केंद्रीय बजट 2026-27 ने कैंसर मरीजों और उनके परिवारों को राहत दी है. अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कैंसर से जुड़ी 17 दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी हटाने की घोषणा की. इस कदम का मकसद कैंसर के इलाज में जान बचाने वाली दवाओं और थेरेपी की कीमतों को कम करना और हर किसी के लिए इलाज तक पहुंच में सुधार करना है. खासकर उन मरीजों के लिए जो इम्पोर्टेड दवाओं पर निर्भर हैं.
इस घोषणा का कैंसर विशेषज्ञों ने स्वागत किया है लेकिन कई ऑन्कोलॉजिस्ट का यह भी कहना है कि असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि किन दवाओं को इसमें शामिल किया गया है और क्या यह बचत पूरे इलाज के दौरान किफायती साबित होगी.
कैंसर मरीजों को कितना फायदा होगा
मेडिकल प्रैक्टिशनर्स का कहना है कि कस्टम ड्यूटी हटाना दवाओं की कीमतें कम करने के लिए उपलब्ध सबसे अच्छे तरीकों में से एक है. खासकर महंगी इम्पोर्टेड थेरेपी के लिए. यही वजह है कि कोलकाता के सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. गौतम मुखोपाध्याय ने इस फैसले को उत्साहजनक बताया लेकिन इस दौरान उन्होंने इसमें शामिल दवाओं की स्पष्ट जानकारी की जरूरत पर भी जोर दिया. यानी कि यह साफ किया जाना चाहिए कि कौन सी दवा में किस हद तक छूट है और इससे मरीज को कितना फायदा होगा.
उन्होंने कहा कि कैंसर का इलाज अक्सर लंबे समय तक चलता है जिसका मतलब है कि दवाओं की कीमतों में थोड़ी सी भी कमी से फर्क पड़ सकता है लेकिन तभी जब ये दवाएं देश में बीमारियों के बोझ के हिसाब से बहुत प्रासंगिक हों.
भारत में ये कैंसर हैं सबसे कॉमन
उन्होंने 'द टेलीग्राफ' ऑनलाइन को बताया, भारत में सबसे आम कैंसर में फेफड़े, स्तन और मुंह के कैंसर शामिल हैं. महिलाओं में सर्वाइकल और स्तन कैंसर जबकि पुरुषों में फेफड़े, प्रोस्टेट और मुंह के कैंसर ज्यादा होते हैं. इसलिए इस पॉलिसी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या ड्यूटी में छूट भारतीयों को सबसे ज्यादा शिकार बनाने वाले कैंसरों के इलाज में फायदा देती है या नहीं.
उन्होंने चेतावनी दी कि बिना लक्ष्य तय किए इस तरह की छूट से काफी असमानता रहेगी.
संसद में बजट पेश करते हुए सीतारमण ने कहा कि ड्यूटी में छूट सीधे तौर पर कई तरह के कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली जरूरी ऑन्कोलॉजी दवाओं की लागत को कम करेगी. कैंसर की इम्पोर्टेड दवाओं पर आमतौर पर बेसिक कस्टम ड्यूटी लगती है जो डिस्ट्रीब्यूटर मार्जिन और टैक्स के बाद उनकी अंतिम कीमत में काफी बढ़ोतरी कर देती है.
दवाओं के अलावा भी कैंसर के इलाज में खर्च होता है मोटा पैसा
मुखोपाध्याय ने यह भी बताया कि पिछले कुछ सालों में भारत में कैंसर की दवाओं तक पहुंच में सुधार हुआ है लेकिन उन्हें खरीदना अभी भी एक चुनौती बनी हुई है. उन्होंने कहा कि सिर्फ दवाओं की कीमतें कम करने से मरीजों पर आर्थिक बोझ कम नहीं होगा. अस्पताल में भर्ती होने का खर्च, डायग्नोस्टिक्स, सर्जरी और देखभाल अक्सर कुल खर्च का एक बड़ा हिस्सा होते हैं, खासकर प्राइवेट हेल्थकेयर सेटिंग्स में तो यह खर्च बहुत ही ज्यादा है.
उन्होंने कहा, दवाओं की कीमतों में राहत जरूरी है लेकिन यह कैंसर के इलाज की पूरी लागत को निपटान नहीं करती है. कलकत्ता मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी डिपार्टमेंट के पूर्व हेड डॉ. सुबीर गांगुली ने कहा कि कस्टम ड्यूटी में छूट का सबसे ज्यादा फायदा पेटेंट वाली और इंपोर्टेड दवाओं को मिलेगा न कि उन जेनेरिक दवाओं को जो पहले से ही देश में बन रही हैं.
उन्होंने द टेलीग्राफ ऑनलाइन को बताया, यह फैसला ग्लोबलाइज्ड फार्मास्युटिकल मार्केट में काम करने के फायदे दिखाता है.
उन्होंने समझाया कि असल में पेटेंट वाली दवाओं पर टैक्स कम करने से राहत मिलती है. क्योंकि वो दवाएं वैसे भी महंगी होती हैं. जबकि जेनेरिक दवाओं के लिए ड्यूटी में बदलाव से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनकी कीमतें पहले से ही कम होती हैं.
आसान शब्दों में कहें तो ये दवाएं इंपोर्ट करने पर टैक्स की वजह से महंगी हो जाती थीं. अब वह टैक्स हटा दिया गया है. इस बदलाव का सीधा मतलब यह है कि इलाज थोड़ा सस्ता हो जाएगा और मरीजों के लिए लागत की वजह से बीच में दवाएं छोड़ने की संभावना कम हो जाएगी.
आइए जानते हैं कि छूट के बाद सस्ती हुई कैंसर की कुछ दवाओं की कीमत में पहले और अब क्या अंतर आएगा.
1. रिबोसाइक्लिब
यह दवा खास तौर पर ब्रेस्ट कैंसर के मरीजों के लिए इस्तेमाल होती है जिनका कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल गया है.
यह कैंसर सेल्स को बढ़ने से रोकती है ताकि बीमारी कंट्रोल में रहे. भारत में इसकी कीमत हर महीने लगभग 2.5-3 लाख रुपये है. पहले, सिर्फ टैक्स के तौर पर लगभग 10 परसेंट इंपोर्ट ड्यूटी (25,000-30,000 रुपये) लगती थी. अब वह ड्यूटी हटा दी गई है इसलिए कीमत में लगभग 20 से 30 हजार रुपये की कमी आ सकती है.
2. एबेमासिक्लिब
ब्रेस्ट कैंसर में दी जाने वाली एक और दवा खासकर जब कैंसर हार्मोन से जुड़ा हो. इसे लंबे समय तक लेना होता है. इसकी कीमत लगभग 2-2.5 लाख रुपये प्रति महीना है. इंपोर्ट ड्यूटी की वजह से इसमें लगभग 20,000 रुपये एक्स्ट्रा लगते थे. अब यह बचत कम हो सकती है.
3. टैलीकैबटाजीन ऑटोल्यूसेल
यह CAR-T थेरेपी नाम का एक बहुत एडवांस्ड इलाज है. इसमें मरीज के अपने खून से सेल्स लिए जाते हैं और कैंसर से लड़ने के लिए उन्हें मॉडिफाई किया जाता है. इसे ब्लड कैंसर के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इसकी कीमत बहुत ज्यादा है यानी लगभग 3-4 करोड़ रुपये. पहले इस पर भी इंपोर्ट टैक्स लगता था. ड्यूटी हटने से इलाज की कुल लागत में कई लाख रुपये की राहत मिल सकती है.
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