2026 के विधानसभा चुनावों में कैसे टूट गया वामपंथ का किला?

कभी कई राज्यों में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति रहे वामपंथी दल अब पूरे भारत में हाशिए पर सिमटते नजर आ रहे हैं.

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2026 के चुनावों ने वामपंथियों को तोड़ा 2026 के चुनावों ने वामपंथियों को तोड़ा

पल्लवी पाठक

  • नई दिल्ली,
  • 05 मई 2026,
  • अपडेटेड 2:24 AM IST

जैसे-जैसे वोटों की गिनती आगे बढ़ रही है, कई राज्यों से एक ही ट्रेंड उभरकर सामने आ रहा है. वामपंथी दल लगातार कमजोर पड़ते जा रहे हैं. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधी टक्कर की पहले से ही उम्मीद थी. तमिलनाडु, असम और पुडुचेरी में वामपंथी दल सीमित इलाकों तक सिमट गए हैं. लेकिन 2026 की सबसे बड़ी कहानी केरल से सामने आई है, जहां वामपंथियों का आखिरी मजबूत गढ़ भी खिसकता दिख रहा है.

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पश्चिम बंगाल: हाशिये पर सिमटता वामपंथ

पश्चिम बंगाल में 2026 के चुनावों में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) और अन्य वामपंथी दल केवल दो सीटों पर सिमटे नजर आ रहे हैं, जिनका वोट शेयर करीब 4.4 प्रतिशत है. अब मुकाबला पूरी तरह भाजपा और टीएमसी के बीच सिमट गया है. भाजपा 192 सीटों पर आगे चल रही है, जबकि वामपंथी दलों की स्थिति लगभग नगण्य हो चुकी है.

यह वही वामपंथ है जिसने कभी राज्य में लगातार 34 वर्षों तक शासन किया था. 2006 में अपने चरम पर, सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे ने 48.4 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 227 सीटें जीती थीं, जो कुल मतों का लगभग आधा था.

इसके बाद 2011 में ममता बनर्जी की अगुवाई में टीएमसी ने इस लंबे शासन का अंत कर दिया. तब से गिरावट लगातार और तेज रही है. 2011 में 60 सीटें और 39.7 प्रतिशत वोट, 2016 में 32 सीटें और 26.2 प्रतिशत वोट, 2021 में शून्य सीटें और केवल 5.7 प्रतिशत वोट, और अब 2026 में यह आंकड़ा घटकर 4.4 प्रतिशत रह गया है.

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केरल: अंतिम किले में दरार

दोपहर 3:05 बजे तक के रुझानों के मुताबिक, वाम लोकतांत्रिक मोर्चा 34 सीटों पर करीब 28.2 प्रतिशत वोट शेयर के साथ आगे चल रहा है. यह केवल एक हार नहीं, बल्कि केरल में वाम दलों का अब तक का सबसे कमजोर प्रदर्शन माना जा रहा है.

पहली बार केरल विधानसभा चुनावों में वामपंथी दलों का वोट शेयर 30 प्रतिशत से नीचे गया है. यह वही गठबंधन है जो महज पांच साल पहले 79 सीटों और 34.3 प्रतिशत वोटों के साथ सत्ता में लौटा था.

त्रिपुरा: प्रभुत्व से पतन तक

त्रिपुरा में भी कहानी कुछ अलग नहीं है. दो दशकों तक सत्ता पर काबिज रहे सीपीआई (एम) ने 2013 में 49 सीटें जीती थीं लेकिन 2018 में भाजपा ने इस वर्चस्व को खत्म कर दिया और सीपीआई (एम) की सीटें घटकर 16 रह गईं.

उस चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी और फॉरवर्ड ब्लॉक को एक भी सीट नहीं मिली थी और तब से यह गिरावट का सिलसिला जारी है.

लोकसभा में भी गिरावट

लोकसभा चुनावों में भी वामपंथी दलों का ग्राफ लगातार गिरता गया है. 1999 में सीपीआई (एम) ने 33 सीटें जीती थीं, जो 2004 में बढ़कर 43 हो गईं. यह उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था, जब उसे 5.7 प्रतिशत वोट शेयर मिला था.

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लेकिन इसके बाद तस्वीर तेजी से बदली. 2024 के लोकसभा चुनावों में सीपीआई (एम) को केवल 4 सीटें मिलीं और उसका वोट शेयर घटकर 1.8 प्रतिशत रह गया. सीपीआई का भी यही हाल रहा. 2004 में 10 सीटों से गिरकर 2024 में वह महज 2 सीटों पर सिमट गई.

फॉरवर्ड ब्लॉक और आरएसपी को एक भी सीट नहीं मिली. छह आम चुनावों के भीतर, वामपंथी दल 50 से अधिक सीटों वाले प्रभावशाली गुट से घटकर नाममात्र की मौजूदगी तक सीमित हो गए हैं.

नोट: पश्चिम बंगाल के आंकड़े दोपहर 3:35 बजे तक और केरल के आंकड़े दोपहर 3:05 बजे तक के रुझानों पर आधारित हैं. मतगणना जारी है.

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