वकील हैं ममता बनर्जी लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट में क्यों नहीं रख पाएंगी दलील? लीगल पहलू समझिए

सुप्रीम कोर्ट आज पश्चिम बंगाल में SIR के खिलाफ ममता बनर्जी की याचिका पर सुनवाई करेगा. ममता ने खुद पेश होकर दलील देने की अनुमति मांगी है और उनके नाम एंट्री पास भी जारी हुआ है. लेकिन कानून की एक अहम सीमा रेखा तय करेगी कि वे अदालत में बोल पाएंगी या नहीं.

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज एसआईआर मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट जा सकती हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज एसआईआर मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट जा सकती हैं.

उदित नारायण

  • नई दिल्ली,
  • 04 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:46 AM IST

सुप्रीम कोर्ट आज पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के खिलाफ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका पर सुनवाई करेगा. इस बीच, खबर है कि ममता खुद अदालत में मौजूद रह सकती हैं. उन्होंने अपने वकीलों के जरिए सुप्रीम कोर्ट में एक अंतरिम आवेदन दाखिल किया और खुद पेश होकर दलील रखने की अनुमति मांगी है.

सूत्रों के मुताबिक, ममता बनर्जी के नाम सुप्रीम कोर्ट में प्रवेश के लिए पास भी जारी कर दिया गया है. साथ ही यह भी संकेत हैं कि वे मुख्य न्यायाधीश से सीधे अनुमति मांग सकती हैं. लेकिन सवाल अब भी कायम है- क्या कानून इसकी इजाजत देता है. दरअसल, ममता ने एलएलबी किया है. लेकिन एडवोकेट नहीं हैं यानी वे प्रैक्टिसिंग एडवोकेट नहीं है. कहा जा सकता है कि ममता आज सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही में हिस्सा लेती हैं तो वकील के रूप में नहीं, बल्कि याचिकाकर्ता के रूप में शामिल हो सकती हैं.

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LLB करने से क्या कोर्ट में बहस का हक मिल जाता है?

सीधा जवाब है, नहीं. देश में LLB डिग्री यह तो साबित करती है कि किसी व्यक्ति ने कानून की पढ़ाई की है, लेकिन इससे अपने आप अदालत में केस लड़ने, जज के सामने बहस करने या वकालतनामा दाखिल करने का अधिकार नहीं मिलता. कोर्ट में दलील देने का अधिकार Advocates Act, 1961 और Bar Council of India (BCI) के नियमों से तय होता है.

ममता बनर्जी ने क्या किया और क्या नहीं किया?

ममता बनर्जी कानून स्नातक यानी LLB डिग्री होल्डर हैं. लेकिन उन्होंने किसी State Bar Council में Enrollment नहीं कराया. All India Bar Examination (AIBE) पास नहीं किया. Bar Council of India से Certificate of Practice (CoP) नहीं लिया. इसीलिए वे प्रैक्टिसिंग एडवोकेट नहीं मानी जातीं.

कानूनी भाषा में कहें तो ममता बनर्जी Law Graduate हैं. लेकिन एडवोकेट नहीं हैं.

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Advocates Act, 1961 क्या कहता है?

Advocates Act, 1961 के मुताबिक, अदालत में दलील देने का अधिकार सिर्फ उसी व्यक्ति को है- जिसका नाम किसी State Bar Council में दर्ज हो. जिसने AIBE पास किया हो. जिसके पास Certificate of Practice हो. इन शर्तों के बिना अदालत में बहस करना गैरकानूनी प्रैक्टिस की श्रेणी में आता है.

तो ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में क्या कर सकती हैं?

ममता बनर्जी इस मामले में याचिकाकर्ता (Petitioner) के रूप में अदालत में मौजूद रह सकती हैं. कोर्ट की कार्यवाही देख सकती हैं. अपने वकीलों को निर्देश दे सकती हैं. लेकिन जज के सामने खुद कानूनी बहस नहीं कर सकतीं. वकील की भूमिका में दलील नहीं रख सकतीं. वकालतनामा दाखिल नहीं कर सकतीं.

ममता ने सुप्रीम कोर्ट से क्या अनुमति मांगी है?

ममता बनर्जी की ओर से दाखिल अंतरिम आवेदन में कहा गया है कि वे पश्चिम बंगाल SIR मामले में याचिकाकर्ता हैं और केस के तथ्यों से भली-भांति परिचित हैं. उन्हें सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा, प्रक्रिया और परंपराओं की पूरी जानकारी है और वे उसी के अनुरूप आचरण करेंगी. उन्हें SIR प्रक्रिया के कारण पश्चिम बंगाल के लोगों को हो रही जमीनी समस्याओं की प्रत्यक्ष जानकारी है. हालांकि, यह अनुमति पूरी तरह से अदालत के विवेकाधिकार पर निर्भर करती है.

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एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी के बाबू जगजीवन राम इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ के विभागाध्यक्ष डॉ. प्रशांत मिश्रा स्पष्ट करते हैं कि सिर्फ LLB डिग्री होना, सुप्रीम कोर्ट में दलील रखने का अधिकार नहीं देता.

डॉ. मिश्रा कहते हैं, सुप्रीम कोर्ट में बोलने या बहस करने का अधिकार सिर्फ उन्हीं लोगों को होता है, जो Advocates Act, 1961 और Bar Council of India के नियमों के तहत प्रैक्टिसिंग एडवोकेट हों. सबसे पहले State Bar Council में एनरोलमेंट जरूरी है, उसके बाद All India Bar Examination पास करना और Certificate of Practice लेना अनिवार्य होता है.

वे आगे बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में तो शर्तें और भी सख्त हैं. सुप्रीम कोर्ट में किसी केस में वकालतनामा दाखिल करने और दलील रखने का अधिकार सिर्फ Advocate-on-Record (AOR) को होता है. इसके लिए परीक्षा पास करना जरूरी है. बिना AOR बने कोई भी व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट में नियमित रूप से बहस नहीं कर सकता.

डॉ. मिश्रा के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में खुद पक्ष रखने के लिए एक सीमित विकल्प जरूर है, लेकिन वह भी अपवाद है. सुप्रीम कोर्ट किसी व्यक्ति को सिर्फ उसके निजी मामले में विशेष अनुमति देकर खुद बहस करने की इजाजत दे सकता है. इसे ‘बिहाफ ऑफ द परमिशन ऑफ सुप्रीम कोर्ट’ कहा जाता है. लेकिन यह अनुमति पब्लिक इंटरेस्ट या संवैधानिक मामलों में बेहद असाधारण परिस्थितियों में ही दी जाती है.

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डॉ. मिश्रा साफ शब्दों में कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति प्रैक्टिसिंग एडवोकेट नहीं है तो वो चाहे LLB होल्डर ही क्यों न हो, सुप्रीम कोर्ट में वकील की तरह खड़े होकर दलील नहीं रख सकता. ममता बनर्जी का मामला व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सार्वजनिक और संवैधानिक प्रकृति का है.

ममता के पास एलएलबी की डिग्री...

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में SIR मामले में खुद पेश होकर दलील देने की इच्छा जताई है. इसके लिए उन्होंने 'पार्टी इन पर्सन' के तौर पर पेश होने की अनुमति मांगी है और आवेदन दाखिल किया है. ममता बनर्जी ने कोलकाता के जोगेश चंद्र चौधरी कॉलेज ऑफ लॉ से कानून की पढ़ाई पूरी की है. हालांकि, उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक वकील के रूप में उनकी प्रैक्टिस से जुड़ी आखिरी जानकारी वर्ष 2003 की बताई जा रही है.

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