अमेरिकी विदेश मंत्री रुबियो पहुंचे कोलकाता, आज PM मोदी से मिलेंगे

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो शनिवार को कोलकाता से दिल्ली पहुंच चुके हैं. जानकारी के मुताबिक वे PM मोदी से मुलाकात करेंगे.

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मार्को रुबियो कोलकाता पहुंचे. (File Photo) मार्को रुबियो कोलकाता पहुंचे. (File Photo)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 23 मई 2026,
  • अपडेटेड 2:00 PM IST

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो शनिवार को कोलकाता पहुंचे. इसके साथ ही मार्को रुबियो, मई 2012 में हिलेरी क्लिंटन के दौरे के बाद कोलकाता पहुंचने वाले पहले अमेरिकी विदेश मंत्री बन गए हैं. भारत में यह उनकी पहली यात्रा है.

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो अपनी पत्नी जीनेट डी. रुबियो के साथ कोलकाता से दिल्ली पहुंच गए हैं. नई दिल्ली में वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात भी करेंगे. इस दौरे में कोलकाता, आगरा, जयपुर और नई दिल्ली जैसे कई शहर शामिल है. आने वाले कुछ दिनों में व्यापार, टेक्नोलॉजी, रक्षा, QUAD समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा की जाएगी.

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बता दें, मार्को रुबियो 23 से 26 मई तक चार दिवसीय अहम भारत दौरे पर हैं. इस दौरान वह 26 मई को क्वाड की बैठक में भी हिस्सा लेंगे. रुबियो का कहना है कि भारत एक महान साझेदार है और ऊर्जा सहयोग बढ़ाने के लिए तैयार है. वैश्विक आपूर्ति संबंधी चिंताओं के बीच ऊर्जा सहयोग बढ़ाने के लिए अमेरिका भारत से बातचीत कर रहा है.

 

मार्को रुबियो इस समय एक साथ 'सेक्रेटरी ऑफ स्टेट' यानी विदेश मंत्री और 'कार्यवाहक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार' दोनों अहम पदों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो इस वक्त दिल्ली में हैं. कोलकाता में अमेरिकी कूटनीतिक मौजूदगी का इतिहास काफी पुराना माना जाता है. भारत स्थित अमेरिकी दूतावास और वाणिज्य दूतावासों के रिकॉर्ड के मुताबिक, 19 नवंबर 1792 को अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन ने न्यूबरीपोर्ट के बेंजामिन जॉय को कोलकाता के पहले अमेरिकी कॉन्सुल के रूप में नियुक्त किया था.

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हालांकि, करीब 17 महीने बाद कोलकाता पहुंचे जॉय को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने औपचारिक रूप से कॉन्सुल के तौर पर मान्यता नहीं दी थी. इसके बावजूद, उन्हें ब्रिटिश अधिकार क्षेत्र के तहत एक वाणिज्यिक एजेंट के रूप में कोलकाता में रहने की अनुमति दी गई थी.

भारत पहुंचने से पहले मार्को रुबियो ने कहा था कि तेजी से बदलती और अस्थिर होती इस सेंचुरी में अमेरिका को अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखने के लिए काबिल सहयोगियों और साझेदारों की जरूरत है, और वह भारत को इसी नजरिए से देखते हैं.

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