धर्म बदलते ही SC का दर्जा खत्म! समझें मुस्लिम या ईसाई बनने पर क्यों छिन जाता है पुराना स्टेटस

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में Constitution (Scheduled Castes) Order, 1950 के क्लॉज-3 का जिक्र किया और कहा कि अनुसुचित जाति का दर्जा सिर्फ हिन्दू, बौद्ध और सिख धर्म को मानने वाले लोगों को ही मिल सकता है. अगर अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति धर्म बदलता है तो तुरंत उसका ये दर्जा समाप्त हो जाएगा.

Advertisement
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिन्दू, सिख और बौद्ध के लिए है.  (Photo: ITG) सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिन्दू, सिख और बौद्ध के लिए है. (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 24 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 3:36 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अनुसूचित जाति के स्टेटस पर एक ऐतिहासिक फैसला दिया है. कोर्ट ने कहा कि कोई भी ऐसा व्यक्ति जो हिंदू धर्म, सिख धर्म या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति (Sheduled caste) का नहीं माना जाएगा. कोर्ट ने आगे कहा कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानने वाला अनुसूचित जाति (SC) का कोई व्यक्ति अगर किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करता है तो उसका अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत और पूरी तरह से खत्म हो जाएगा. 

Advertisement

इसका मतलब यह है कि अगर अनुसूचित जाति (SC) का कोई व्यक्ति जो पहले हिंदू धर्म, सिख धर्म या बौद्ध धर्म को मानता था अगर ऐसा व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है और इस्लाम या क्रिश्चयन धर्म को अपनाता है तो उसका SC का दर्जा खत्म हो जाएगा.

सु्प्रीम कोर्ट ने इसके साथ ही आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें यह कहा गया था कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है और सक्रिय रूप से उस धर्म को मानता तथा उसका पालन करता है तो उसे अनुसूचित जाति समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता. 

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के एक आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित कोई भी व्यक्ति अगर किसी दूसरे धर्म में धर्मांतरण करता है वो वह तत्काल और पूरी तरह से अपना SC दर्जा खो देता है. 

Advertisement

कोर्ट ने कहा कि Constitution (Scheduled Castes) Order, 1950 में यह साफ कर दिया था और इस आदेश के तहत रोक पूरी तरह से लागू थी. कोर्ट ने साफ किया कि 1950 के आदेश के क्लॉज 3 में बताए गए धर्मों के अलावा किसी भी दूसरे धर्म को अपनाने पर, जन्म की स्थिति के बावजूद अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत खत्म हो जाता है. 

यह भी पढ़ें: हिंदू, सिख या बौद्ध के अलावा दूसरा धर्म अपनाया तो छिन जाएगा अनुसूचित जाति का दर्जा: SC

कोर्ट ने कहा,  "कोई भी व्यक्ति, जिसे क्लॉज 3 के तहत अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाता है, संविधान या संसद या राज्य विधानमंडल के किसी कानून के तहत किसी भी कानूनी फायदे, सुरक्षा, आरक्षण या अधिकार का दावा नहीं कर सकता और न ही उसे ये दिए जा सकते हैं. यह रोक पूरी तरह से लागू है और इसमें कोई छूट नहीं है. कोई भी व्यक्ति एक ही समय पर क्लॉज़ 3 में बताए गए धर्म के अलावा किसी दूसरे धर्म को मान और अपना नहीं सकता, और साथ ही अनुसूचित जाति का सदस्य होने का दावा भी नहीं कर सकता," 

क्या है Constitution (Scheduled Castes) Order, 1950 

Constitution (Scheduled Castes) Order, 1950 भारत के राष्ट्रपति द्वारा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत जारी किया गया एक महत्वपूर्ण आदेश था, जिसने यह तय किया कि किन जातियों को “अनुसूचित जाति (SC)” का दर्जा मिलेगा. 

Advertisement

1950 के इस आदेश का उद्देश्य उन जातियों की आधिकारिक सूची बनाना था, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता का सामना करना पड़ा और जिन्हें विशेष संवैधानिक संरक्षण तथा आरक्षण का लाभ दिया जाना था. 

इस आदेश में एक महत्वपूर्ण धार्मिक शर्त जोड़ी गई थी. केवल हिंदू धर्म के अनुयायी दलितों को ही अनुसूचित जाति का दर्जा दिया गया.

यानी यदि कोई दलित व्यक्ति ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाता था, तो उसे SC का दर्जा नहीं मिलता था. 

समय के साथ इसमें 2 अहम बदलाव किए गए.

मुस्लिम-ईसाई दलित SC में शामिल नहीं

Constitution (Scheduled Castes) Orders (Amendment) Act, 1956 के जरिए सिख दलितों को भी SC सूची में शामिल किया गया.

Constitution (Scheduled Castes) Orders (Amendment) Act, 1990 के जरिए बौद्ध दलितों को भी SC का दर्जा मिला. 

लेकिन आज भी मुस्लिम और ईसाई दलित इस आदेश के तहत अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल नहीं हैं. हालांकि इस पर बहस और कानूनी लड़ाई जारी है. 

Constitution (Scheduled Castes) Order, 1950 का क्लॉज-3 क्या कहता है?

इस आदेश का क्लॉज-3 कहता है कि कोई भी व्यक्ति जो हिंदू धर्म (बाद में संशोधन के बाद सिख और बौद्ध धर्म) के अलावा किसी अन्य धर्म को मानता है उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा. क्लॉज-2 इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यही वह प्रावधान है जिसने अनुसूचित जाति के दर्जे को धर्म से जोड़ दिया. और आरक्षण, छात्रवृत्ति, राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे संवैधानिक लाभों की पात्रता तय की. 

Advertisement

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का पुराना फैसला

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने 30 अप्रैल, 2025 को यह फैसला दिया कि एक बार जब कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है और सक्रिय रूप से उस धर्म को मानता और उसका पालन करता है, तो उसे अनुसूचित जाति समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता. 

हाई कोर्ट ने कहा था कि जाति व्यवस्था ईसाई धर्म दूर की चीज है और इसलिए, वह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों का लाभ उठाने का हकदार नहीं है. 

हाई कोर्ट ने एक शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए उन आरोपों को रद्द कर दिया, जिसने ईसाई धर्म अपना लिया था और एक आपराधिक मामले में SC और ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम का सहारा लिया था.

क्या था आंध्र प्रदेश का केस 

इस आदेश से दुखी होकर, उस व्यक्ति (जो एक पादरी था) ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.

इस मामले में पादरी चिंथाडा आनंद ने 2021 में अक्काला रामी रेड्डी नाम के एक व्यक्ति के खिलाफ़ भारतीय दंड संहिता और SC/ST एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत एक आपराधिक मामला दर्ज किया था. उन्होंने आरोप लगाया था कि आंध्र प्रदेश के एक गांव में जब वे पादरी के तौर पर अपने कर्तव्य निभा रहे थे और रविवार की प्रार्थना करवा रहे थे, तब एक व्यक्ति ने उन पर हमला किया था.

Advertisement

उन्होंने दावा किया कि रामी रेड्डी ने उन पर कई बार हमला किया, और उन्हें तथा उनके परिवार को जान से मारने की धमकियां दी गईं और उनकी जाति के नाम पर उनके साथ गाली-गलौज की गई. 

सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि "मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता का यह दावा नहीं है कि उसने ईसाई धर्म छोड़कर अपने मूल धर्म में वापसी कर ली है, या उसे 'मादिगा' समुदाय में दोबारा स्वीकार कर लिया गया है."

कोर्ट ने कहा, "इसके विपरीत सबूतों से यह साबित होता है कि अपीलकर्ता ईसाई धर्म का पालन करता रहा है और एक दशक से भी ज़्यादा समय से पादरी के तौर पर काम कर रहा है, और गांव के घरों में हर रविवार को नियमित रूप से प्रार्थना सभाएं आयोजित करता है." 

बेंच ने गौर किया कि कथित घटना के समय वह घर पर प्रार्थना सभाएं आयोजित कर रहा था. 

बेंच ने मामले के तथ्यों पर टिप्पणी करते हुए कहा, "ये मिलते-जुलते तथ्य इस बात में कोई शक नहीं छोड़ते कि घटना की तारीख को भी वह ईसाई ही बना रहा." 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement