आज के दौर में पेट की निकलती चर्बी या मोटापा हर उम्र के लोगों के लिए काफी खतरनाक है. जिम से लेकर डाइट तक, इसे घटाने के लिए लोग हर मुमकिन कोशिश करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस फैट को आज बीमारियों की जड़ माना जा रहा है वो कभी इंसान के लिए मोटापा नहीं बल्कि जीवन बचाने के लिए एनर्जी बैंक की तरह काम करती थी. यानी कि यह इंसान को जिंदा रहने के लिए सबसे बड़ा हथियार था. साइंस कहता है कि इंसान के शरीर में फैट जमा होने की प्रक्रिया ठीक वैसी ही है जैसे ऊंट अपने कूबड़ में एनर्जी को सुरक्षित रखता है. यह कोई अचानक आई समस्या नहीं, बल्कि करोड़ों साल के विकासवाद (Evolution) का नतीजा है.
ऑनलाइन लाइब्रेरी वाइली में पब्लिश्ड रिसर्च Evolutionary origins of obesity में बताया गया है, इंसान और दूसरे प्राइमेट्स में फैट स्टोर करने की क्षमता लाखों साल के विकास का हिस्सा है. रिसर्च बताती है कि जब भोजन कम मिलता था और शारीरिक मेहनत बहुत अधिक थी, तब शरीर ने ऐसे समय में एनर्जी को बचाने के लिए एक रणनीति तैयार की थी. इसका मतलब यह था कि जो कैलोरी आज मिलती, वह फैट बनकर कल के लिए सुरक्षित रहे.
सेल मेटाबॉलिज्म जर्नल में पब्लिश रिसर्च में भी बताया गया है, शिकारी युग में हमारे पूर्वजों को कई दिनों तक भूखा रहना पड़ता था. ऐसे में इंसानी शरीर ने खुद को जिंदा रखने के लिए एक खास तरीका विकसित किया. शरीर ने भोजन से मिलने वाली अतिरिक्त कैलोरी को फैट के रूप में जमा करना शुरू कर दिया, ताकि जब भोजन न मिले, तो शरीर इस स्टोर की गई एनर्जी का इस्तेमाल कर सके.
यह फैट एक तरह के 'पावर बैंक' की तरह काम करता था, जिसने अकाल और सूखे के दौरान हमारे पूर्वजों को मरने से बचाया. आज यही जैविक सिस्टम मॉडर्न लाइफस्टाइल में पेट की चर्बी, विसरल फैट और हेल्थ रिस्क की वजह बन गया है.
वैज्ञानिकों का मानना है कि इंसानों में थ्रिफ्टी जीन (Thrifty Gene Hypothesis) पाया जाता है. यह जीन हमारे शरीर को इस तरह प्रोग्राम करता है कि वह फैट को अच्छी तरह से स्टोर करे.
नेचर जेनेटिक्स में पब्लिश्ड रिसर्च के मुताबिक, करीब डेढ़ से 2 करोड़ साल पहले जब पृथ्वी के तापमान में बदलाव आया और फल कम होने लगे, तब हमारे पूर्वजों के शरीर में यूरिकेज नाम के एंजाइम में म्यूटेशन हुआ. इस बदलाव की वजह से शरीर फ्रुक्टोज को तेजी से फैट में बदलने लगा. उस समय यह बदलाव जीवन रक्षक था क्योंकि कम खाने में भी शरीर ज्यादा एनर्जी स्टोर कर पा रहा था.
रिसर्च के मुताबिक, इंसानों में फैट सेल्स की जैविक बनावट दूसरे प्राइमेट्स की तुलना में अलग है, जिससे शरीर व्हाइट फैट को आसानी से ब्राउन फैट या एनर्जी बर्न करने वाले फैट में बदल सकता है. यही वजह है कि इंसान का शरीर एनर्जी बचाने में तो माहिर है लेकिन आज के समय में अधिक कैलोरी और कम एक्टिविटी वाली लाइफस्टाइल से उसे नुकसान हो रहा है.
ऊंट भी फैट को अपने कूबड़ में जमा करके लंबे समय तक एनर्जी स्टोर करके रखता है. लेकिन इंसान में यह प्रक्रिया पूरे शरीर में होती है लेकिन खासतौर पर पेट के आसपास फैट जमा होने लगता है. फर्क सिर्फ इतना है कि ऊंट का यह सिस्टम रेगिस्तान के लिए फायदेमंद है जबकि इंसान के लिए मॉडर्न लाइफ में यही सिस्टम जोखिम बढ़ा रहा है.
कम फिजिकल एक्टिविटी, प्रोसेस्ड फूड, अधिक कैलोरी और नींद की कमी शरीर को लगातार फैट स्टोर करने के लिए मजबूर करती है. इसलिए पेट की चर्बी को सिर्फ कॉस्मेटिक समस्या मानना गलत होगा, क्योंकि यह शरीर के अंदर चल रहे मेटाबॉलिक बदलाव का संकेत है.
जब आज के कुछ साल पहले इंसानों का खान-पान और लाइफस्टाइल पूरी तरह बदल गई, तब असली समस्या शुरू हुई. यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो के रिसर्चर्स का कहना है कि आज हमारे पास भोजन की कमी नहीं है लेकिन हमारा डीएनए (DNA) अभी भी उसी पुराने 'हंटर-गैदरर' मोड पर चल रहा है.
आज हम शारीरिक मेहनत कम करते हैं और हाई-कैलोरी फूड ज्यादा लेते हैं. नतीजा यह है कि शरीर अभी भी भविष्य के अकाल के डर से फैट जमा करता जा रहा है, लेकिन वह अकाल कभी आता ही नहीं. और वही यह स्टोर्ड एनर्जी आज मोटापे, डायबिटीज और हार्ट डिजीज के सबसे बड़े कारणों में से एक है.
पेट के अंदर जमा होने वाली चर्बी को विसरल फैट कहा जाता है. यह शरीर के अंदर अंगों के आसपास जमा होती है और मेटाबॉलिक सिंड्रोम, डायबिटीज और हार्ट डिजीज के जोखिम से जुड़ी मानी जाती है. इसी वजह से डॉक्टर अक्सर कमर की माप को सिर्फ वजन से ज्यादा अहम मानते हैं.
आजतक लाइफस्टाइल डेस्क