तमिलनाडु की राजनीति में इस समय सबसे बड़ा नाम अभिनेता से नेता बने विजय और उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम है. विधानसभा चुनाव में 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद भले ही उन्हें बहुमत से 10 सीटों की कमी रह गई, लेकिन इस नतीजे ने अनिश्चितता नहीं बल्कि सियासी हलचल पैदा कर दी है. कांग्रेस से लेकर AIADMK और कई क्षेत्रीय दल, जो पहले विजय के विरोधी थे, अब उनके समर्थन में आने के लिए तेजी से प्रयास कर रहे हैं. सवाल यह नहीं रह गया है कि विजय किसके साथ सरकार बनाएंगे, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि इतने सारे दल अचानक उनके साथ खड़े होने को क्यों तैयार हैं.
चुनाव परिणाम 4 मई को सामने आए थे. इसके बाद से ही तमिलनाडु की राजनीति में पर्दे के पीछे बैठकों और बातचीत का दौर शुरू हो गया. टीवीके के सबसे बड़ी पार्टी बनने के साथ ही विजय राज्य की राजनीति के केंद्र में आ गए. इसके बाद हर पार्टी अपने विकल्पों पर विचार करने लगी और यह देखने लगी कि उनके लिए सबसे सुरक्षित रास्ता क्या है. सबसे पहले पहल विजय के पिता एसए चंद्रशेखर की ओर से हुई. उन्होंने कांग्रेस को TVK के साथ गठबंधन का न्योता दिया. उनका कहना था कि यह कांग्रेस के लिए तमिलनाडु में अपनी खोई हुई राजनीतिक पहचान वापस पाने का मौका हो सकता है.
108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी TVK
हालांकि कांग्रेस ने शुरुआत में इस पर तुरंत कोई फैसला नहीं लिया. पार्टी के भीतर यह चर्चा चल रही थी कि एक नई पार्टी के साथ जाना कितना सही होगा और क्या उन्हें अपने पुराने सहयोगी डीएमके को छोड़ना चाहिए. इसके बाद दिल्ली में कांग्रेस के बड़े नेताओं की बैठक हुई. इसमें पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और केसी वेणुगोपाल जैसे नेता शामिल हुए. इस बैठक के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने तमिलनाडु के अपने विधायकों को स्थिति का आकलन करने और अंतिम फैसला लेने की अनुमति दे दी.
कांग्रेस ने समर्थन के बदले कुछ शर्तें भी रखीं. साथ ही यह भी संकेत दिया कि वह अपने सहयोगी दलों जैसे VCK, DMDK, CPI, CPI(M) और IUML को भी साथ ला सकती है. अगर ये सभी दल TVK के साथ आते हैं, तो बहुमत का आंकड़ा आसानी से पार किया जा सकता है. इसी बीच AIADMK ने भी संकेत दिए कि वह विजय के साथ जाने को तैयार है. इससे सियासी समीकरण और जटिल हो गए. पार्टी की वरिष्ठ नेता लीमा रोज मार्टिन ने सार्वजनिक रूप से कहा कि AIADMK और TVK के बीच बातचीत चल रही है.
गठबंधन के जरिए बहुमत का आंकड़ा पार करने की कोशिश
बताया जा रहा है कि उनके दामाद आधारव अर्जुन विजय के करीबी माने जाते हैं और बातचीत में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. इस कारण दोनों पक्षों के बीच संवाद और भी तेज हो गया है. इन घटनाओं के बीच विजय के घर पनैयूर में लगातार बैठकें हो रही हैं. इनमें उनके करीबी सहयोगी और कई वरिष्ठ नेता शामिल हो रहे हैं. इन बैठकों में आगे की रणनीति और संभावित गठबंधन पर चर्चा की जा रही है.
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सभी दल विजय के समर्थन में क्यों आना चाहते हैं. इसका जवाब विचारधारा में नहीं बल्कि राजनीतिक अस्तित्व के डर में छिपा है. अगर इस समय सरकार नहीं बनती है और राज्य में दोबारा चुनाव होते हैं, तो संभावना है कि विजय की पार्टी और ज्यादा मजबूत होकर लौटेगी. ऐसी स्थिति में बाकी दलों के लिए राजनीतिक जगह बहुत कम बच जाएगी. कांग्रेस के लिए यह मौका ऐतिहासिक भी है. पार्टी ने तमिलनाडु में आखिरी बार 1967 में सत्ता संभाली थी. इसके बाद से राज्य की राजनीति DMK और AIADMK के बीच ही सीमित रही है. कांग्रेस ज्यादातर समय DMK की सहयोगी बनकर ही चुनाव लड़ती रही है. ऐसे में विजय के साथ जाना कांग्रेस के लिए अपनी अलग पहचान बनाने और एक नई शुरुआत करने का अवसर माना जा रहा है.
दोबारा चुनाव का डर, दलों में अस्तित्व का संकट
AIADMK की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है. साल 2021 में सत्ता खोने के बाद पार्टी 2026 के चुनाव में तीसरे स्थान पर रही है. अगर वह इस बार भी सत्ता से बाहर रहती है, तो उसे 2031 तक इंतजार करना पड़ सकता है. इस लंबे अंतराल से पार्टी संगठन कमजोर हो सकता है और उसका जनाधार भी घट सकता है. यही कारण है कि AIADMK भी किसी तरह सत्ता में हिस्सेदारी चाहती है. बीजेपी की रणनीति भी इस पूरे घटनाक्रम में अहम मानी जा रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक पार्टी नहीं चाहती कि कांग्रेस और वाम दलों के समर्थन से TVK की सरकार बने. इसलिए वह AIADMK को विजय के साथ जाने के लिए प्रेरित कर सकती है.
AIADMK के अंदर भी अस्थिरता की स्थिति बनी हुई है. अगर पार्टी नेतृत्व कोई फैसला नहीं लेता है, तो उसके कुछ विधायक अलग होकर खुद ही TVK को समर्थन दे सकते हैं. इससे पार्टी में टूट की स्थिति भी बन सकती है. क्षेत्रीय दलों की स्थिति भी अलग नहीं है. PMK, AMMK और VCK जैसे दल लंबे समय से खुद को विकल्प के रूप में पेश करते रहे हैं, लेकिन चुनावी मजबूरियों के कारण उन्हें बड़े दलों के साथ गठबंधन करना पड़ता है.
इन सभी दलों को डर है कि अगर अभी उन्होंने सही फैसला नहीं लिया, तो आने वाले समय में उनकी राजनीतिक भूमिका खत्म हो सकती है. तमिलनाडु में जो स्थिति बन रही है, उसे दिल्ली की राजनीति से भी जोड़ा जा रहा है. 2013 में दिल्ली में जब किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था, तब आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई थी. अरविंद केजरीवाल की सरकार केवल 49 दिन चली, लेकिन उसके बाद हुए चुनाव में आम आदमी पार्टी भारी बहुमत के साथ लौटी और लंबे समय तक सत्ता में रही.
दिल्ली जैसी स्थिति से बचना चाहते हैं तमिलनाडु के दल
तमिलनाडु के दल इसी तरह की स्थिति से बचना चाहते हैं. उन्हें डर है कि अगर विजय को सरकार बनाने का मौका नहीं मिला और दोबारा चुनाव हुए, तो TVK बहुत बड़ी जीत हासिल कर सकती है. यही कारण है कि इस समय सभी दल जल्द से जल्द फैसला लेना चाहते हैं और किसी भी कीमत पर सत्ता से बाहर नहीं रहना चाहते. वर्तमान हालात में विजय का उदय तमिलनाडु की राजनीति में एक नए शक्ति केंद्र के रूप में सामने आया है. यह ऐसा केंद्र है जिसे नजरअंदाज करना अब किसी भी पार्टी के लिए संभव नहीं है. इसलिए विजय का समर्थन करना अब सिर्फ एक राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि कई दलों के लिए मजबूरी बन चुका है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि कौन सा दल किसके साथ जाता है और तमिलनाडु में अगली सरकार किस रूप में बनती है.
अविनाश कटील