फांसी या उम्रक़ैद
जमशेद कमर सिद्दीक़ी
RECAP - इस कहानी के पहले हिस्से में हमने सुना कि शेयर मार्केट ट्रेडिंग का एक बहुत बड़ा कारोबारी जो साइकॉलोजिस्ट भी है और उसने कई किताबें लिखी हैं... वो अपने घर में परेशान टहल रहा है... और याद कर रहा है पंद्रह साल पहले की वो रात... जब अपनी ही दी पार्टी में उसने एक लड़के से शर्त लगाई थी। वो उस रात को याद करता है, जब पार्टी में वो एक सातवीं पास लड़के अशर से मिला था। जहां एक बहस शुरु होती थी कि किसी के गुनाह के लिए उसे फांसी की सज़ा देना सही है या सिर्फ उम्रकैद की ही सज़ा होनी चाहिए। चर्चा बहस में बदल गयी और फिर जोश में आकर उसने आदमी ने अशर से शर्त लगाई कि उम्र कैद को सपोर्ट करने के लिए क्या वो खुद पंद्रह साल एक कमरे में रह सकता है? अगर रह सकता है तो वो उसे दस करोड़ रुपए देगा। अशर शर्त के लिए तैयार हो गया था। शर्त में एक शर्त ये भी थी कि अशर बिज़नेसमैन के घर के बेसमेंट में एक कमरे में बंद रहेगा लेकिन कमरे की दो चाभियां होंगी.. जो दोनों के पास रहेंगी... यानि अशर जब चाहे इस शर्त को छोड़कर बाहर आ सकता है। पहला दिन शुरु होता है और अशर कमरे में बंद हो जाता है... कुछ दिन गुज़र जाते हैं फिर एक रोज़ उसके कमरे से चीखने की आवाज़ें आती है। कारोबारी सोचता है कि हो सकता है अशर अकेले बैठे बैठे अपना मानसिक संतुलन खो बैठा हो... वो अपनी चाभी लेकर बेसमेंट वाले जेल में जाने लगता है... पर तभी उसे कुछ ख्याल आता है और वो अपनी रिवाल्वर भी साथ ले लेता है... अब आगे
अशर के कमरे से चीखने की आवाज़ें तेज़ हो रही थीं। वो कभी गुस्से में चीखता था और कभी रोने लगता था। कभी कोई सामान उठाकर दरवाज़े पर मारता था। मैं संभलते हुए उस कमरे के पास पहुंचा... वो बेसमेंट के धुंधलके में किनारे की तरफ बना हुआ एक कमरा था। जहां न कोई आहट थी, न कोई रौशनी। एक लोहे का काला दरवाज़ा था जो कमरे पर कसा हुआ था... मैं उस कमरे के पास पहुंचा... कमरे से आवाज़ें आ रही थीं... अशर कभी ज़ोर से चीखता और कभी रोने लगता। मैंने अपनी कमर में लगी हुई बंदूक को छूकर चेक किया कि वो ठीक से लगी है या नहीं। बंदूक मैंने क्यों ली थी... क्योंकि मैंने साइकॉलोजी में पढ़ाई की थी... और मैं जानता हूं कि जो शख्स एक ही जगह पर कई महीनों के लिए बंद हो... वो अपना दिमागी तवाज़ुन.. मेंटल बैलेंस खो देता है... उसे उन लोगों पर गुस्सा आता है जो आज़ाद हैं... और मैं... मैं तो अशर की गुलामी की वजह थी... ये बहुत मुमकिन था कि अगर मैं दरवाज़ा खोलूं ये चेक करने के लिए कि वो ठीक है या नहीं ... तो वो मुझपर हमला कर दे... वो अपने हाथों से मेरा गला दबा दे और भाग जाए। आज़ादी से बढ़कर दुनिया में किसी के लिए कुछ नहीं होता। अशर.... अशर तुम ठीक हो? (आगे की कहानी पढ़ने के लिए नीचे स्क्रॉल करें। या इसी कहानी को ऑडियो में जमशेद क़मर सिद्दीक़ी से सुनने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें)
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(आगे की कहानी यहां से पढ़ें) मैंने आवाज़ दी... तो अंदर से रोने की आवाज़ रुक गयी। तुम अगर चाहो अभी इसी वक्त बाहर आ सकते हो... या मैं अंदर आ जाता हूं। मैं अपनी चाभी भी लाया हूं। बोलों... खत्म करें ये खेल... हार मानते हो?
नहीं.... अंदर मत आइयेगा आप... अंदर से अशर की घुटी-घुटी आवाज़ आई। ये शर्त जारी रहेगी... मैं बस... चीख कर और रोकर अपने अंदर का गुस्सा, दर्द और फ्रस्टेशन निकाल रहा था। ये शर्त जारी है
मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी। हालांकि मुझे हैरानी हुई कि एक सातवीं पास आदमी ह्यूमन साइकॉलोजी की इतनी बारीक बात कैसे जानता है कि किसी जगह कैद होने पर... आप ज़ोर ज़ोर से चीख कर और रोकर अपना मैंटल बैलेंस ठीक रख सकते हैं।
- ठीक है... जैसा तुम चाहो। मैं तो बस देखने आया था कि तुम्हें कुछ हो तो नहीं गया...
- नहीं, मैं ठीक हूं
- ठीक है फिर... वैसे अपना ख्याल रखना। मैं नहीं चाहता कि तुम मर मरा जाओ... ज़िंदगी दस करोड़ से बहुत बड़ी होती है।
- हमारी तो नहीं होती सर... – अंदर से अशर कहा... एक औसत आम इंसान की ज़िंदगी दस करोड़ की नहीं होती.. लोग पूरी ज़िंदगी घिस जाते हैं... तब भी करोड़ों नहीं देख पाते। वैसे मुझे पता है मैं कर लूंगा... बस दिक्कत ये है कि ये जगह बहुत बोरिंग है। और करने के लिए कुछ है नहीं
- किताबें पढ़ोगे... मैंने अपने पीछे खड़े नौकरों पर रौब डालने के लिए कहा ताकि वो समझें कि साहब कितने नर्म दिल हैं और पढ़ाई लिखाई को लेकर कितने पक्के हैं। किताबें पढ़ों... मैं अपनी किताबें भिजवा दूंगा अंदर... तुम्हें और चाहिए तो और ले लेना।
अशर ने कुछ नहीं कहा... मैं वापस लौट गया और वो दिन खत्म हो गया। पर इस दिन मैंने एक भूल कर दी थी... और वो भूल थी उस सातवीं पास अशर को किताबों की तरफ जाने का रास्ता दिखा दिया था। उस दिन के बाद... अशर ने पहली बार ढंग से किताबें पढ़ना शुरु की... उसे मज़ा आया... हालांकि वो अटक अटक कर पढ़ता था... पर उसने अगले सात दिनों में वो किताब पूरी ख़त्म कर ली... और बहुत ही इत्मिनान से पढ़ी... किताब में लिखे एक एक लफ्ज़ का मतलब समझते हुए।
कुछ दिन गुज़रे की उसने उस दराज़ से एक चिट्ठी बाहर फेंकी , जिस दराज़ से खाने की थाली अंदर सरकाई जाती थी। उसमें लिखा था क्या मुझे कुछ और किताबें मिल सकती हैं। जो थोड़ी आसान ज़बान में लिखी हों। मुझे किताबें पढ़ना अच्छा लगने लगा है।
मैंने नौकरों से कहा कि उसे कुछ और किताबें दे दी जाएं। और अपने सारे दोस्तों यारों को और वो सारे लोग जो उस दिन पार्टी में मौजूद थे ... उन्हें बताया कि भई, देखिए मेरी दरियादिली की एक आदमी को बंद किया है, ऊपर से उसे किताबें भी दे रहे हैं। ताकि वो समझ सकें कि मैं तालीम का कितना बड़ा पैरोकार हूं।
ख़ैर किताबें पहुंचा दी गयीं। फिर कुछ महीनों तक उसकी कोई चिट्ठी नहीं आई... फिर उसने एक और चिट्ठी भेजी... और कुछ किताबें मांगी... फिर कुछ महीनों के बाद और किताबें... अब वो खत मे ये नहीं लिखता था कि आसान भाषा वाली किताबें चाहिए।
वक्त बीतता रहा.... दो साल गुज़र गए। लोग मुझसे पूछते थे कि कैसी कट रही है... तो मैं कहता था... अरे अभी दो ही साल हुए हैं... अभी तो बहुत लंबा टाइम बाकी है... जोश जोश में हां कह गया लड़का... मैं तो बस उसे सबक सिखा रहा हूं ज़िंदगी का... और क्या... कौन सा वो पंद्रह साल रह लेगा... भाग खड़ा होगा...
लेकिन ऐसा था नहीं... तीसरे साल तक आते-आते अशर अब संभल गया था... खूब किताबें पढ़ता और अंदर बैठा रहता... उसने शराब और तंबाकू मांगना भी मना कर दिया। एक खत में लिखा शराब मुझे नहीं चाहिए... क्योंकि शराब पी लेता हूं तो एक बहुत मज़बूत ख्वाहिश होती है कि मैं... बाहर निकल जाऊं... तब खुद को संभालना मुश्किल होता है... और तंबाकू इसलिए नहीं चाहिए कि वो बंद कमरा तंबाकू के धुएं से भर जाता है। मुझे आप कुछ और किताबें भेज दें... फिलॉसफी की किताबें भेज दें तो बहुत महरबानी होगी। इस तरह अशऱ ने किताबें पढ़ना शुरु किया... वो कभी फिलासपी की किताबें मांगता, कभी लिटरेचर की, कभी किसी अलग भाषा की बेसिक किताबें, कभी साइंस की किताब। सात-आठ साल गुज़र गए... पर वो किताबें पढ़ता रहा पढ़ता रहा। फिर उसने इतिहास पढ़ना शुरु किया और कई सालों तक किताबें पढ़ता रहा। बीच बीच में वो पढ़ी हुई किताबें थाली वाले रास्ते से बाहर सरका देता। उसने इतनी किताबें पढ़ ली थीं... कि अगर वो उस कमरे में समा नहीं सकती थीं।
14 साल गुज़र गए और किताबें पढ़ते-पढ़ते वो एक गज़ब का इंटलैक्चुअल बन गया था। जिसे कई भाषाएं आती थीं, जो दर्शन शास्त्र का एक्सपर्ट बन गया था, जिसने लिटरेचर को चाट रखा था। मॉडर्न पोएट्स, पुराने राइटर्स, साइंटिस्ट के जर्नल, राजनीति शास्त्र की किताबें और पता नही क्या-क्या। और पंद्रहवां साल आते-आते बहुत कुछ मेरे लिए भी बदल गया था।
मैं जो तब जब ये शर्त लगाई थी... तब मैं एक बड़ा बिज़नेसमैन हुआ करता था... पर अब मैं एक औसत कारोबारी बन कर रह गया था। क्योंकि इसी बीच मैं अपना सारा पैसा शेयर बाज़ार में लगाकर डूब गया था। मेरे पास अब कुछ नहीं बचा था सिवाए इस घर के ... जहां सोफे पर बैठा, सिगरेट जलाकर मैं ये पूरी कहानी याद कर रहा था।
शशशसस उफ... मेरी उंगली
अचानक मेरी उंगली में जलन महसूस हुई तो मैं उन पुरानी यादों से लौट आया... मैं अपना गाउन पहने दूसरी मंज़िल के उस कमरे में सोफे पर बैठा था। मैंने सिंगरेट को देखा तो वो पूरी राख में बदल गयी थी। मैंने उसे सावधानी से ऐश ट्रे में रखा और फिर कमरे में चलने लगा।
आज की रात उस शर्त की आखिरी रात थी। कल शाम 6 बजे अशर को उस कमरे में गए हुए पूरे 15 साल हो जाएंगे और कल मैं कल शाम को वो शर्त हार जाऊंगा। पर कहां से दूंगा उसे 10 करोड़ रुपए। मैं तो अपनी सारी दौलत शेयर मार्केट में हार गया हूं।
ले देकर इस घर के अलावा कुछ बचा नहीं है, ये भी द करोड़ का नहीं होगा। कहीं ऐसा न हो कि अग्रीमेंट की बुनियाद पर.. अशर कोर्ट में ये कहे कि फिलहाल ये मकान उसके नाम कर दिया जाए... और बाकी पैसे उसे बाद में दिये जाएं। लिखित कागज़ों के हिसाब से तो कोर्ट उसकी बात मान भी लेगा... और मैं... मैं तो सड़क पर आ जाऊंगा... उफ्फ... क्या करूं...
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। तभी मेरे ज़हन में कुछ चमका... और मैंने सोचा कि क्यों न... वो किया जाए... जिससे ये पूरा बखेड़ा ही खत्म हो जाए... क्योंकि अशर को जान से खत्म कर दिया जाए।
मुझे याद आया कि पहले साल ही, शर्त शुरु होने के कुछ महीनों बाद जब अशर चीख चिल्ला रहा था तो मैं एक बार अपनी रिवाल्वर कमर में दबाकर गया था.. कि कहीं वो मुझपर हमला न कर दे... पर मैं उसे किताबों की नसीहत देकर चला आया था। उसी वक्त उसे खत्म कर देना चाहिए था। उस बात को अब लगभग पंद्रह साल गुज़र गए... पर कोई नहीं जो काम तब नहीं किया... वो अब करूंगा।
सोचते हुए मैंने घड़ी की तरफ देखा... और रात होने का इंतज़ार किया।
रात को तीन बजे मैं चुपचाप अपने बिस्तर से उठा, लौंग कोट पहना, चेहरा ढका.. ताकि कैमरे में न आए.. फिर मैंने अलमारी से बंदूक निकाली... और वो चाभी... और अशर के कत्ल के इरादे से मैं बेसमेंट के उस कमरे की तरफ चला गया।
बेसमेंट में अंधेरा था.. .कोई नौकर नहीं था। मैं उस दरवाज़े के पास पहुंचा और अपनी चाभी से अशर का दरवाज़ा खोला। दरवाज़े के ताले में ज़ंग लग गया था... कुछ मुश्किल से खुला... पर एक आहट के साथ खुल गया।
मैंने दरवाज़ा अंदर ढकेला... तो एक अजीब सी महक मेरे नथनों में भर गयी। मैंने उस हल्के अंधेरे कमरे में गौर से देखा... कमरे में हर तरफ किताबें ही किताबें ढेर थी... खुली किताबें, बंद किताबें, नीचे गिरी हुई, बिस्तर पर पड़ी... फर्श पर पैर रखने की जगह नहीं थी... एक किनारे एक मेज़ लगी थी... जिससे सटी हुई कुर्सी पर अशर बैठा था... उसकी पीठ मेरी तरफ थी... और वो मेज़ पर झुका हुआ था.. और एक खुली हुई किताब पर उसका सर टिका हुआ था।
शायद किताब पढ़ते पढ़ते वो सो गया था। और पंद्रह सालों में उसे इसकी आदत हो गयी थी कि वो बैठे बैठे, पढ़ते-पढ़ते सो जाता था। मेरी नज़र सामने दीवार पर लटकी उस चाभी पर भी गयी, जो अशर ने पंद्रह सालों तक छुआ नहीं था।
मैं सावधानी से उसके करीब पहुंचा... और अशर की तरफ देखा... उसने एक मैली सी बनियान पहनी थी... और उसके बाल कंधों तक थे... पर वो बहुत उम्रदराज़ लग रहा था... उसकी खाल ढीली हो गयी थी... ऐसा लगता था वो अपनी उम्र से दोगुना हो गया हो...
मैंने दाएं-बाएं देखा... और अपनी कमर में लगी रिवाल्वर निकाली। मैं उसके पास पहुंचा ताकि सर से सटाकर गोली मार सकूं ताकि हल्के अंधेरे में निशाना सही लगे और उसके बचने का कोई चांस न हो।
मैं कदम दबाते हुए उसके पास पहुंचा... तो नज़र मेज़ पर गयी... उसी किताब के ठीक बगल में एक कागज़ रखा था... जिसकी लिखावट ताज़ा थी। मैंने यूं ही वो कागज़ उठाया... और उसे देखा... वो एक खत था... मैंने पढ़ा –
आज का दिन बहुत खास है... क्योंकि आज मेरी गुलामी का आखिरी दिन है... कल शाम छ बजे मैं इस दस बाई दस के कमरे से आज़ाद हो जाऊंगा... इस कमरे में रखा एक बिस्तर, दो प्लेटें, एक ग्लास, एक पंखा, एक मेज़-कुर्सी और अनगिनत किताबें... कल मैं इन सबसे दूर हो जाऊंगा। ये रात आखिरी है, और परसों का सूरज मेरी आज़ादी का गवाह होगा... पर इससे पहले कि मैं इस कमरे को छोड़ कर जाऊं... मुझे आप सब से... जो मेरे बारे में जानना चाहते हैं.. या आगे जानेंगे... उनसे कुछ कहना चाहता हूं...
मुझे मालूम है कि आप लोग मुझ पर तरस खाते होगे कि मैं इतने सालों से एक कमरे कैद हूं... पर सच बताऊं ... मैं कैद नहीं हूं... ये जो किताबें मेरे आसपास बिखरी हैं... इनके ज़रिए मैंने दुनिया की सबसे खूबसूरत जगहों पर घूम कर आया हूं, मैंने दुनिया की सबसे हसीन औरतों के साथ मुहब्बत की है, मैं अलास्का के बर्फीली ज़मीन पर दौड़ा हूं, मैं रेगिस्तान की तपती ज़मीन पर चला हूं, मैंने दुनिया के उन जंगलों में उगे अनोखे फलों को चखा है जिनका ज़ायका तुम लोगों को नहीं पता... मैंने इतिहास में लौटकर उन हस्तियों के साथ बात की है जो अब कभी नहीं लौटेंगे... मैंने इन किताबों के ज़रिए आठ ज़बानें सीखी हैं जिन में मैं फर्राटे से बोल सकता हूं... मैंने साइंस के सिद्धात पढ़े हैं, ईश्वर को समझा है, ज़िंदगी को समझा है, मौत को जाना है... और ये सब पढ़ने के बाद... मैं तुम लोगों से कहना चाहता हूं कि ये सारा ज्ञान बेकार है... ये इल्म फिज़ूल है, ये दुनिया फर्ज़ी है और तुम्हारा वजूद सपने की तरह है... तुम एक दिन आंख खोलोगे और जान पाओगे कि तुम जो देख रहे थे... वो सब झूठ था...
मैंने तुम लोगों की लिखी हुई किताबें पढ़ी हैं... और अब मैं तुम सबसे ज़्यादा पढ़ा लिखा हूं, ज्ञानी हूं... आलिम हूं... और मैंने ये जाना है कि ये दुनिया सिवाए एक छलावे के और कुछ नहीं। तुम सब एक झूठ हो, अच्छे कपड़ों में एक दूसरे को और खुद को धोखा देते हुए किसी ऐसी चीज़ को ढूंढ रहे हो... जिसकी ज़रूरत तुम्हें नहीं है। मैं धिक्कारता हूं तुम्हारी इस शहरी दुनिया पर ... जहां तुम जानकारी को इल्म कहते हो... मेरा मन इस दुनिया से भर गया है... मैं ठोकर मारता हूं तुम्हारी इस बसाई हुई दुनिया और उसके नियमों पर... और तुम चाहे जितना ज्ञान जमा कर लो.. चाहे जो बन जाओ... सब बेकार है... क्योंकि एक दिन मौत तुम्हें ऐसे इस दुनिया से गायब कर देगी... जैसे तुम कभी थे ही नहीं... ये सब एक छलावा है... तुम जी रहे हो.. क्योंकि तुम पैदा हुए... और वैसे जी रहे हो... जैसे तुम्हें समझाया गया... पर मैं ऐसे नहीं जियूंगा... मुझे तुम्हारी इस दुनिया में कोई दिलचस्पी नहीं है... और इसलिए मुझे ये शर्त नहीं जीतना... मुझे तुम लोगों से कुछ नहीं चाहिए... इस शर्त की जीत भी नहीं... और इसीलिए कल शाम छ बजने से ठीक पांच मिनट पहले... मैं अपनी चाभी से दरवाज़ा खोलकर इस कमरे से चला जाऊंगा.. ताकि मैं ये शर्त हार जाऊं...
कागज़ मेरे हाथ में कांप रहा था.... अशर अब भी मेज़ पर झुका हुआ था। मैं क्या समझ रहा था और वो क्या निकला... खुद पर शर्म आई। मैंने कागज़ को वापस वहीं पर रखा और मैं वापस चला गया। कुछ देर बाद मैं अपने बिस्तर पर लौट आया... लेकिन अशर के खत में लिखी एक एक बात मेरे ज़हन में हथौड़े की तरह बज रही थी। उस एक खत को पढ़कर ऐसा लगा जैसे मैंने सैकड़ों लेखकों, प्रोफेसर्स और इंटिलैक्चुअल्स को कई घंटों पढ़ा और सुना है... उसकी हर बात मेरे ज़हन में गूंज रही थी। एक पल में ऐसा लगा जैसे सब कुछ बेमाएने है... वो सातवीं पास अशर... अब दुनिया का शायद सबसे पढ़ा लिखा आदमी था... और उसकी हर बात हमारी दुनिया की रंगीनियों को, हमारी ज़िंदगी के झूठ को, हमारी खोखली फिक्रों को... नंगा कर रही थी। अचानक मैंने महसूस किया कि मैं जिस फिक्र में कई हफ्तों से परेशान था कि मेरी कंपनी डूब गयी है... मैं क्या करूंगा... मेरा भविष्य क्या होगा... मेरी कंपनी का फ्यूचर क्या है... – ये सारे सवाल मुझे बेमाएने लगने लगे। उम्र कैद और फांसी से शुरु हुई वो बहस.... ज़िंदगी पर खत्म हो गयी थी।
अगली शाम मैं अपने कमरे में लगी स्क्रीन पर नज़र गड़ाए था। ठीक 5 बजकर पचपन मिनट पर दरवाज़ा खुला... दाढ़ी बढ़ाए... अशर... ने मैले कपड़ों को झाड़कर एक अंगड़ाई ली... और चुपचाप गेट से बाहर चला गया। और उस दिन के बाद से .... अबतक अशर का कोई पता नहीं चला... वो कहां गया... कोई नहीं जानता...
जमशेद क़मर सिद्दीक़ी