Fatty Liver in India: भारत में पिछले कुछ सालों में फैटी लिवर डिसीस में खतरनाक रूप से तेजी देखी गई है. इस बीमारी के मामले में भारत दुनिया के टॉप 3 देशों में शामिल है जो अपने-आप में काफी डराने वाली बात है. कभी शराब को इस बीमारी का कारण माना जाता था लेकिन अब यह साइलेंट लिवर रोग मोटापा, डायबिटीज और मॉडर्न लाइफस्टाइल की वजह से फैल रहा है और भारत इस लिस्ट में तेजी से ऊपर बढ़ रहा है.
फैटी लिवर ले रहा भयावह रूप
नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) जिसे अब मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) के नाम से जाना जाता है, तेजी से भारतीयों के बीच फैल रही है.
जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (JAMA) में पब्लिश एक बड़ी और नई स्टडी के अनुसार, नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर रोग दुनिया का सबसे आम क्रॉनिक लिवर डिसऑर्डर बन चुका है जो दुनिया की करीब 30-40 प्रतिशत आबादी को प्रभावित करता है और पेट का मोटापा इसका सबसे बड़ा रिस्क फैक्टर है.
स्टडी में पाया गया है कि टाइप 2 डायबिटीज वाले लगभग 60-70 प्रतिशत लोग और मोटापे से पीड़ित लगभग 70-80 प्रतिशत लोग MASLD से प्रभावित हैं.
भारत में MASLD का मेन रिस्क फैक्टर क्या है?
डायबिटीज और मोटापे के अलावा यह बीमारी हाई कोलेस्ट्रॉल, हाइपरटेंशन, कोरोनरी आर्टरी डिजीज और कई तरह के कैंसर जिसमें लिवर कैंसर के गंभीर रूप भी शामिल हैं, उनसे भी जुड़ी है. यानी ये आगे चलकर इन बीमारियों का रिस्क बढ़ाती है.
रिसर्चर्स बताते हैं कि पुरुषों में MASLD (मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर) की व्यापकता महिलाओं की तुलना में अधिक है. पुरुषों में प्रति 1 लाख की आबादी पर यह आंकड़ा 15,731 है जबकि महिलाओं में यह 14,310 है. यह बीमारी 45 से 49 साल के पुरुषों में सबसे ज्यादा है जबकि महिलाओं में यह 50 से 54 साल की उम्र के बीच पहुंचती है.
भारत में तेजी से बढ़ रहा प्रकोप
भारत उन देशों में से एक के रूप में उभरा है जहां इनके मामलों में सबसे तेजी से वृद्धि हुई है.
मुंबई के डायबेटोलॉजिस्ट और मोटापे के विशेषज्ञ डॉ. राजीव कोविल ने चेतावनी दी है कि अगर मौजूदा ट्रेंड्स जारी रहे तो MASLD जल्द ही देश की सबसे बड़ी मेटाबॉलिक डिसीस बन सकती है. हालांकि फिर भी विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि अगर इस बीमारी का जल्दी पता चल जाए तो इसे ठीक किया जा सकता है.
हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. सिरिएक एबी फिलिप्स, जिन्हें सोशल मीडिया पर लिवरडॉक के नाम से जाना जाता है, ने X पर बताया कि कई मरीजों को यह एहसास नहीं होता कि समय पर लाइफस्टाइल में बदलाव करके इस कंडीशन को पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है.
उन्होंने लिखा, 'इसके लिए बस अपने शरीर और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी लेना जरूरी है. कोई शॉर्टकट नहीं. धीरे-धीरे और लगातार आगे बढ़ें.'
खराब लाइफस्टाइल से बढ़ रही है बीमारी
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के नए अनुमानों में भी इस बात का जिक्र किया गया है कि भारत में इस कंडीशन का प्रसार 9-53 प्रतिशत के बीच हो सकता है.
अध्ययन से पता चलता है कि MASLD और इसके गंभीर रूप दोनों ही तब ज्यादा कॉमन हो जाते हैं जब मेटाबॉलिक सिंड्रोम से जुड़ी बाकी दिक्कतें जैसे हाई ब्लड प्रेशर, बढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड्स, गुड कोलेस्ट्रॉल का कम स्तर जैसी परेशानियां भी मरीज में होती हैं.
'गोलियों से ज्यादा डाइट और एक्टिविटी पर ध्यान दें'
लाइफस्टाइल में बदलाव ही सबसे बड़ा इलाज है. JAMA में छपे अध्ययन में वजन कम करने वाली डाइट, रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी और शराब से बचने पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया है.
हालांकि रेस्मेटिरोम (Resmetirom) और सेमाग्लूटाइड जैसी दवाओं को हल्के से गंभीर बीमारी वाले मरीजों के लिए US फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन से कंडीशनल मंजूरी मिल चुकी है लेकिन एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि दवा को लाइफस्टाइल में सुधार का विकल्प न समझें.
डॉ. फिलिप ने इस बात पर जोर दिया कि एक्सरसाइज करना, वजन कम करना, मेटाबॉलिक कंडीशन्स जैसे बीपी पर कंट्रोल और थोड़ी मात्रा में भी शराब न पीना आपके लिए सबसे बेहतरीन लिवर डिटॉक्स थेरेपी से कहीं ज्यादा फायदेमंद है. साथ ही उन्होंने सूजन बढ़ाने वाले खाने की चीजों खासकर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड चीजें, फ्रक्टोज जैसी रिफाइंड शुगर और मक्खन, घी, चर्बी और नारियल तेल जैसे सैचुरेटेड फैट को सीमित करने की जरूरत पर भी जोर दिया.
सुमी सुकन्या दत्ता