उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ इस वक्त जापान के दौरे पर हैं. राजधानी टोक्यों में उनका जोरदार स्वागत हुआ. इसके साथ ही उन्होंने यहां एक भव्य रोड शो भी किया. सीएम योगी ने यहां अपने एक संबोधन में भारत की प्राचीनता और हिंदुत्व का कनेक्शन जापान से जोड़ते हुए इसके सिंबल पर बात की.
उन्होंने कहा- 'सबसे पहले मैं उगते सूरज की पावन धरा जापान को नमन करता हूं. भारत और जापान के संबंध सूर्य की प्रथम किरण से शुरू होकर, सूर्यवंश की राजधानी उत्तर प्रदेश को एक आत्मीय संवाद के साथ जोड़ते हैं. इन संबंधों को और गहरा करने में भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की क्या भूमिका हो सकती है, यही बताने के लिए मैं यहां टोक्यों में आया हूं.'
टोक्यो में सीएम योगी का संबोधन
सीएम योगी ने कहा, 'उत्तर प्रदेश सूर्यवंश के राजा भगवान श्री राम की जन्मस्थली है. भगवान बुद्ध की पावन धरा भी उत्तर प्रदेश ही है और उनसे जुड़े सबसे अधिक महत्वपूर्ण स्थल यूपी में हैं. भगवान बुद्ध का राज्य कपिलवस्तु उत्तर प्रदेश में है और उन्होंने जहां अपना पहला उपदेश दिया, वो पावन धरती सारनाथ उत्तर प्रदेश में है. भगवान बुद्ध ने सबसे ज्यादा चातुर्मास जिस धरती पर बिताए, वो श्रावस्ती भी यूपी में हैं. गौतम बुद्ध ने अपना अंतिम महापरिनिर्वाण जहां किया, वो कुशीनगर उत्तर प्रदेश में है. इसके अलावा कौशांबी सहित कई अहम स्थल, जो बुद्ध से जुड़े हैं, वह भी उत्तर प्रदेश में ही हैं.'
सीएम योगी ने भगवान बुद्ध से जुड़े उत्तर प्रदेश के स्थलों का जिक्र जापान में इसलिए किया क्योंकि जापान को उगते सूर्य के अलावा बुद्ध की धरती कहा जाता है. लेकिन असल में जापान बौद्ध के अलावा शिंतो (या शिंटो) मान्यताओं का देश है.
जापान के धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास में गहराई से उतरें तो यहां हिंदू परंपराएं भी नजर आती हैं. ये संबंध भारतीयता के साथ जितना अधिक गहरा है उतना ही रोचक भी. यह संबंध किसी धार्मिक फैलाव से नहीं बना है, बल्कि यह सहज सरल सांस्कृतिक साझेदारी, बिजनेस और सदियों की आवाजाही का नतीजा है. खास तौर पर भारत से चीन व कोरिया होते हुए जापान पहुंचे बौद्ध धर्म के जरिये भी हिंदूं परंपराओं का फैलाव हुआ है.
बौद्ध मार्ग से पहुंचे भारतीय प्रतीक और देव-स्वरूप
भारत में पनपी बौद्ध परंपरा जब पहली शताब्दी ईस्वी के बाद मध्य एशिया और चीन पहुंची तब उसके साथ भारतीय दार्शनिक विचार, सिंबल और देवताओं के रूप भी आगे बढ़े. छठी शताब्दी में जापान के शाही दरबार ने बौद्ध धर्म को अपनाया और इसी के साथ भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं के एलिमेंट्स जापानी धार्मिक जीवन परंपराओं के साथ एकसार हो गए.
हिंदू देवी-देवताओं की एंट्री भी जापान में बौद्ध बदलावों के जरिए हुई. उदाहरण में देखें तो देवी सरस्वती को जापान में बेंटेन कहा जाता है. नाम भले ही अलग है लेकिन यहां भी वह संगीत, ज्ञान, कला और जल की देवी मानी जाती हैं. जापान के कई बौद्ध और शिंतो मंदिरों में उनकी मूर्तियां देखने को मिल जाती हैं.
देवी लक्ष्मी को भी जापान में किचीजोटन कहा जाता है. शिंतो परंपरा में वह सौभाग्य और सुंदरता की देवी हैं. लोग उन्हें लकी चार्म के तौर पर देखते हैं. भगवान गणेश यहां कंगितेन कहलाते हैं. जिनकी जुड़वां मूर्ति मिलती है. कांगितेन शिंटो परंपरा के तांत्रिक रुख को सामने रखते हैं. इंद्र की मौजूदगी तैशाकुतें और ब्रह्माजी की बोनतेन के रूप में यहां नजर आते हैं. उन्हें बौद्ध धर्म में रक्षक देवताओं के रूप में स्थान मिला है.
जापान में हिंदू प्रभाव का एक महत्वपूर्ण स्रोत तांत्रिक बौद्ध परंपरा है, खासतौर पर शिंगोन कम्यूनिटी जिसकी स्थापना नौवीं शताब्दी में भिक्षु कुकी (कुकई) ने की थी. शिंगोन परंपरा में मंत्र, मंडल, अग्नि-पूजा और रहस्य भरे अनुष्ठान शामिल रहे हैं. इनकी जड़ें भारतीय वज्रयान और तांत्रिक परंपराओं में मिलती हैं.
रणनीतिक साझेदारी से आगे का सांस्कृतिक रिश्ता
शिंगोन के अनुष्ठानों में आज भी संस्कृत मूल के मंत्रों का उच्चारण किया जाता है. जापान में सिद्धं लिपि (जिसका उद्भव भारत में हुआ) का उपयोग बौद्ध ग्रंथों और मंत्रों के लेखन में हुआ. कई मंदिरों में संस्कृत अक्षरों में लिखे हुए शिलालेख आज भी देखे जा सकते हैं. आधुनिक दौर में भी भारत और जापान के बीच आध्यात्मिक संवाद जारी रहा. उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में भारतीय चिंतकों और जापानी विद्वानों के बीच संपर्क बढ़ा. स्वामी विवेकानंद ने जापान की यात्रा के दौरान उसकी सांस्कृतिक चेतना को करीब से समझा और इसे अध्यात्मिक तौर पर जागा हुआ देश बताया. आज भी जापान में योग, ध्यान और वेदांत को लेकर रुचि देखी जा सकती है, जो इस ऐतिहासिक जुड़ाव की ही देन है.
विकास पोरवाल