मुस्लिम कोर वोटर खिसके, घट गई सीटें... बंगाल की लड़ाई में कैसे हारी TMC

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटों के बिखराव और त्रिकोणीय मुकाबले ने तृणमूल कांग्रेस की स्थिति पर गहरा असर डाला है. मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत की, जबकि कांग्रेस और अन्य दलों ने भी मुस्लिम वोटों में सेंध लगाई.

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टीएमसी की 75 में से घटकर 50 सीटें रह गई हैं टीएमसी की 75 में से घटकर 50 सीटें रह गई हैं

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 05 मई 2026,
  • अपडेटेड 4:59 PM IST

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार सियासी समीकरणों ने बड़ा उलटफेर दिखाया है.मुस्लिम वोटों को साधने के लिए तृणमूल कांग्रेस ने जो रणनीति अपनाई, वह पूरी तरह सफल नहीं हो सकी. दुर्गा पंडालों से लेकर जनसभाओं तक मक्का-मदीना वाले गीतों के जरिए अल्पसंख्यक मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की गई, लेकिन इसका भी फायदा नहीं मिला.

दरअसल, टीएमसी को एक तरफ जहां कई इलाकों में हिंदू मतों के ध्रुवीकरण का झटका लगा, वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम वोटों के बिखराव ने भी उसके प्रदर्शन को प्रभावित किया. राज्य में करीब 28 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं, जो लंबे समय से करीब 85 सीटों पर जीत-हार का फैसला करते रहे हैं. पिछले चुनाव में टीएमसी ने इनमें से 75 सीटों पर जीत दर्ज कर मजबूत पकड़ बनाई थी, लेकिन इस बार तस्वीर बदल गई.

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इस चुनाव में 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली 83 सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिला. इसका सबसे ज्यादा नुकसान टीएमसी को उठाना पड़ा, जिसे इन इलाकों में अपनी 25 सीटें गंवानी पड़ीं. वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने इन क्षेत्रों में 18 सीटें जीतकर अपनी स्थिति मजबूत की.

तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती मुस्लिम वोटों का बंटवारा रहा. मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय हो गया. कहीं वाम दलों ने चुनौती दी, तो कहीं स्थानीय नेता हुमायूं कबीर, एआईएसएफ और निर्दलीय उम्मीदवारों ने समीकरण बिगाड़ दिए. नतीजतन, वोटों का विभाजन हुआ और तृणमूल कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा.

कांग्रेस और अन्य दलों ने भी मुस्लिम बहुल सीटों पर अच्छा प्रदर्शन किया. फरक्का, रानीनगर, नौदा और रेजीनगर जैसी सीटों पर कांग्रेस को सफलता मिली, जबकि एआईएसएफ ने भांगड़ सीट जीती. इन दलों ने करीब 20 सीटों पर मुस्लिम वोटों में सेंध लगाई, जिससे तृणमूल की स्थिति कमजोर हुई. एक और अहम पहलू असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM का प्रदर्शन रहा. बिहार चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद उम्मीद थी कि ओवैसी बंगाल में भी प्रभाव छोड़ेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. पार्टी ने करीब 12 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन एक भी सीट जीतने में सफल नहीं रही.

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ओवैसी की पार्टी को कुल मिलाकर सिर्फ 0.09 फीसदी वोट यानी लगभग 54 हजार वोट ही मिले. यह प्रदर्शन उम्मीदों से काफी कम रहा. न तो मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण हो पाया और न ही पार्टी खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित कर सकी.

तृणमूल ने चुनाव के दौरान AIMIM पर भाजपा की ‘बी-टीम’ होने का आरोप भी लगाया था. उसका कहना था कि ओवैसी की पार्टी मुस्लिम वोटों को बांटकर अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को फायदा पहुंचा रही है. हालांकि, नतीजों से साफ है कि वोटों का बिखराव कई स्तरों पर हुआ और इसका सीधा असर तृणमूल के प्रदर्शन पर पड़ा.

कुल मिलाकर, इस चुनाव ने यह साफ कर दिया कि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट बैंक अब पहले की तरह एकजुट नहीं रहा. त्रिकोणीय मुकाबले और क्षेत्रीय खिलाड़ियों की एंट्री ने पारंपरिक समीकरणों को तोड़ दिया है.

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