कलेजे से लाल को लगाए रही मां... देखते ही फफक पड़ा हर शख्स, बरगी डैम से निकली तस्वीर की कहानी

जबलपुर के बरगी डैम में हुए दर्दनाक क्रूज हादसे ने पूरे देश को झकझोर दिया. रेस्क्यू के दौरान जब गोताखोरों ने एक मां और उसके मासूम बेटे के शव को बाहर निकाला, तो वहां मौजूद हर आंख नम हो गई. मां मौत के बाद भी अपने चार साल के बेटे को सीने से चिपकाए हुए थी. यह दृश्य इतना मार्मिक था कि मंत्री से लेकर जवान और परिजन तक, हर कोई फूट-फूटकर रो पड़ा. तस्वीर यह भी बता रही थी कि हादसा कितना भयावह था. मां की ममता की आखिरी मिसाल भी दुनिया के सामने रख दी.

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क्रूज में सवार होने वाले छह लोग अब भी लापता. (Photo: PTI-ITG) क्रूज में सवार होने वाले छह लोग अब भी लापता. (Photo: PTI-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली/जबलपुर,
  • 02 मई 2026,
  • अपडेटेड 2:26 PM IST

नर्मदा में गुरुवार शाम ऐसी लहरें उठीं कि खुशियों से भरा एक सफर मातम में बदल गया. जबलपुर के बरगी डैम में डूबे क्रूज से निकली एक तस्वीर ने पूरे देश को झकझोर दिया. एक मां, जो मौत के बाद भी अपने चार साल के बेटे को सीने से चिपकाए हुए थी. जिंदगी की आखिरी सांस तक मां ने लाल को बचाने की कोशिश की. वह सीन जिसने भी देखा, उसका दिल रो पड़ा.

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गुरुवार देर रात बरगी डैम का वह इलाका किसी युद्धस्थल जैसा नजर आ रहा था, जहां आम दिनों में सन्नाटा पसरा रहता है. वहां सैकड़ों सरकारी गाड़ियां, पुलिस बल, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, सेना के जवान और चारों ओर लगी फ्लडलाइट्स थीं. रोशनी बहुत थी, लेकिन चेहरों पर अंधेरा पसरा हुआ था.

नर्मदा के बीचोंबीच वह क्रूज आधा डूबा हुआ दिखाई दे रहा था. कुछ घंटे पहले तक जहां संगीत गूंज रहा था, वहां अब सिर्फ लहरों की आवाज थी. हर किसी की निगाहें पानी पर टिकी थीं. मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री राकेश सिंह लगातार फोन पर अपडेट ले रहे थे. मुख्यमंत्री मोहन यादव खुद पल-पल की जानकारी ले रहे थे. लेकिन उस रात किसी के पास कोई जवाब नहीं था.

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दिल्ली के रहने वाले प्रदीप अपनी पत्नी, चार साल के बेटे और बेटी के साथ जबलपुर आए थे. रिश्तेदार के गृह प्रवेश में शामिल होने के बाद परिवार घूमने के लिए बरगी डैम पहुंचा था. शाम खूबसूरत थी. मौसम सुहाना था. सभी ने क्रूज की सवारी करने का फैसला किया.

क्रूज में हंसी थी, बच्चों की खिलखिलाहट थी, मोबाइल कैमरों की चमक थी. किसी ने नहीं सोचा था कि अगले कुछ मिनट सब कुछ तबाह कर देंगे. फिर अचानक मौसम ने करवट ली. तेज हवाएं चलने लगीं. पानी में ऊंची लहरें उठने लगीं. जल्द ही डर ने सबको घेर लिया.

प्रदीप बताते हैं कि मैंने लाइफ जैकेट बांटना शुरू ही किया था कि क्रूज अचानक एक तरफ झुक गया. उसके बाद सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि संभलने का मौका ही नहीं मिला. सिर्फ तीन मिनट... और सब खत्म हो गया.

रातभर इंतजार, हर पल भारी

अंधेरा और गहराई, दोनों ही बचाव अभियान में बाधा बने. रात में रेस्क्यू रोकना पड़ा. लेकिन किनारे पर खड़े परिजनों के लिए वह रात कभी खत्म नहीं हो रही थी. हर गुजरता मिनट पहाड़ जैसा लग रहा था. कोई रो रहा था, कोई प्रार्थना कर रहा था, कोई मोबाइल स्क्रीन पर अपनों की तस्वीरें देख रहा था. उम्मीद और डर के बीच पूरी रात बीती.

पहली किरण के साथ सेना के गोताखोर पानी में उतरे. कुछ ही देर में पहला शव बाहर निकाला गया. फिर दूसरा. माहौल और भारी हो गया. इसी बीच गुलाबी शर्ट पहने प्रदीप अपनी बेटी के साथ वहां पहुंचे. हर स्ट्रेचर को देखते हुए उनकी सांसें थम जाती थीं. एक महिला का शव निकाला गया. प्रदीप दौड़ पड़े. कुछ पल के लिए उनका दिल रुक गया. लेकिन चेहरा साफ होने पर उन्हें पता चला कि वह उनकी पत्नी नहीं थीं. उनके चेहरे पर आई राहत भी दर्द से भरी थी. क्योंकि उनकी तलाश अभी खत्म नहीं हुई थी.

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फिर सामने आई वह तस्वीर

करीब आधे घंटे बाद गोताखोरों ने इशारा किया. एक और शव मिला था. स्ट्रेचर धीरे-धीरे किनारे लाया गया. शव उल्टा था. आसपास खड़े लोग सांस रोके हुए थे. जैसे ही शव को सीधा किया गया, वहां मौजूद हर शख्स की रूह कांप उठी. वह एक महिला थी. और उसके सीने से एक छोटा बच्चा कसकर चिपका हुआ था. लग रहा था मानो मां ने अपने बेटे को गोद में सुला रखा हो. जैसे वह उसे डर से बचाने की कोशिश कर रही हो. जैसे मौत से लड़ते-लड़ते आखिरकार दोनों एक साथ सो गए हों. यह प्रदीप की पत्नी और उनका चार साल का बेटा था.

चीखों से कांप उठा किनारा

प्रदीप और उनकी बेटी चीख पड़े. वह अपनी पत्नी और बेटे से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगे. वहां मौजूद पुलिसकर्मी, डॉक्टर, गोताखोर, मीडियाकर्मी किसी की आंखें सूखी नहीं थीं. मंत्री राकेश सिंह भी खुद को संभाल नहीं पाए. उनकी आंखों से भी आंसू बह निकले. मां की ममता मौत से भी बड़ी साबित हुई. जिस तरह मां का हाथ बच्चे पर था, उसे देखकर हर कोई यही कह रहा था कि उसने आखिरी क्षण तक अपने लाल को बचाने की कोशिश की होगी. मां ने अपने बेटे को सीने से चिपका लिया था.

इस हादसे से पहले मौसम विभाग ने पहले ही जबलपुर में 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने का येलो अलर्ट जारी किया था. इसके बावजूद क्रूज को नर्मदा में उतार दिया गया. प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, हवाएं तेज होने लगी थीं. यात्रियों ने कर्मचारियों से वापस लौटने को कहा था. लेकिन क्रूज चलता रहा. जब स्थिति बिगड़ी, तब लाइफ जैकेट बांटी जाने लगीं. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. कुछ लोग घबराकर नीचे के केबिन में भागे और वहीं फंस गए.

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यह भी पढ़ें: लाइफ जैकेट पहने होते तो बच जातीं कई जिंदगियां... जबलपुर क्रूज हादसे में आखिर कहां हुई चूक?

राज्य सरकार ने हादसे के बाद तत्काल कार्रवाई की. क्रूज पायलट महेश पटेल, हेल्पर छोटेलाल गोंड और टिकट काउंटर प्रभारी बृजेंद्र की सेवाएं समाप्त कर दी गईं. होटल मैकल रिसॉर्ट और बोट क्लब बरगी के मैनेजर सुनील मरावी को निलंबित कर दिया गया. रीजनल मैनेजर संजय मल्होत्रा को मुख्यालय अटैच कर विभागीय जांच शुरू कर दी गई. लेकिन सवाल वही है- क्या इन कार्रवाइयों से उन परिवारों का दर्द कम होगा, जिन्होंने अपने अपनों को खो दिया?

नौ मौतें, छह अब भी लापता

अब तक नौ लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है. छह लोग अब भी लापता हैं. सेना, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ लगातार तलाश में जुटी हैं. हर गोताखोर जानता है कि पानी से अब जिंदगी नहीं, सिर्फ कहानियां निकल रही हैं. दर्द भरी कहानियां.

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की. उन्होंने उन स्थानीय लोगों को स्वतंत्रता दिवस पर सम्मानित करने की घोषणा की, जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर पर्यटकों को बचाया. साथ ही राज्य में इस तरह के क्रूज संचालन की सुरक्षा व्यवस्था की जांच के आदेश दिए गए हैं. 

हादसे की जांच होगी. दोषियों पर कार्रवाई होगी. नियम सख्त होंगे. लेकिन बरगी डैम के किनारे निकली वह तस्वीर शायद कभी नहीं मिटेगी. एक मां, जिसने मौत के बाद भी अपने बच्चे को सीने से अलग नहीं होने दिया.

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(रवीश पाल के इनपुट के साथ)

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