Omicron Variant: पहली बार ओमिक्रॉन को देखकर डर गए थे वैज्ञानिक, लगा था झटका

Omicron Variant: कोरोना वायरस की दूसरी लहर में कोरोना के डेल्टा वेरिएंट ने पूरी दुनिया में तबाही मचाई थी. अब नए वैरिएंट की आहट से हर कोई सहम गया है. नए वैरिएंट ओमिक्रॉन (Omicron Variant) को डेल्टा से भी ज्यादा संक्रामक बताया जा रहा है. ओमिक्रॉन वैरिएंट की पहचान सबसे पहले दक्षिण अफ्रीका के शोधकर्ताओं ने की थी. इन वैज्ञानिकों ने रॉयटर्स को बताया है कि पहली बार जब उन्होंने ओमीक्रॉन की पहचान की थी तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी.

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दक्षिण अफ्रीका के वैज्ञानिकों ने सबसे पहले की थी ओमिक्रॉन वैरिएंट की पहचान दक्षिण अफ्रीका के वैज्ञानिकों ने सबसे पहले की थी ओमिक्रॉन वैरिएंट की पहचान

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 01 दिसंबर 2021,
  • अपडेटेड 12:11 PM IST
  • कोरोना का नया ओमिक्रॉन वैरिएंट
  • पूरी दुनिया में बढ़ी चिंता
  • दक्षिण अफ्रीका में आया था पहला मामला

Omicron Variant: पूरी दुनिया में कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन की दहशत बढ़ती जा रही है. WHO ने इस नए वैरिएंट को हाई रिस्क वाला बताया है और लोगों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है. ओमिक्रॉन वैरिएंट (Omicron Variant) को लेकर कई देशों ने पाबंदियां लगानी भी शुरू कर दी हैं. इस वैरिएंट की पहचान सबसे पहले दक्षिण अफ्रीका के वैज्ञानिकों ने की थी. इन वैज्ञानिकों ने रॉयटर्स को बताया है कि पहली बार जब उन्होंने ओमिक्रॉन की पहचान की थी तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी.

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19 नवंबर को, दक्षिण अफ्रीका की सबसे बड़े टेस्टिंग लैब की हेड ऑफ साइंस रकील वियाना कोरोना वायरस के 8 सैंपल्स (Omicron COVID-19 New Variant) की जीन सिक्वेंसिंग कर रही थीं. अचानक उन्होंने कुछ ऐसा देखा जिससे उन्हें बड़ा झटका लगा. लैंसेट लैब में टेस्ट किए गए सैंपल में बड़ी संख्या में म्यूटेशन देखने को मिले, खासतौर से स्पाइक प्रोटीन पर जिसका इस्तेमाल वायरस मानव कोशिकाओं में प्रवेश करने के लिए करता है.
 
प्रोफेसर वियाना ने बताया, 'मैं जो देख रही थी, उससे मैं काफी हैरान थी. मैंने खुद से सवाल किया कि क्या इस प्रक्रिया में मुझसे कुछ गलत हो गया? मैं ये सोचकर ही सहम गई कि कहीं इस सैंपल्स का कोई बड़ा प्रभाव ना पड़ जाए.' इसके बाद वियाना ने तुरंत जोहान्सबर्ग में नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर कम्युनिकेबल डिजीज (NICD) में अपने सहयोगी, जीन सीक्वेंसर डैनियल एमोआको को फोन लगाया. वियाना ने कहा, 'मुझे ये भी समझ नहीं आ रहा था कि मैं ये खबर किस तरह से एमोआको को दूं. मैंने उनसे कहा कि ये मुझे वायरस के एक नए वंश की तरह दिखता है.'

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एमोआको और एनआईसीडी की टीम ने 20-21 नवंबर को वियाना के भेजे गए आठ सैंपल्स का परीक्षण किया. इन सबमें एक ही तरह का म्यूटेशन देखा गया. यह इतना अजीब था कि एमोआको, उनके सहयोगियों ने भी यही सोचा कि टेस्टिंग के दौरान उनसे कोई गलती हो गई है. इसके बाद एमोआको की टीम ने याद किया कि उसी सप्ताह उन्होंने COVID-19 मामलों में अचानक तेजी देखी थी. वैज्ञानिकों ने आशंका जताई कि ये एक नए म्यूटेशन का संकेत हो सकता है.

इसके अलावा, वियाना को नवंबर महीने की शुरुआत में उनके एक सहयोगी ने एक सैंपल की विशेष जांच करने के लिए सतर्क किया था. ये S-gene ड्रॉपआउट एक ऐसा म्यूटेशन था जो कोरोना वायरस के सबसे उग्र म्यूटेशन डेल्टा से भी अलग था. इस वैरिएंट में बस कुछ चीजें कॉमन थी जो अल्फा वैरिएंट में भी थीं.

एनआईसीडी के प्रोफेसर एवरेट ने इस सैंपल को देखते हुए याद किया, 'हमने अगस्त से दक्षिण अफ्रीका में अल्फा का कोई मामला नहीं देखा था.' 23 नवंबर को 32 और सैंपल की टेस्टिंग के बाद एमोआको ने कहा, 'स्पष्ट रूप से ये नया वैरिएंट है. यह डरावना था.'

नए वैरिएंट पर कई सवाल- उसी दिन एनआईसीडी टीम ने दक्षिण अफ्रीका के स्वास्थ्य विभाग और सिक्वेन्सिंग करने वाले अन्य लैब्स को इसकी जानकारी दे दी. जल्द ही दोनों जगहों से भी ऐसे ही सैंपल्स आने लगे. एनआईसीडी टीम ने जब  GISAID ग्लोबल साइंस डेटाबेस में ये डेटा डाला तो पाया कि बोत्सवाना और हांगकांग ने भी इसी तरह के जीन सीक्वेंस के मामले दर्ज किए थे. 24 नवंबर को एनआईसीडी के अधिकारियों और विभाग ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को इसकी जानकारी दे दी.

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वियाना ने कहा, इस समय तक, दक्षिण अफ्रीका के गौटेंग प्रांत  में दो-तिहाई से अधिक पॉजिटिव टेस्ट आने लगे थे जिनमें S-gene ड्रॉपआउट था. ये इस बात का संकेत था कि ओमिक्रॉन पहले ही हावी हो चुका है. देश के प्रमुख संक्रामक रोग विशेषज्ञ सलीम अब्दुल करीम के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका की डेली COVID-19 संक्रमण दर इस सप्ताह के अंत तक चौगुनी होकर 10,000 से अधिक होने की उम्मीद है.

बड़ा सवाल ये है कि नया वैरिएंट इम्यूनिटी को कितना चकमा देता है, पहले वैरिएंट की तुलना में इसके लक्षण कितने गंभीर हैं और अलग-अलग उम्र के लोगों पर ये किस तरह असर डालता है. वैज्ञानिकों की टीम इन सवालों के जवाब खंगालने में जुट गई है और उम्मीद जताई जा रही है कि ये 3-4 हफ्ते में इन सभी सवालों के जवाब ढूंढने में वैज्ञानिक सफल हो जाएंगे.

 

 

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