कई मौकों पर लोगों के मुंह से हम इस कहावत का इस्तेमाल करते सुन चुके हैं या हममें से कईयों ने खुद भी कई बार ऐसा कहा होगा - कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली. यह कहावत अक्सर दो लोगों के बीच के फर्क को बताने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
इस कहावत को सुनकर अक्सर इसके पीछे की कहानी जानने की इच्छा होती है. कई बार हमारे मन में ये सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ होगा कि लोगों के बीच ये कहावत प्रचलित हो गई. वैसे तो इस कहावत को सुनकर इसके पीछे की कहानी सिर्फ दो लोगों की लगती है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा अलग है. यह कहावत जिस घटना से प्रचलन में आई, उसमें तीन लोग थे और कोई बड़ा या छोटा नहीं था, तीनों ही राजा थे.
इस कहावत में राजा भोज का जिक्र है. इनकी कहानी सब जानते हैं. राजा भोज इतिहास में एक पराक्रमी राजा हुए. 11वीं सदी में वर्तमान मध्य प्रदेश के धार इलाके में इनका शासन था. यह परमार वंश के राजा था. 1018-19 में महमूद ग़ज़नवी के साथ भारत आए फारसी विद्वान अल-बरूनी ने भी अपने संस्मरण में राजा भोज का जिक्र किया है. कहा तो यहां तक जाता है कि राजा भोज ने ही भोपाल शहर बसाया था. तब इसका नाम भोजपाल हुआ करता था.
इन तीन राजाओं के इर्द-गिर्द घूमती है कहानी
राजा भोज का एक बार चेदिदेश के राजा गांगेयदेव कलचुरी से युद्ध शुरु हो गया. इस लड़ाई में जय सिंह तेलंग नाम के एक और राजा कूद पड़े. जय सिंह तेलंग दक्षिण के चालुक्य राजवंश के राजा थे. गोदावरी के तट पर एक तरफ राजा भोज अकेले और दूसरी तरफ गांगेयदेव कलचुरी और जय सिंह तेलंग थे. इनके बीच भीषण युद्ध हुआ. राजा भोज ने अकेले इन दोनों की सेनाओं को बुरी तरह से हरा दिया.
इसके बाद से ये घटना एक पंक्ति की कहानी में लोगों के बीच प्रचलित होने लगी. लोग कहने लगे 'कहां राजा भोज और कहां गांगेय तैलंग'. इसे आज के समय का वन लाइनर भी कह सकते हैं. फिर समय के साथ-साथ यह कहावत बन गया और इस वन लाइनर का स्वरूप चेंज होकर - 'कहां राजा भोज कहां गंगू तेली' हो गया. आज इस लोकोक्ति का मतलब दो लोगों के बीच के स्टेटस में अंतर बताने के लिए किया जाता है.
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