ईरान ने 22 दिन की जंग में कई अमेरिकी आर्मी बेस को निशाना बनाया है. अलग अलग देशों में अमेरिकन आर्मी के बेस पर मिसाइलें दागी हैं. लेकिन, यूएस आर्मी का एक ऐसा बेस भी है, जहां अभी तक ईरान एक भी मिसाइल नहीं दाग पाया है. ऐसा नहीं है कि ईरान ने यहां हमले की कोशिश नहीं की है, बल्कि ईरान के टारगेट यहां पूरे नहीं हो पाए हैं. वो बेस है डिएगो गार्सिया. कुछ रिपोर्ट्स आई हैं कि ईरान ने हिंद महासागर में स्थित अमेरिकी-ब्रिटिश सैन्य अड्डे डिएगो गार्सिया को निशाना बनाकर दो मिसाइल दागीं, लेकिन एक भी मिसाइल अड्डे पर नहीं गिरी.
वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि एक मिसाइल बीच रास्ते में ही विफल हो गई, जबकि एक अमेरिकी युद्धपोत ने दूसरी मिसाइल पर एसएम-3 इंटरसेप्टर से हमला किया. यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि ये सफल रहा या नहीं. लेकिन, अभी तक डिएगो गार्सिया पर भी हमले की जानकारी नहीं आई है. अगर ये मिसाइल अटैक सफल हो जाता तो यह युद्ध मिडिल ईस्ट से बाहर भी फैल हो जाता. इसे ईरान का अब तक का सबसे लंबी दूरी का मिसाइल प्रयास भी माना जा रहा है.
डिएगो गार्सिया ईरान से लगभग 4,000 किलोमीटर दूर है. यह तेहरान की बैलिस्टिक मिसाइलों की आम रेंज से दोगुना है. वैसे ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने एक बार कहा था कि देश की मिसाइलें 2,000 किलोमीटर तक मार कर सकती हैं. ऐसे में ये टारगेट उनकी रेंज से दोगुना आगे का है. भले ही ये हमला अपने लक्ष्य पर सफल नहीं हुआ, लेकिन इसने दुनिया को ईरान की वास्तविक क्षमताओं पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है. साथ ही अगर ये अटैक सफल हो जाता तो ये कहा जा सकता था कि कोई भी अमेरिकी सैन्य अड्डा पूरी तरह से पहुंच से बाहर नहीं है.
भारत से कितना दूर?
अगर भारत से दूरी की बात करें तो ये हिंद महासागर में है और नक्शे के हिसाब से समझें तो ये श्रीलंका के नीचे है. भारत का दक्षिण इलाका इसके पास है और ये भारत के निचले क्षेत्र से करीब 1800-2000 किलोमीटर दूर है.
क्यों खास है ये आर्मी बेस?
डिएगो गार्सिया को अमेरिकी शक्ति प्रदर्शन के लिए एक अहम प्लेटफॉर्म माना जाता है, जहां हेवी बम बॉम्बर्स, सर्विलांस एयरक्राफ्ट और काफी अहम इंफ्रास्ट्रक्चर है. डिएगो गार्सिया हिंद महासागर में स्थित एक छोटा सा द्वीप है, जो ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी का हिस्सा है. ईरान के इस मिसाइल अटैक के प्रयास ने अमेरिका को यहां भी अपने मिसाइल डिफेंस सिस्टम लगाने को मजबूर कर दिया है.
ये चागोस द्वीप समूह में स्थित है और ये अमेरिका-ब्रिटेन का महत्वपूर्ण सैन्य अड्डा है जो अफगानिस्तान और इराक में अमेरिकी बमबारी ऑपरेशन के लिए स्टेजिंग हब के रूप में इस्तेमाल होता रहा है. इस अड्डे से अमेरिका पश्चिम एशिया, अफ्रीका और पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी ताकत दिखा सकता है. ईरान, चीन, भारत और समुद्री मार्ग सभी इसकी पहुंच में हैं. ये उन समुद्री मार्गों के करीब है, जहां से विश्व व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है.
तकनीकी रूप से यह द्वीप मॉरीशस का है, जो भारत का करीबी देश है. 1960 के दशक में ब्रिटेन और अमेरिका ने यहां के मूल निवासियों (चागोसियन) को जबरन हटा दिया था, ताकि सैन्य अड्डा बनाया जा सके. हाल के सालों में अंतरराष्ट्रीय अदालतों ने ब्रिटेन के कब्जे को गैरकानूनी बताया है. हाल ही में ब्रिटेन ने इसे मॉरीशस को सौंपने का समझौता किया था, जिसका अमेरिका ने भी विरोध किया था. अमेरिका इसे अपनी अहम जगहों में से मानता है, इराक युद्ध में भी इसका बड़ा रोल था.
aajtak.in