हाल ही में, दिल्ली में एक सीरियल रेपिस्ट को गिरफ्तार किया गया, जो मासूम बच्चियों को अपनी हवस
का शिकार बनाता था. पर आपको बता दें कि बच्चियों की सुरक्षा को सिर्फ देश की राजधानी में ही नहीं, बल्कि
पूरे भारत में खतरा है. एनसीआरबी द्वारा जारी हालिया आंकड़े बेहद डरावने और परेशान करने वाले हैं.
आपको यह जान कर और भी हैरानी होगी कि एनसीआरबी द्वारा जारी आंकड़ों में सिर्फ ऐसे मामले ही
दिखाए गए हैं, जिन्हें दर्ज कराया गया या जिनकी किसी न किसी रूप में शिकायत की गई है. यानी, बच्चियों के
खिलाफ अपराध की जो सूरत नजर आ रही हैं, उसका वास्तविक चेहरा और भी भयानक है. अपराध के हजारों
मामले ऐसे भी हैं, जिनकी शिकायत नहीं की जाती.
खो दिया बचपन
जारी आंकड़ों की मानें तो साल 2015 में के 94,172 मामले
दर्ज किए गए. इनमें 12 प्रतिशत यानी कि 10,854 रेप के मामले थे. इसका मतलब यह हुआ कि देश में हर 48
मिनट पर कोई एक बच्ची हवस का शिकार बनती है.
बच्चियों के खिलाफ बढ़ता अपराध
रेप के अलावा दूसरे तरह के यौन अपराध पर आए आंकड़े भी चौंकाने वाले
हैं. रिपोर्ट के अनुसार साल 2015 में 8,390 ऐसे मामले देखने को मिले, जिसमें इरादतन बच्चियों की शीलता
भंग की गई. प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंस (POSCO)एक्ट के तहत 14,913 मामले दर्ज
किए गए.
रेप पीड़िता की उम्र
एनसीआरबी द्वारा जारी हालिया रिपोर्ट के अनुसार जिस उम्र में के बारे में भी
पूरी जानकारी नहीं होती, इस छोटी उम्र में ही उन पर वहशी अपराधियों की नजर पड़ने लगती है. आंकड़ों के
अनुसार साल 2015 में 6 साल से कम उम्र की 306 बच्चियों को रेप का शिकार बनाया गया. जबकि 6 से
12 आयुवर्ग की 1008 बच्चियां हवस की शिकार बनीं. 12 से 16 और 16 से 18 आयुवर्ग की क्रमश:
3405 और 4114 बच्चियां के साथ हुए रेप के मामले दर्ज किए गए.
किनसे है खतरा
एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार होती हैं. इसके
बाद रिश्तेदारों, माता-पिता के को-वर्कर, अनजानें लोगों द्वारा उनका यौन शोषण होता है.
सबसे असुरक्षित राज्य
इस लिहाज से उत्तर प्रदेश सबसे असुरक्षित जगह है. इसके बाद क्रमश: पश्चिम बंगाल, गुजरात, कर्नाटक
और तमिलनाडु है.
मेधा चावला