उत्तराखंड में धामी कैबिनेट का विस्तार आज, ये 5 दिग्गज ले सकते हैं मंत्री पद की शपथ

उत्तराखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. पिछले काफी समय से कैबिनेट विस्तार को लेकर अटकलें भी लग रही है. ऐसे में यह विस्तार अहम माना जा रहा है. तमाम समीकरणों को ध्यान में रखते हुए नए चेहरों को कैबिनेट में जगह मिल सकती है.

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धामी कैबिनेट में अभी 5 पद रिक्त चल रहे हैं. (Photo-ITG) धामी कैबिनेट में अभी 5 पद रिक्त चल रहे हैं. (Photo-ITG)

अंकित शर्मा

  • देहरादून,
  • 20 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 1:28 AM IST

उत्तराखंड में लंबे समय से चल रही अटकलों के बीच आज कैबिनेट विस्तार हो सकता है. सूत्रों के मुताबिक शुक्रवार को राज्य में कैबिनेट विस्तार होने की पूरी संभावना है, जिसमें 5 नए मंत्रियों को शपथ दिलाई जा सकती है.

राजभवन में 5 नए कैबिनेट मंत्रियों का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित जाएगा. 2022 में धामी सरकार के गठन के बाद यह पहला बड़ा फेरबदल होगा. मुख्यमंत्री धामी और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट पिछले कुछ समय से इसके स्पष्ट संकेत दे रहे थे.

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हाल ही में महेंद्र भट्ट ने स्पष्ट किया था कि संगठन ने केंद्रीय नेतृत्व से इन खाली पदों को भरने का आग्रह किया है और जल्द ही इस पर मुहर लग जाएगी. कैबिनेट विस्तार में विधायकों के पिछले प्रदर्शन और क्षेत्रीय समीकरणों को बारीकी से परखा जा रहा है. इसके साथ ही, कुछ वरिष्ठ नेताओं को 'दायित्वधारी' (राज्य मंत्री स्तर) की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है.

भारत के संविधान के अनुसार, 70 सीटों वाली उत्तराखंड विधानसभा में मुख्यमंत्री सहित अधिकतम 12 मंत्री हो सकते हैं. वर्तमान में धामी मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री सहित केवल 7 मंत्री हैं, जबकि 5 पद रिक्त चल रहे हैं. कैबिनेट मंत्री चंदन रामदास के निधन और प्रेम चंद अग्रवाल के इस्तीफे के बाद से ही इन पदों को भरने की चर्चाएं चल रही थीं.

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इन नामों की लग सकती है लॉटरी
राजनीतिक गलियारों में कैबिनेट के लिए पांच प्रमुख विधायकों के नामों की चर्चा सबसे तेज है. इनमें राजपुर से विधायक खजानदास, नैनीताल से सरिता आर्य, रुड़की से प्रदीप बत्रा, देवप्रयाग से विनोद कंडारी और रामनगर से दीवान सिंह बिष्ट के नाम रेस में सबसे आगे बताए जा रहे हैं.

 चुनावी वर्ष के करीब आते ही केंद्रीय नेतृत्व से इस विस्तार को हरी झंडी मिलना प्रदेश की राजनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी चुनावी रणनीति को ध्यान में रखते हुए यह विस्तार बेहद अहम माना जा रहा है. इससे क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन साधने के साथ-साथ पार्टी के भीतर संतुष्टि बनाए रखने की भी कोशिश होगी
 

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