VLDL Cholesterol Level: दुनिया भर में हार्ट अटैक से हर साल कई जान जा रही है और भारत में भी यह बीमारी तेजी से अपने पैर पसार रही है. जहां पहले सिर्फ बुजुर्गों की बीमारी समझा जाता था, मगर अब युवाओं को भी दिल की बीमारियों अपनी चपेट में ले रही हैं. भारत के महापंजीयक के अधीन नमूना पंजीयन सर्वेक्षण (Sample Registration Survey, SRS) के आकंड़ों के मुताबिक, देश में लगभग 31 प्रतिशत मौतें हार्ट डिजीज की वजह से होती हैं.
हार्ट अटैक की वजह कोलेस्ट्रॉल को माना जाता है और कई लोग इसकी जांच भी करवाते हैं. हालांकि कोलेस्ट्रॉल के अलग-अलग प्रकारों के बारे में लोग नहीं जानते हैं. अधिकतर लोग रिपोर्ट्स में सिर्फ लोग LDL यानी बैड कोलेस्ट्रॉल पर ध्यान देते हैं अगर वो ज्यादा होता है तो लोग परेशान हो जाते हैं, मगर बहुत कम ही लोग VLDL पर ध्यान देते हैं. कोलेस्ट्रॉल के इस प्रकार के बारे में भी जानना बहुत जरूरी है, क्योंकि यह दिल से जुड़ी बीमारियों को इफेक्ट कर सकता है.
वीएलडीएल का पूरा नाम वेरी लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन होता है, यह उन पांच मुख्य प्रकार के लिपोप्रोटीन में से एक है जो खून में कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स का ट्रांसपोर्ट करते हैं. सबसे जरूरी बात यह है कि VLDL को हमारा लिवर बनाता है. इसे आप आम भाषा में एक तरह का फैट ढोने वाला ट्रक मान सकते हैं.
हालांकि, जब लिवर जरूरत से ज्यादा वीएलडीएल का निर्माण करता है, तो इससे कई समस्याएं हो सकती हैं, जिनमें दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ना भी शामिल है.
VLDL के अलावा कोलेस्ट्रॉल के प्रकार हैं- एचडीएल (हाई-डेंसिटी), एलडीएल (लो-डेंसिटी), आईडीएल (इंटरमीडिएट-डेंसिटी) और काइलोमाइक्रोन.
वीएलडीएल का काम होता है फैट (ट्राइग्लिसराइड्स) को ब्लड के रास्ते शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाना, ताकि शरीर को एनर्जी मिल सके.
न्यूयॉर्क शहर के एनवाईयू लैंगोन हार्ट में हार्ट डिजीज एक्सपर्ट डॉ. ग्रेगरी कैट्ज के मुताबिक, जैसे-जैसे वीएलडीएल सेल्स में ट्राइग्लिसराइड छोड़ते हैं और छोटे होते जाते हैं, उनकी शेप बदल जाती है और वे एलडीएल में बदल जाते हैं, जिनमें ट्राइग्लिसराइड कम और कोलेस्ट्रॉल अधिक होता है.
खराब कोलेस्ट्रॉल होता है खतरनाक
LDL को खराब कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है क्योंकि अगर यह ज्यादा हो जाए, तो यह धमनियों में प्लाक का कारण बन सकता है. प्लॉक जमने से दिल की खतरनाक बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है, खराब कोलेस्ट्रॉल अधिक होने की वजह से हार्ट अटैक, स्ट्रोक का खतरा डबल हो जाता है.
VLDL में करीब 70% ट्राइग्लिसराइड, 10% कोलेस्ट्रॉल, 10% प्रोटीन और 10% अन्य फैट होते हैं. अगर हम जरूरत से ज्यादा मीठा या कार्बोहाइड्रेट खाते हैं और उसे जलाते नहीं, तो ट्राइग्लिसराइड बढ़ जाते हैं. इससे VLDL का लेवल भी बढ़ता है. ज्यादा VLDL धमनियों में फैट जमा करता है, जिससे दिल की बीमारी और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है.
LDL यानी खराब कोलेस्ट्रॉल, VLDL से ही बनता है. जब VLDL अपने ट्राइग्लिसराइड छोड़ देता है, तो वह LDL में बदल जाता है. LDL में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा ज्यादा होती है, इसका काम बॉडी सेल्स तक कोलेस्ट्रॉल पहुंचाना होता है. लेकिन अगर LDL अधिक हो जाए, तो यह धमनियों की जमने लगता है, इससे प्लाक बनता है, जो नसों को छोटा और सख्त कर देता है. इस स्थिति को एथेरोस्क्लेरोसिस कहते हैं, ज्यादा LDL से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम दोगुना होता है.
नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट के अनुसार, मेटाबॉलिक सिंड्रोम से मरीजों में VLDL का लेवल खासतौर पर अधिक देखा जाता है.यह ऐसी स्थितियों का ग्रुप है, जो हार्ट डिजीज, हार्ट अटैक, स्ट्रोक और अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ाती है.
क्लीवलैंड क्लिनिक के मुताबिक, ट्राइग्लिसराइड्स का लेवल VLDL के हाई लेवल से संबंधित होता है.
डॉ. कैट्ज बताते हैं कि इंसुलिन रेजिस्टेंस और मेटाबॉलिक सिंड्रोम के मरीजों में ट्राइग्लिसराइड्स का लेवल हाई पाया जाता है, जिसका साफ मतलब होता है कि इंसान पूरी तरह से हेल्दी नहीं है. ट्राइग्लिसराइड्स का हाई होना हार्ट डिजीज के जोखिम के बढ़ने की तरफ इशारा होता है.
अधिकतर लोगों में LDL कोलेस्ट्रॉल की जांच नॉर्मल हेल्थ चेकअप के दौरान हो जाती है. यह टेस्ट आमतौर पर लिपिड प्रोफाइल टेस्ट का हिस्सा होता है, जिसमें कुल कोलेस्ट्रॉल, LDL, HDL और ट्राइग्लिसराइड्स देखे जाते हैं.
VLDL के लिए अलग से कोई टेस्ट नहीं होता. इसका आमतौर पर ट्राइग्लिसराइड्स के लेवल से अंदाजा लगाया जाता है. कई डॉक्टर VLDL की जांच तभी करते हैं, जब खास जरूरत होती है.
अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार, 20 साल से ऊपर के सभी लोगों को हर 4–6 साल में कोलेस्ट्रॉल का टेस्ट कराना चाहिए. अगर किसी इंसान को दिल की बीमारी का खतरा अधिक है या वह इलाज ले रहा है, तो डॉक्टर जांच जल्दी-जल्दी भी करवा सकते हैं.
क्लीवलैंड के अनुसार, ज्यादातर मामलों में, ट्राइग्लिसराइड्स का लेवल आपके VLDL लेवल से लगभग पांच गुना अधिक होता है. VLDL का पता LDL से भी लगाया जा सकता है, क्योंकि वीएलडीएल आखिर में एलडीएल में ही बदल जाता है.
डॉ. कैट्ज का कहना है कि जब VLDL कोलेस्ट्रॉल की डिटेल में जांच करवाई जाती है, तो VLDL 30 mg/dL से कम हो तो इसे नॉर्मल माना जाता है. अगर VLDL 15 mg/dLसे भी कम है इसे सबसे अच्छा माना जाता है. इसका मतलब साफ है कि 30 mg/dL से अधिक VLDL खतरे की घंटी हो सकता है.
VLDL (वेरी लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन) कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए सबसे पहले अपने ट्राइग्लिसराइड्स को कम करने पर ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि ट्राइग्लिसराइड्स कम होगा, तो आपका वीएलडीएल खुद ही कम होने लगेगा. इसके लिए आपको कुछ जरूरी कदम उठाने की जरूरत है.
जब इन सब चीजों का असर ना दिखाई दें,तभी डॉक्टर से आप ट्राइग्लिसराइड्स कम करने की दवाइयां ले सकते हैं. हालांकि सबसे पहले डाइट और लाइफस्टाइल में बदलाव से ही इसे कम करने की कोशिश करनी चाहिए.
आजतक लाइफस्टाइल डेस्क