नहीं जाएंगे. उनका कार्यकाल अप्रैल 2026 को खत्म हो रहा है. ऐसे में उन्होंने ऐलान किया है कि अब वो राज्यसभा नहीं जाना चाहते हैं. इस तरह दिग्विजय सिंह के फैसले ने दिल्ली से भोपाल तक कांग्रेस के भीतर चर्चाओं का दौर शुरू कर दिया है.
दिग्विजय सिंह 2014 से राज्यसभा सांसद हैं और इससे पहले 1993 से 2003 तक लगातार दो कार्यकाल मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. 2003 में राज्य में कांग्रेस की सत्ता जाने के बाद, उन्होंने चुनावी राजनीति से एक दशक का विराम लिया था और 2013 में वापसी की थी. इसके बाद से राज्यसभा सांसद रहे है. इस दौरान 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में किस्मत आजमाया, लेकिन दोनों ही बार हार गए.
दिग्विजय ने क्यों खींचा अपना कदम
कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह ने आखिकार राज्यसभा जाने से अपने कदम क्यों अचानक पीछे खींच लिया? दिग्विजय सिंह का यह फैसला भले ही व्यक्तिगत लग रहा हो, लेकिन यह पर्सनल नहीं बल्कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है. . यह कदम कांग्रेस के उस नए राजनीतिक रोडमैप से जुड़ा माना जा रहा है, जिसे राहुल गांधी पिछले कुछ वर्षों से लागू करने की कोशिश कर रहे हैं.
कांग्रेस नेतृत्व का फोकस अब केवल संसद के भीतर आक्रामक विपक्षी भूमिका निभाने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पार्टी संगठन को जमीनी स्तर पर भी फिर से खड़ा करना प्राथमिकता बन चुका है. इसी सोच के तहत वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं को संगठनात्मक जिम्मेदारियों में लगाने और युवा नेताओं को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम हो रहा है.
माना जा रहा है कि दिग्विजय सिंह को भी इसी रणनीति के तहत राज्यसभा की भूमिका से मुक्त कर, दोबारा मैदान में उतारने की तैयारी है. इसीलिए माना जा रहा है कि युवा नेतृत्व को बढ़ावा देने के लिए दिग्विजय ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं.
मध्य प्रदेश चुनाव का बुनेंगे तानाबाना
कांग्रेस दिग्विजय सिंह को एक बार फिर से मध्य प्रदेश के सियासी मैदान में उतार सकती है. माना जा रहा है कि उन्हें एमपी में बड़े संगठनात्मक मिशन की जिम्मेदारी सौंप सकती है. 2017-18 में की गई उनकी 3300 किलोमीटर लंबी नर्मदा परिक्रमा कांग्रेस के लिए एक मजबूत राजनीतिक प्रतीक मानी गई थी. दिग्विजय की परिक्रमा ने न सिर्फ कार्यकर्ताओं में जान फूंकी थी, बल्कि 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी को वैचारिक और भावनात्मक बढ़त भी दिलाई थी.
2028 के विधानसभा चुनाव से पहले एक और नर्मदा परिक्रमा या इसी तरह का कोई बड़ा जनसंपर्क अभियान दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में कराया जा सकता है, ताकि बिखरे संगठन को जोड़ा जा सके और युवा कार्यकर्ताओं को दिशा दी जा सके. पार्टी के एक पदाधिकारी ने बताया कि विधानसभा चुनावों से ठीक पहले रणनीतिक रूप से की गई दूसरी परिक्रमा, जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को एकजुट करने, युवा नेताओं को सलाह देने और पार्टी संगठन को खड़े करने का काम में जुटेंगे.
दिग्विजय सिंह के जरिए कांग्रेस नेतृत्व की रणनीति है कि उन्हें मध्य प्रदेश में एक्टिव करके चुनावी अभियान को धार देने की है. साथ ही एक व्यापक संगठनात्मक परिवर्तन को दर्शाता है जिसे राहुल गांधी संगठन सृजन पहल के माध्यम से राज्यों में लागू करने की कोशिश कर रहे हैं.
दिग्विजय के सामने कैसी चुनौती होंगी
मध्य प्रदेश में कांग्रेस लंबे समय से अपनी सियासी जमीन तलाश रही है. 2018 में कांग्रेस सत्ता में वापसी करने में जरूर कामयाब रही थी, लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक विधायकों के बगावत के चलते कमलनाथ को अपनी सत्ता गंवानी पड़ गई थी. 2023 में कांग्रेस को मध्य प्रदेश में तगड़ा सियासी झटका लगा है. ऐसे में दिग्विजय सिंह को अगर कांग्रेस मध्य प्रदेश के सियासी रणभूमि में लगाती है तो उनके सामने मुश्किल भरी चुनौती होगी.
राज्य की सत्ता से बाहर होने के चलते दो कांग्रेस संगठनात्मक रूप से खोखली हो गई है, जिसमें बूथ समितियां निष्क्रिय हैं, पार्टी में गुटबाजी भी जबरदस्त है. संसाधनों की कमी है, और 2020 में पार्टी बगावत का सियासी इम्पैक्ट पड़ा है, जिसके चलते पार्टी को न केवल विधायक गंवाने पड़े बल्कि कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूटा है. इसके अलावा पार्टी का सियासी आधार भी खिसका है. इन सारी मसले को हल करे बिना राज्य में वापसी करना संभव नहीं है.
दिग्विजय की जगह कौन जाएगा राज्यसभा?
दिग्विजय सिंह के कदम खींचने के बाद कांग्रेस के भीतर सवाल उठने लगा है कि कौन नेता उनकी जगह पर राज्यसभा जाएगा. कांग्रेस के अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने खुलकर मांग रखी है कि राज्यसभा में इस बार दलित समाज को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. उनका तर्क है कि मध्य प्रदेश की करीब 17 फीसदी अनुसूचित जाति आबादी की यह लंबे समय से अपेक्षा रही है. यह तब हुआ जब दिग्विजय सिंह ने कहा कि अगर एससी समुदाय का कोई व्यक्ति कभी मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनता है तो उन्हें खुशी होगी.
9 अप्रैल 2026 को राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही है, जिसमें बीजेपी कोटे से दो सीट और कांग्रेस से एक सीट. विधानसभा की मौजूदा स्थिति को देखते हुए बीजेपी को दो और कांग्रेस को एक सीट मिलना तय माना जा रहा है. दिग्विजय सिंह के इनकार के बाद चर्चा तेज हो गई है कि कांग्रेस से कौन नेता जाएगा राज्यसभा जाएगा? इसमें सबसे पहला नाम पूर्व मुख्यमंत्री व कद्दावर नेता कमलनाथ हैं, जब-तब ऐसी चर्चाएं भी आती रहती हैं कि वे केंद्र की राजनीति में वापस लौटना चाहते हैं.
कमलनाथ दावेदारी करते हैं तो फिर उनके कद के आगे दूसरा नाम फीका पड़ जाएगा. कमलनाथ कांग्रेस के दिग्गज नेता हैं और मध्य प्रदेश के सीएम रह चुके हैं. यही नहीं कांग्रेस नेतृत्व के भी करीबी रहे हैं. इसके अलावा दूसरा नाम कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी का चल रहा है, जो 2023 में विधानसभा चुनाव हार गए थे. इसके अलावा तीसरी नाम कांग्रेस के दिग्गज ओबीसी नेता अरुण यादव का है. ऐसे में देखना है कि कांग्रेस किसे राज्यसभा भेजती है?
कुबूल अहमद