तुर्की के शाही दरबार से बुंदेलखंड तक...ये है गुजिया का 800 साल पुराना इतिहास, समय के साथ ऐसे बदला रूप

History of gujiya: रिसर्च और फूड–राइटर्स की रिपोर्ट्स बताती हैं कि 13वीं से 17वीं सदी के बीच अलग-अलग रसोइयों और राजदरबारों में प्रयोग होते-होते गुजिया का नया रूप दिया था. तो आइए गुजिया का इतिहास जान लेते हैं.

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गुजिया को तुर्की के बकलावा से जोड़कर देखा जाता है. (Photo: ITG) गुजिया को तुर्की के बकलावा से जोड़कर देखा जाता है. (Photo: ITG)

मृदुल राजपूत

  • नई दिल्ली,
  • 03 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 12:01 PM IST

History of gujiya: होली का त्योहार और गुजिया की महक.... बस फिर क्या है किसी के भी मुंह में पानी लाने के लिए इतना ही काफी है. सुनहरी और घी में नहाई मैदे की वह कुरकुरी परत जो दांतों के नीचे आते ही खस्तापन बिखेर देती है. उसके अंदर की इलायची की खुशबू वाला दानेदार मावा, चीनी की हल्की मिठास और बारीक कटे मेवे जब जुबान पर घुलते हैं तो ऐसा लगता है, मानो खाते ही जाओ. आधे चांद जैसी दिखने वाली ये गुजिया उत्तर भारत की परंपरा का हिस्सा है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस गुजिया को हम अपना मानते हैं, उसका इतिहास तुर्की से भी जुड़ा होने का दावा किया जाता है.

दरअसल, काफी सारी थ्योरीज हैं जो गुजिया को तुर्की की फेमस डिश बकलावा का ही मॉडर्न रूप बताती हैं. तो आइए जानते हैं, आप सभी की फेवरेट गुजिया समय के साथ कितनी बदली और पहली बार इसे कैसे बनाया गया.

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तुर्की कनेक्शन और 13वीं सदी में जिक्र

इतिहासकारों के अनुसार, गुजिया का शुरुआती रूप 13वीं शताब्दी के आसपास भारतीय खाने का हिस्सा बन चुका था. उस समय के संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं के ग्रंथों में 'गूंझा' (Gunjha) नाम के एक पकवान का वर्णन मिलता है यानी कि गुजिया का इतिहास अब तक  करीब 700-800 साल के बीच बैठता है.

भारत के फूड हिस्टोरियन के.टी. अचाया (K.T. Achaya) ने अपनी बुक्स 'ए हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड' और 'द स्टोरी ऑफ फूड' में भारतीय खाने के विकास, तली हुई पेस्ट्री और त्योहारों की डिशेज पर विस्तार से लिखा है. वो कहते हैं, भरवां, तली हुई पेस्ट्री और त्योहारों की मिठाइयों की परंपरा भारत में सदियों पुरानी है जो अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप लेकर विकसित हुई. 13वीं और 14वीं शताब्दी के साहित्य में 'गूंझा' (Gunjha) या 'पूरी' जैसे पकवानों का उल्लेख मिलता है, जो आज की गुजिया का ही शुरुआती रूप थे.

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History Behind Gujiya रिपोर्ट के मुताबिक, गुजिया जैसी मिठाई का सबसे पुराना जिक्र 13वीं सदी में हुआ था. उस समय जहां गुड़-शहद के मिश्रण को गेहूं के आटे से ढककर धूप में सुखाने का उल्लेख मिलता है. रिपोर्ट का कहना है कि कुछ फूड हिस्टोरियंस गुजिया के आइडिया को तुर्की के बकलावा से जोड़ते हैं जो फ्लेकी, मीठी, भरी हुई पेस्ट्री है और वहां के अमीर तबके और सुल्तानों की पसंदीदा डिश मानी जाती थी. 
 

बताया जाता है कि मध्य एशिया के व्यापारी जब भारत आए थे तो वो अपने साथ समोसा और बकलावा जैसी खाने की चीजें लेकर आए थे. समय के साथ समोसा नमकीन हो गया और बकलावा में भारतीय टच मिलाया गया तो वह गुजिया बन गया. इसका कारण तुर्की में मैदे की परतों के बीच ड्राईफ्रूट्स भरने का चलन था जिसे भारत में मावा (खोया) के साथ बदलकर एक नया रूप दे दिया गया जिसे लोग काफी चाव से खाते हैं.

इतिहासकार बुंदेलखंड को गुजिया का 'गढ़' मानते हैं क्योंकि मध्यकाल में जब उत्तर भारत के खान-पान में बदलाव हो रहे थे तब बुंदेलखंड के राजाओं और वहां के शाही रसोइयों ने चंद्रकला (गोल गुजिया) बनाई थी. वहां से यह धीरे-धीरे ब्रज और फिर पूरे उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार में फैली थी.

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बुंदेलखंड, ब्रज और मुगल दरबार वाली गुजिया

रिपोर्ट दावा करती है कि गुजिया बुंदेलखंड के राजाओं के रसोई की शाही डिश थी. रिपोर्ट में इतिहासकार संजेश त्रिपाठी के हवाले से लिखा है कि बिजनेस के सिलसिले में बाहर गए लोग पेस्ट्री का आइडिया लेकर आए और यहां आकर गेहूं या मिलेट के आटे, खोया और सूखे ड्राईफ्रूट्स के साथ उसे लोकल टेस्ट के हिसाब से बदल लिया.

रिपोर्ट में यह भी जिक्र किया गया है कि ब्रज (मथुरा–वृंदावन) में 16वीं सदी में गुजिया को इलायची और ड्राईफ्रूट्स के साथ भगवान कृष्ण को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता था. दरअसल, भक्ति काल के समय जब भगवान कृष्ण के मंदिरों में 56 भोग की परंपरा शुरू हुई थी तो उनके भोग में 'चंद्रकला' और 'गुजिया' जैसे पकवान शामिल थे. ब्रज की लोककथाओं और पुरानी मंदिर रसोइयों के रिकॉर्ड्स बताते हैं कि यह मिठाई करीब 500 सालों से बनाई जा रही है.

समय के साथ कैसे बदली 'गुजिया'? 

जैसे-जैसे समय और स्थान बदलता गया, गुजिया बनाने के तरीके और फिलिंग में लोग लोकल टच देते गई. यानी हम आज जो चाश्नी वाली मीठी गुजिया खाते हैं, वो करीब 700-800 सालों बाद इस रूप में आई है. 

13वीं सदी: 'गूंझा' के रूप में जन्म (सादे मीठे पकोड़े या पूरी जैसा)
15वीं-16वीं सदी: मध्य एशियाई प्रभाव (बकलावा तकनीक) के कारण इसमें मावा और बारीक मेवे की फिलिंग शुरू हुई
मुगल काल: इसे और अधिक 'शाही' बनाया गया, केसर और महंगे मेवों का इस्तेमाल बढ़ गया.
आज: यह पारंपरिक मावे से निकलकर, अलग-अलग फ्लेवर जैसे चॉकलेट, केसर, शुगर फ्री आदि वर्जन तक पहुंच गई है.

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हर राज्य का अपना खास स्वाद

होली और त्योहारों की शान गुजिया जिस-जिस राज्य में पहुंची, समय के साथ अपनी अलग खासियत और नाम लेकर आगे बढ़ती गई. जैसे

महाराष्ट्र और गुजरात: इन राज्यों में गुजिया को करंजी कहा जाता है जिसमें ताजे नारियल और गुड़ का इस्तेमाल होता है.

बिहार और झारखंड: इन राज्यों में पिड़किया के नाम से जाना जाता है जिसमें सूजी और खोया दोनों का मिश्रण भरा जाता है.

दक्षिण भारत: कर्नाटक में इसे कर्जीकाई कहते हैं जहां इसकी फिलिंग में खसखस और नारियल का प्रयोग होता है.

भले ही गुजिया का इतिहास जो भी रहा हो, इसकी फिलिंग और बनाने के तरीके को कई बार बदला हो, लेकिन इसकी असली पहचान आज भी इसका टेस्ट और खुशबू है जो हर त्योहार में जान डाल देती है.

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