राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपनी स्थापना के 100 साल पूरे कर लिए हैं. संघ के शताब्दी वर्ष पर सरसंघचालक मोहन भागवत ने मुंबई में रविवार को आयोजित कार्यक्रम के दौरान कहा कि आरएसएस में समुदाय आधारित प्रतिनिधित्व नहीं है और स्वयंसेवक अपने काम के आधार पर प्रमोशन पाते हैं. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस का प्रमुख बनने के लिए हिंदू होना चाहिए, चाहे उसकी जाति कोई भी हो.
मोहन भागवत का साफ कहना है कि आरएसएस से जुड़ा हुआ व्यक्ति सर्वोच्च पद तक पहुंच सकता है, उसके लिए जाति कोई बाधा नहीं बनेगी. संघ प्रमुख बनने के लिए अनुसूचित जाति या जनजाति होना कोई बाधा नहीं है और ब्राह्मण होना कोई योग्यता नहीं है. संघ प्रमुख ने कहा कि अगर मुझे किसी प्रमुख का चयन करना होता, तो मैं सबसे योग्य उम्मीदवार के मानदंड को ही अपनाता हूं.
आरएसएस दुनिया का सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन है और केशव बलिराम हेडगेवार ने साल 1925 में आरएसएस की स्थापना की थी. संघ में एक सामान्य बालक का प्रवेश और संगठन में सर्वोच्च पद तक की यात्रा किसी कॉर्पोरेट सीढ़ी या राजनीतिक चुनाव के जैसा नहीं होता. यह पूरी तरह से तपस्या, वैचारिक स्पष्टता और सांगठनिक कौशल का सफर है. संघ का सदस्य बनने से लेकर सर्वोच्च पद सरकार्यवाह और सरसंघचालक तक का सफर कैसे तय किया जा सकता है, क्या कोई आम व्यक्ति संघ प्रमुख बन सकता है?
आरएसएस में कैसे मिलती है एंट्री
आरएसएस के साथ जुड़ने के लिए किसी तरह की औपचारिक सदस्यता का कोई नियम नहीं है. संघ की साखाओं में जो लोग भाग लेते हैं, उन्हें ही स्वयंसेवक कहा जाता है. संघ के मुताबिक कोई भी हिंदू पुरुष स्वयंसेवक बन सकता है. आरएसएस से जुड़ने के लिए कोई भी व्यक्ति संघ की निकटतम 'शाखा' से संपर्क कर सकता है और स्वयंसेवक बन सकता है.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य बनने के लिए कोई शुल्क, पंजीकरण फॉर्म या औपचारिक आवेदन नहीं देना होता है. संघ का कहना है कि जो भी व्यक्ति सुबह या शाम दैनिक शाखा में भाग लेना शुरू करता है, वो संघ का स्वयंसेवक बन जाता है. संघ ये भी कहता रहा है कि अगर किसी को उनके आस-पास चल रही शाखा या स्वयंसेवक के बारे में जानकारी नहीं है, तो वो उसकी वेबसाइट पर एक फॉर्म भर सकता है, जिसके बाद संघ में शामिल होने की निकटतम शाखा या स्वयंसेवक के बारे में जानकारी उपलब्ध करवाई जाती है.
संघ की शाखा पहली पाठशाला है?
आरएसएस की शाखा संघ की आधारभूत संगठनात्मक इकाई है, जो उसे जमीनी स्तर पर एक बड़ी मौजूदगी देती है. शाखा वो जगह है, जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों को वैचारिक और शारीरिक रूप से प्रशिक्षित किया जाता है. शाखाएं हर दिन सुबह और कभी-कभी शाम को चलाई जाती हैं. संघ के आयोजित ट्रेनिंग कैंप (शाखा) में 4 कठोर लेवल को पार करने के बाद एक आरएसएस कार्यकर्ता तैयार होता है
संघ की लगने वाली शाखा में शारीरिक व्यायाम और खेलों के साथ-साथ टीमवर्क, नेतृत्व कौशल 'मार्चिंग' और 'आत्मरक्षा' की तकनीक भी सिखाई जाती है. शाखा में ही संघ के सदस्यों को वैचारिक शिक्षा दी जाती है. शाखा में ही उन्हें हिंदुत्व,हिंदू राष्ट्रवाद और आरएसएस के मूल सिद्धांतों के बारे में शिक्षा देने का काम किया जाता है.
शाखा को आरएसएस की प्राथमिक पाठशाला माना जाता है, जो गांव और मोहल्ले से शुरू होती है. इसी के जरिए कोई संघ के साथ जुड़ सकता है. मुंबई के मोहिते के बाड़े नामक जगह पर डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने आरएसएस की नींव रखी थी. ये RSS की पहली शाखा थी जो संघ के पांच स्वयंसेवकों के साथ शुरू हुई थी और भारत में फिलहाल 83 हजार से ज्यादा शाखाएं चल रही है.
स्वयंसेवक बनने के 4 कठोर लेवल
संघ की शाखा में सदस्य के रूप में जुड़ने के बाद 'गट प्रमुख' या 'शिक्षक'के रूप में पहली जिम्मेदारी मिलती है. इस ट्रेनिंग कैंप को संघ शिक्षा वर्ग के नाम से जाना जाता है. संघ शिक्षा वर्ग का मकसद आरएसएस कैडर की एक बटैलियन खड़ा करना था, जो संगठन की सोच को समाज तक प्रभावी तरीके से पहुंचा सके. विचारधारा की मूल बातें और संगठन के काम को लेकर सात दिन की ट्रेनिंग दी जाती है. इसके बाद उन्हें उस इलाके में संघ की गतिविधियों से जुड़ी छोटी जिम्मेदारियां दी जाती हैं.
स्वंयसेवक को ओटीसी का प्रशिक्षण देने के काम किया जाता है. इसमें स्वयंसेवक को शारीरिक और बौद्धिक रूप से तैयार करने के लिए प्रशिक्षण शिविर होते हैं. इसके प्रथम, द्वितीय और तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण प्रांत और राष्ट्रीय स्तर (नागपुर) पर होते हैं. आरएसएस में प्राथमिक वर्ग का प्रशिक्षण स्थानीय स्तर पर लगने वाली शाखाओं में दिया जाता है. इसके बाद प्रतिबद्ध सदस्यों को दूसरे लेवल की ट्रेनिंग के लिए भेजा जाता है, जिसको प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग कहा जाता है. यह ट्रेनिंग देश भर में फैले संघ के सभी 43 प्रांतों में 21 दिनों के आवासीय कैंप में होता है.
क्षेत्र स्तर पर द्वितीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग होता है. इसमें 21 दिनों का एक आवासीय कैंप होता है, जिसमें दो राज्यों के कैडर भाग लेते हैं. इन सदस्यों को ट्रेनिंग के बाद दो या तीन साल के लिए तालुका स्तर पर आरएसएस के कार्यों की जिम्मेदारी दी जाती है, जिसके बाद तृतीय शिक्षा वर्ग के लिए उनकी योग्यता का आकलन किया जाता है.
तृतीय शिक्षा वर्ग सबसे महत्वपूर्ण होता है जिसमें देश भर से सफल स्वयंसेवकों को नागपुर में एक 25 दिन के आवासीय ट्रेनिंग कैंप में बुलाया जाता है. इस कैंप में उन्हें संघ की विचारधारा के साथ फिजिकल ट्रेनिंग भी दी जाती है. इस ट्रेनिंग कैंप को हमेशा नागपुर के आरएसएस मुख्यालय में ही आयोजित किया जाता है. ऐसे में जो स्वंयसेवक तृतीय वर्ष पूर्ण करता है, वो संघ में बड़ी जिम्मेदारियों के लिए अनिवार्य माना जाता है.
प्रचारक बनने के लिए क्या करना होता है
संघ प्रमुख बनने की दिशा में सबसे बड़ा मोड़ तब आता है जब कोई स्वयंसेवक 'प्रचारक' बनने का निर्णय लेता है. संघ में दो तरह के कार्यकर्ता होते हैं. गृहस्थ कार्यकर्ता और फुल टाइम कार्यकर्ता. संघ में गृहस्थ कार्यकर्ता शादी-शुदा या परिवार वाले होते हैं और अपनी जीविका खुद चलाते हैं. उन्हें अपने खाली समय को संघ के कार्यों के लिए समर्पित करना होता है.
वहीं, आरएसएस फुल-टाइम कार्यकर्ताओं को शादी की इजाजत नहीं होती और वे अपनी पूरी जिंदगी संघ को समर्पित करते हैं. ऐसे सदस्यों को प्रचारक भी कहा जाता है. घर और परिवार पूरी तरह से छोड़कर एक प्रचारक पूर्णकालिक रूप से संघ को समय देता है. वह अविवाहित रहता है और उसका कोई निजी बैंक खाता या संपत्ति नहीं होती.
आरएसएस के एक प्रचारक को पहले तहसील स्तर पर काम करना होता है, फिर जिला स्तर पर. ऐसे ही विभाग, प्रांत और अंततः 'क्षेत्र प्रचारक' बनता है. यह यात्रा लगभग 20-30 वर्षों के कठिन परिश्रम की होती है. प्रचारक ही संघ में मुख्य रोल प्ले करते हैं और संगठन के कर्णधार होते हैं.
प्रचारक से सरकार्यवाह बनने का सफर
संघ में जब एक प्रचारक तहसील से प्रांत तक अगर अपनी सांगठनिक क्षमता सिद्ध कर देता है, तो उसे फिर 'केंद्रीय टोली' में शामिल किया जाता है. इसे अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा कहा जाता है, संघ में इनका रोल काफी अहम होता है. प्रतिनिधि सभा के द्वारा सरकार्यवाह का चुनाव होता है, लेकिन उसके काम में मदद करने के लिए सह-सरकार्यवाह की नियुक्ति भी की जाती है.
संघ में सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था को अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा कहा जाता है. आरएसएस ने अपने कामकाज को बेहतर तरीके से करने के लिए भारत को 11 क्षेत्रों में विभाजित कर रखा है, जो कई प्रांत कवर करते हैं. प्रांत इकाई राज्य स्तर पर होती है, उसे प्रांतीय प्रचारक कहा जाता था, जिसे बदलकर राज्य प्रचारक करने की तैयारी है.
संघ की सालाना बैठकें देशभर में कई स्थानों पर रखी जाती हैं, लेकिन सरकार्यवाह के चुनाव की प्रक्रिया तीन साल में एक बार नागपुर में ही होती है, जिसमें सभी अखिल भारतीय प्रतिनिधि शामिल होते हैं. आरएसएस के दैनिक कार्यों का वास्तविक प्रमुख 'सरकार्यवाह' होता है. प्रचारक अलग-अलग जिम्मेदारी को निभाने के बाद राष्ट्रीय टीम में पहले सह-सरकार्यवाह के रूप में नियुक्त किए जाते हैं, मौजूदा समय में 6 सह-सरकार्यवाह हैं.
क्या है सरकार्यवाह चुनने की प्रक्रिया?
संघ के प्रतिनिधियों की तीन साल में एक बार तीन दिवसीय बैठक होती है, जिसके दूसरे दिन सरकार्यवाह का चुनाव किया जाता है. आमतौर पर पदासीन सरकार्यवाह ही प्रतिनिधियों को अपने कार्यकाल में किए गए कामों के संबंध में जानकारी देते हैं और ऐलान करते हैं कि उनका कार्यकाल खत्म हो चुका है,इसलिए नए सरकार्यवाह का चुनाव किया जाए. इसके बाद संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं में से किसी एक की चुनाव अधिकारी के तौर पर नियुक्ति होती है.
एक वरिष्ठ संघ कार्यकर्ता नए सरकार्यवाह के नाम का प्रस्ताव देता है. इस नाम को स्वीकार किए जाने के बाद ही सरकार्यवाह के नाम का ऐलान किया जाता है. चुनाव के बाद सरकार्यवाह को अपनी टीम का भी ऐलान करना होता है, जिसे संघ में सह-सरकार्यवाह के रूप में नियुक्त किया जाता है. इस स्तर तक पहुंचते-पहुंचते व्यक्ति को देश की सामाजिक, राजनैतिक और भौगोलिक स्थिति का गहरा अनुभव हो जाता है.
संघ में महत्वपूर्ण पद सरकार्यवाह का है, जो संघ का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है और जिसके पास संघ के रोज़ाना के मामलों पर फैसला लेने की शक्तियां होती हैं. सह-सरकार्यवाह की भूमिका संयुक्त सचिव की होती है और एक समय पर संघ में कई सह-सरकार्यवाह हो सकते हैं.
सरसंघचालक (संघ प्रमुख) कैसे बनते हैं?
आरएसएस में सर्वोच्च पद सरसंघचालक का पद होता है, जो 'लोकतांत्रिक चुनाव' से नहीं बल्कि 'गुरु-शिष्य परंपरा' और 'मनोनयन' से भरा जाता है. सरसंघचालक को संघ का दार्शनिक प्रमुख माना जाता है. सरसंघचालक अपने जीवनकाल में या पद छोड़ते समय अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करते हैं.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सर्वोच्च पद सरसंघचालक का है. संघ में अब तक छह सरसंघचालक हुए हैं. संघ में सरसंघचालक चुनने के लिए कोई प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती. डॉ. हेडगेवार के बाद जितने भी सरसंघचालक बने हैं, उन्हें उनसे पहले वाले सरसंघचालक ने ही नियुक्त किया. सरसंघचालक का कार्यकाल आजीवन होता है और वह अपना उत्तराधिकारी चुनता है. इस बात को लेकर मोहन भागवत ने कहा था कि ऐसा इसलिए है, क्योंकि डॉ. हेडगेवार और गोलवलकर जैसे महानुभावों से सुशोभित रहा यह पद हमारे लिए श्रद्धा का विषय है.
डॉ केशव बलिराम हेडगेवार संघ के पहले सरसंघचालक थे, जो 1925 से 1940 तक पद पर रहे. उसके बाद माधव सदाशिवराव गोलवलकर संघ के दूसरे सरसंघचालक बने, जो 1940 से 1973 तक पद पर रहे. बालासाहब देवरस संघ के तीसरे सरसंघचालक बने, जो 1973 से 1994 तक पद पर रहे.
राजेंद्र सिंह रज्जू भैया संघ के चौथे सरसंघचालक बने, जो 1994 से 2000 तक पद पर रहे. केएस सुदर्शन संघ के पांचवें सरसंघचालक बने, जो 2000 से 2009 तक पद पर रहे. डा. मोहन भागवत संघ के छठे सरसंघचालक हैं, जो 2009 में से अभी तक पद पर हैं.
कुबूल अहमद