उलटकर देखिए, बंगाल में सब बदल गए... बुद्धिजीवी से लेकर सोशल मीडिया तक परिवर्तन की बयार 

पश्चिम बंगाल में 4 मई को बड़ा राजनीतिक बदलाव हुआ जब 15 साल बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सत्ता से बाहर हुई और बीजेपी सत्ता में आई. इस बदलाव के साथ ही फिल्म इंडस्ट्री, मीडिया, बुद्धिजीवी और राजनीतिक वर्ग में भी परिवर्तन की लहर देखी गई.

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पश्चिम बंगाल में सिर्फ सत्ता के ही नही बल्कि हर स्तर पर बदलाव दिख रहा है पश्चिम बंगाल में सिर्फ सत्ता के ही नही बल्कि हर स्तर पर बदलाव दिख रहा है

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 06 मई 2026,
  • अपडेटेड 5:58 PM IST

पश्चिम बंगाल की सत्ता में 4 मई को बड़ा बदलाव हुआ. 15 साल के बाद टीएमसी कि विदाई हुई और पहली बार भगवा लहर पर सवार बीजेपी सत्ता में आई. बीजेपी 'पाल्टानो दरकार '(परिवर्तन की जरूरत) के साथ सत्ता में आई. अभी शपथ ग्रहण नहीं हुआ है, नए सीएम के नाम का ऐलान भी नहीं लेकिन महज कुछ घंटे में ही बंगाल की फिजा में बदलाव हो चुका है. जमीनी माहौल से लेकर इंटरनेट तक, बुद्धिजीवी से लेकर मीडिया के अप्रोच तक, व्यापारी से लेकर पुलिस और सरकारी प्रशासन तक समाज के कई तबकों ने खुद में ऐसा परिवर्तन कर लिया है जैसे उन्हें अब पहचानना ही मुश्किल हो रहा है.

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फिल्म इंडस्ट्री से लेकर मीडिया तक बदलाव की बयार

बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री और यहां मीडिया में राजनीति का प्रभाव और दबदबे की बात कोई नई नहीं है. एक तरफ जहां टॉलीवुड में शूटिंग से लेकर टॉलीगंज में शूट मैनेज करने तक... सबकुछ राजनीतिक प्रभाव के दायरे में होते रहा है तो दूसरी तरफ मीडिया के कई धड़े पर भी पक्षधर होने के आरोप लगते रहे हैं.

बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री हावी बैन कल्चर

कई फिल्मी हस्तियों ने खुलेआम पोस्ट करना शुरू कर दिया है. बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री में तो बैन कल्चर पहले से ही हावी है. एक राजनीतिक विचार धारा के लोगों को दूसरे राजनीतिक विचारधारा के लोगों के खेमे में काम नहीं मिलता. अब बारी दूसरे ग्रुप की है. ऐसी ही उम्मीद के साथ इस बैन कल्चर के शिकार कई फिल्मी हस्तियां पोस्ट कर रहे हैं. तो प्रोसेनजीत चटर्जी जैसे स्टार ये भी कह रहे हैं कि वो किसी भी राजनीतिक रंग से दूर हैं.

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हाल ही में अभिनेता परमब्रत चट्टोपाध्याय तृणमूल कांग्रेस के काफी करीब आए थे. करीब एक महीने पहले, उम्मीदवारों की घोषणा के दिन ही उन्होंने पार्टी जॉइन की थी. लेकिन अब, जब तृणमूल सत्ता से बाहर हो चुकी है, तो उनके सुर भी नरम पड़ते दिख रहे हैं. एक बंगाली मीडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद किसी भी सरकार के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी बनना स्वाभाविक है. उन्होंने यह भी माना कि जहां सरकार के कई अच्छे काम रहे, वहीं कुछ नेताओं की दबंगई और भ्रष्टाचार ने उसकी छवि को नुकसान पहुंचाया.

दूसरी तरफ अभिनेता सौरव दास का रुख भी बदलता नजर आ रहा है. उन्होंने सोशल मीडिया पर एक लंबा पोस्ट लिखकर अपने साथ हुए बहिष्कार, काम से हटाए जाने और मानसिक दबाव की बात कही. उन्होंने बताया कि किस तरह उन्हें अपने करियर और परिवार को लेकर चिंता का सामना करना पड़ा.

वहीं, उत्तरपाड़ा के पूर्व विधायक कंचन मलिक के सुर भी बदले हुए हैं. उन्होंने पार्टी के अंदर लिए गए फैसलों और पुराने नेताओं को हटाने पर सवाल उठाए हैं. यहां तक कि उन्होंने अतीत में अपने साथ हुए अपमान का भी जिक्र किया। उनकी पत्नी श्रीमयी ने साफ कहा कि कंचन अब राजनीति से दूरी बनाकर सिर्फ अभिनय पर ध्यान देंगे, हालांकि उन्हें बीजेपी से ऑफर मिला था. गायक शिलाजीत ने भी सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया, जिसमें वे भगवा रंग के कपड़ों में नजर आए.

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बुद्धिजीवी भी बदलाव की राह पर

बंगाल में सिविल सोसाइटी ने 2011 के बदलाव में बड़ा योगदान दिया था. बाद में भी कई लेखक, कवि और कलाकार तृणमूल के साथ जुड़े थे. इन्हीं में से एक नाम कबीर सुमन का है. उन्होंने साफ कहा कि वे तृणमूल के सदस्य नहीं हैं और न ही खुद को उसका समर्थक मानते हैं. उनके मुताबिक, उन्होंने पहले भी किसी राजनीतिक दल की सदस्यता नहीं ली थी। इस रिपोर्ट के दौरान कई अन्य प्रमुख नामों से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी।

मीडिया और मीडिया के लोग भी इससे अछूते नहीं है. वैसे ही इस बार विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियों को मिलाकर करीब 5 वर्तमान या पूर्व पत्रकारों ने अपनी किस्मत आजमाई. कुछ को चुनाव में सफलता भी मिली. खुलकर सरकार की बैटिंग करने वाले कई मीडियाकर्मी अब रातोंरात पलट गए हैं. 15 साल तक सत्ताधारी पक्ष से सवाल न करने वाले पत्रकार अपने शो, अपनी लेखनी लेखनी में अब सवाल पूछते दिख रहे हैं. कई लोगों ने अपने शो की थीम बदल ली है, सवाल के अंदाज बदल लिए हैं. कपड़े, रंग और यहां तक की गेस्ट पैनल भी बदलते हुए दिख रहे हैं. इस किसी वैचारिक परिवर्तन से कम कुछ भी नहीं कहा जा सकता.

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इसी तरह, कोलकाता और बंगाल के मीडिया वर्ग में भी कई धड़े हो गए हैं. जिन पत्रकारों पर सत्ता से करीब रहकर फायदा पाने का आरोप लग रहे हैं अब कुछ पत्रकार उनके खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं. कुछ जर्नलिस्ट ने सरकार गठन से पहले ही जांच की मांग कर दी है. नई सरकार से अपील कि जा रही है कि कोलकाता में सभी पत्रकारों और उनके करीबी रिश्तेदारों की आय, खर्च, संपत्ति और यात्राओं की पूरी जांच की जाए.

इसमें कुछ फर्जीवाड़े के भी आरोप लग रहे हैं. नतीजों के बाद कई हिंसा के वीडियो आए. बीजेपी पर आरोप लगे, बीजेपी कार्यकर्ताओं पर टीएमसी ने हमले का आरोप लगाया. अब दिलीप घोष जैसे बीजेपी नेताओं ने पोस्ट कर बताया है कि टीएमसी के कई लोग अब बीजेपी का झंडा लेकर हिंसा कर रहे हैं. चेहरे एक हैं, पर उन्होंने झंडा बदल लिया है. कई लोग खुद को बीजेपी से जुड़ा साबित कर रहे हैं, इसकी एक तरह से होड़ सी लग गई है, जिसके कारण बीजेपी के कुछ नेताओं ने पोस्ट करते हुए कहा कि जो दावा कर रहे हैं सभी बीजेपी से नहीं जुड़े हैं. 4 मई के बाद बीजेपी में योगदान (शामिल होने की प्रक्रिया) फिलहाल बंद है.

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बांग्ला में एक कहावत है—‘उलटकर देखिए, सब बदल गया है.’ एक मशहूर बांग्ला मैगज़ीन का टैगलाइन भी यही था. पश्चिम बंगाल में फिलहाल यही कहावत ट्रेंड में है. कौन-कौन पलटी मार गया? इसकी गिनती हो रही है. किसी का सुर नरम पड़ा है, तो कोई अब भी विरोध के तेवर में है. कुल मिलाकर नारा एक ही है-चलो पलटें.

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