इन दिनों ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रही जंग ने पूरी दुनिया के सामने गंभीर ऊर्जा संकट खड़ा दिया है. संघर्ष शुरू हुए 24 दिन बीत चुके हैं और इसके परिणाम स्वरूप अमेरिका सहित एशियाई और यूरोपीय देशों में तेल और गैस का संकट गहरता जा रहा है. क्योंकि, जिस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते पूरी दुनिया का करीब 25 फीसद कच्चे तेल की सप्लाई होती है, वो बंद हो गया है.
वर्तमान समय में मिडिल ईस्ट में जो जंग छिड़ी हुई है, उस पर चिंता जताते हुए एक्सपर्ट एक बार फिर से 1970 के दशक के तेल संकट वाले दिन लौटने की आशंका जता रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (International Energy Agency) के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने कहा है कि ऊर्जा संकट बहुत गंभीर होती जा रही है और वैश्विक अर्थव्यवस्था एक बड़े खतरे का सामना कर रही है. ऐसा ही चलता रहा तो जल्द ही स्थिति 1973 और उसके बाद के सालों में आए तेल संकटों से भी बदतर हो जाएंगे.
उन्होंने कहा कि तब दुनिया को प्रतिदिन लगभग 10 मिलियन बैरल तेल का नुकसान हुआ था. आज केवल तेल और गैस ही नहीं, वैश्विक अर्थव्यवस्था की कुछ महत्वपूर्ण जरूरतों जैसे पेट्रोकेमिकल, उर्वरक, सल्फर, हीलियम, इन सभी का व्यापार बाधित हो गया है. इसके वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर परिणाम होंगे.ऐसे में जानते हैं कि आखिर उन दोनों कैसे ऊर्जा संकट गहरा गया था और इसका असर कितने दिनों तक रहा था.
70 के दशक में भी जंग से ही शुरू हुआ था तेल संकट
अरब-इजरायल युद्धों में से एक योम किप्पुर युद्ध अक्टूबर 1973 की शुरुआत में शुरू हुआ था. जब मिस्र और सीरिया ने यहूदियों के पवित्र दिन योम किप्पुर के दिन इजरायल पर हमला किया था. तब सोवियत संघ ने मिस्र और सीरिया को हथियार देकर युद्ध को और भड़का दिया था. हिस्ट्री चैनल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने भी इजरायल को फिर से हथियार मुहैया कराना शुरू कर दिया था.
इसके जवाब में, अरब पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (OAPEC) के सदस्यों ने अपने पेट्रोलियम उत्पादन में कमी कर दी और इजरायल के मुख्य समर्थकों, संयुक्त राज्य अमेरिका और नीदरलैंड को तेल की आपूर्ति पर प्रतिबंध लगा दिया था. हालांकि योम किप्पुर युद्ध अक्टूबर के अंत में समाप्त हो गया, लेकिन तेल उत्पादन पर प्रतिबंध जारी रहीं, जिससे एक अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा संकट उत्पन्न हो गया था.
चार गुना बढ़ गई थी तेल की कीमत
प्रतिबंध की घोषणा के बाद के तीन महीनों में तेल की कीमत 3 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 12 डॉलर हो गई. दशकों तक भारी मात्रा में सप्लाई और बढ़ती खपत के बाद, अमेरिकियों को तब बढ़ती कीमतों और ईंधन की कमी का सामना करना पड़ा था, जिससे देश भर के पेट्रोल पंपों पर लंबी-लंबी कतारें लग गईं.
यूरोप में वाहनों, हवाई जहाज और बोटिंग हो गई थी बंद
यूरोप में प्रतिबंध समान रूप से लागू नहीं किया गया था, फिर भी तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण अमेरिका की तुलना में कहीं अधिक गंभीर ऊर्जा संकट पैदा हो गया था. ग्रेट ब्रिटेन, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे और डेनमार्क जैसे देशों ने वाहन चलाने, नौका विहार और हवाई यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिए थे. जबकि ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने अपने देशवासियों से सर्दियों के दौरान अपने घरों में केवल एक कमरे को गर्म करने का आग्रह किया था.
प्रतिबंध हटने के बाद भी दो साल तक कम नहीं हुई थी कीमत
मार्च 1974 में तेल प्रतिबंध हटा लिया गया, लेकिन तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं और ऊर्जा संकट का असर पूरे दशक तक बना रहा. मूल्य नियंत्रण और पेट्रोल की राशनिंग के अलावा, नेशनल स्पीड लीमिट लागू की गई थी. तब अमेरिका के कुछ हिस्सों में गति सीमा 80 मील प्रति घंटे तक थी.वहीं 1974-75 की अवधि के लिए पूरे वर्ष के लिए डेलाइट सेविंग टाइम अपनाया गया.
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तेल को लेकर असुरक्षा से 1979 में भी गहराया था संकट
अक्टूबर 1973 में, जब तेल उत्पादक अरब देशों ने योम किप्पुर युद्ध के दौरान इजरायल का समर्थन करने के लिए अमेरिका और कुछ अन्य देशों पर तेल प्रतिबंध लगा दिया, तो अमेरिकियों को सामूहिक रूप से गहरा सदमा लगा. मार्च 1974 में प्रतिबंध हटा लिया गया था, लेकिन पूरे दशक में ईंधन की ऊंची कीमतें और ऊर्जा असुरक्षा का भाव बना रहा, जिसका नतीजा 1979 की ईरानी क्रांति के बाद दूसरे तेल संकट के रूप में सामने आया.
उस दौर में ऐसे हो गए थे अमेरिका के हालात
ऊर्जा संकट की सबसे आम तस्वीर पेट्रोल पंपों पर घंटों लंबी कतारों में खड़े हताश वाहन चालकों की है, जो अपनी टंकी भरवाने के लिए बेताब रहते थे. 1979 के दूसरे ऊर्जा संकट के दौरान ऐसी स्थितियों से बचने के लिए, वर्जीनिया के एक निवासी ने अपने आंगन में 4,000 गैलन का पेट्रोल टैंक लगवा लिया.
सिद्धार्थ भदौरिया