मुगल बादशाह औरंगजेब से हर कोई वाकिफ है. औरंगजेब ने राजगद्दी के लिए अपने भाईयों को मार डाला था. अपने पिता शाहजहां को कैदकर जेल में डाल दिया था. उसने सोमनाथ सहित कई हिंदू मंदिरों को ध्वस्त कर दिया था. उसकी महत्वाकांक्षा इतनी बड़ी थी कि उसने दक्कन यानी दक्षिण भारत में भी अपने साम्राज्य विस्तार का अभियान चलाया.
औरंगजेब को एक खूंखार और बर्बर बादशाह के रूप में जाना जाता है. इन सबके बावजूद एक हिंदू राजा ने औरंगजेब की नाम में दम कर रखा था. औरंगजेब की हमेशा से नजर राजस्थान के राजपूताना और मारवाड़ क्षेत्रों पर रही, लेकिन वह इन्हें पूरी तरह से जीत नहीं पाया.
औरंगजेब ने राजपूतों के साथ मित्रता की नीति त्याग दी थी. जब तक जोधपुर के राजा यशवन्त सिंह जीवित रहे, तब तक औरंगजेब को राजपूतों के विरुद्ध कुछ करने की हिम्मत नहीं हुई.
1678 ई० में यशवन्त सिंह की मृत्यु हो गयी. तब औरंगजेब ने यशवन्त सिंह के राज्य को हड़प लेने का फैसला किया. उसने वहां अपने आदमियों को नियुक्त किया. बाद में यशवन्त सिंह के सम्बन्धी इन्द्रसिंह राठौर को मारवाड़ का राजा बनाया गया, किन्तु इन्द्रसिंह नाममात्र का शासक था. वास्तविक अधिकार मुगल अफसरों के हाथ में था.
यह भी पढ़ें: पहले मुगल बादशाह बाबर कभी चीन में बसना चाहते थे, फिर भारत को कैसे बना लिया ठिकाना?
मारवाड़ के राजपूत औरंगजेब की इस नीति से बहुत असन्तुष्ट थे. उन्होंने औरंगजेब से यशवन्त सिंह के नवजात शिशु अजीत सिंह को यशवन्त सिंह का उत्तराधिकारी मानने का अनुरोध किया. औरंगजेब ने तब एक शर्त रखी. वह ऐसा तभी कर सकता था जब अजीत सिंह मुसलमान बन जाता और उसका पालन-पोषण शाही महल में होता.
औरंगजेब से लोहा लेने सामने आए दुर्गादास
राजपूत इससे काफी नाराज हुए और उन्होंने औरंगजेब से लोहा लेने का निश्चय किया. सौभाग्य से उन्हें दुर्गादास-जैसा योग्य नेता भी मिल गया. दुर्गादास अजीत सिंह और यशवन्त सिंह की रानियों को लेकर भाग गया. शाही फौज ने उसका पीछा किया. किन्तु दुर्गादास जोधपुर पहुंच गए.
गुस्सा होकर औरंगजेब ने जोधपुर पर आक्रमण कर दिया. जोधपुर पर मुगलों का अधिकार हो गया, किन्तु अजीत सिंह को वे नहीं पकड़ा सके. औरंगजेब की मारवाड़ नीति से मेवाड़ के सिसोदिया राजपूतों में भी काफी गुस्सा था. सस समय मेवाड़ के शासक राणा राजसिंह थे. औरंगजेब ने मेवाड़ पर चढ़ाई कर दी.
यह भी पढ़ें: कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली... क्या है इसकी कहानी, कैसे बन गई ये कहावत?
राजसिंह ने खुले मैदान में मुगलों का सामना नहीं किया. वह पहाड़ियों में छिपकर छापामार युद्ध करने लगे. इस बीच मुगलों ने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया. राजपूतों के विरुद्ध युद्ध का संचालन औरंगजेब का पुत्र अकबर कर रहा था. जब उसे सफलता नहीं मिली तो औरंगजेब ने उसे वापस बुला लिया.
औरंगजेब के बेटे ने भी कर दिया था विद्रोह
वापस बुलाए जाने से अकबर गुस्सा हो गया और उसने राजपूतों से मिलकर पिता के खिलाफ लड़ने का फैसला किया. औरंगजेब ने कूटनीति से काम लिया, किन्तु कुछ दिनों बाद अकबर ने विद्रोह कर दिया. इस विद्रोह के कारण औरंगजेब का ध्यान बंट गया.
इधर मेवाड़ के नए राजा ने औरंगजेब से संधि कर ली, लेकिन मारवाड़ लड़ता ही रहा. वहां के राजपूतों ने अपने नेता दुर्गादास के नेतृत्व में युद्ध जारी रखा और मुगलों के छक्के छुड़ा दिए. औरंगजेब अपने जीवन काल में मारवाड़ नहीं जीत सका.
औरंगजेब कभी मारवाड़ को नहीं जीत सका
सिर्फ और सिर्फ दुर्गादास की वजह से औरंगजेब कभी भी मारवाड़ को नहीं जीत पाया. न ही कभी अजीत सिंह औरंगजेब के हाथ लगा. दुर्गादास ने अंत तक औरंगजेब से लड़ाई जारी रखी और अंतत: औरंगजेब ने मारवाड़ की तरफ से अपना ध्यान हटा लिया.
यह भी पढ़ें: जब एक तरबूज के लिए छिड़ी जंग... दो सेना में हुआ युद्ध, मारे गए थे कई सैनिक!
औरंगजेब का राजदूतों के साथ युद्ध से मुगल साम्राज्य पर अत्यन्त हानिकारक प्रभाव पड़ा. इस युद्ध में हजारों सैनिक मारे गये तथा बहुत धन भी बर्बाद हुआ. लेकिन औरंगजेब को कुछ भी हासिल नहीं हुआ. औरंगजेब के बाद उसके उत्तराधिकारी बहादुरशाह प्रथम ने अजीत सिह साथ समझौता कर लिया.
aajtak.in