ईरान की जंग अब नए फेस में प्रवेश कर गई है. अब अमेरिका ईरान में आक्रामक नजर आ रहा है. अमेरिका-इजरायल ने ईरान के इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले तेज कर दिए हैं. ब्रिज, स्टील प्लांट, मेडिकल साइट निशाने पर ताबड़तोड़ बमबारी की गई है. ईरान को भारी नुकसान हुआ है. अमेरिका के इन हमलों के बाद से चर्चा हो रही है कि क्या अब अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन हो रहा है और जेनेवा कंवेंशन की बात की जा रही है. ऐसे में जानते हैं कि आखिर जेनेवा कंवेंशन है क्या और इसमें क्या कहा गया है और किस तरह से इस युद्ध में इसका उल्लंघन हो रहा है.
होता है जेनेवा कंवेंशन?
जेनेवा कंवेंशन की कहानी साल 1859 से शुरू होती है, उस वक्त इटली में बैटल ऑफ सॉलफेरिनो लड़ा गया, जिसमें हजारों सैनिक घायल होकर मैदान में तड़पते रह गए. कहा जाता है कि उस वक्त युद्ध में इंसानियत पूरी तरह से खत्म दिखी. इसी दौरान एक स्विस व्यापारी हेनरी डुनेंट वहां पहुंचे और वो वहां का सीन देख हैरान रह गए. उन्होंने कई लोगों का इलाज करवाया और एक किताब लिखी, जिसका नाम था- ए मेमोरी ऑफ सॉलफेरिनो. इसमें उन्होंने दुनिया के देशों से अपील की कि वो मिलकर ऐसे नियम बनाएं जो युद्ध में घायल सैनिकों और पीड़ितों की रक्षा कर सकें.
इसके बाद साल साल 1864 में स्विट्जरलैंड के जेनेवा शहर में 12 देशों ने एक साथ बैठकर पहला अंतरराष्ट्रीय समझौता किया, जिसे ही जेनेवा कंवेंशन कहा गया. इन देशों में फ्रांस, ऑस्ट्रिया, प्रशिया, इटली, स्विट्जरलैंड और अन्य यूरोपीय राष्ट्र शामिल थे. इस वक्त युद्ध में घायल सैनिकों को बिना भेदभाव के मेडिकल सुविधा देना था.
इसके बाद साल 1949 में जेनेवा कन्वेंशन को विस्तार देते हुए चार प्रमुख समझौते बनाए गए, जिनमें न केवल घायल सैनिकों बल्कि समुद्र में फंसे सैनिकों, युद्ध बंदियों और आम नागरिकों की सुरक्षा को भी शामिल किया गया. फिर इसे करीब-करीब सभी देशों ने स्वीकार किया.
पहले चार समझौते बनाए गए थे और बाद में इसमें समय-समय पर 3 प्रोटोकॉल और जोड़ दिए गए. अब ये एक तरह से युद्ध के नियम की तरह काम करते हैं. आम भाषा में कहें तो जिनेवा कंवेंशन और इसके साथ के प्रोटोकॉल आधुनिक अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का आधार बनते हैं, जो बताते हैं कि युद्ध के दौरान सैनिकों और नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए.
युद्ध में क्या क्या नहीं किया जा सकता?
जेनेवा कंवेंशन के अनुसार, युद्ध में जमीन पर घायल और बीमार सैनिकों की सुरक्षा, समुद्र में घायल/डूबते सैनिकों की सुरक्षा, युद्ध बंदियों के अधिकार और आम नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े नियम तय किए गए हैं. इसके साथ ही जो प्रोटोकॉल जोड़े गए थे, उनमें नागरिकों की सुरक्षा को मजबूत किया गया.
यानी युद्ध में महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों पर हमला नहीं किया जा सकता और स्कूल, अस्पताल, घर आदि को टारगेट नहीं किया जा सकता. साथ ही अगर कोई सीमा में घायल पड़ा है तो उसे मेडिकल सुविधा दी जानी चाहिए, चाहिए वो दुश्मन ही क्यों ना हो. शारीरिक या मानसिक यातना नहीं दी जा सकती.
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