समलैंगिकता से एडल्ट्री तक, ये किधर मुड़ गई सबरीमला की बहस? सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी

सुप्रीम कोर्ट में धर्म और कानून के टकराव से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जेंडर इक्वालिटी और संवैधानिक नैतिकता पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि कई फैसलों में पश्चिमी दर्शन का प्रभाव है, जबकि भारतीय समाज की अपनी अलग सोच है.

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धर्म बनाम कानून: सुप्रीम कोर्ट में दूसरे दिन भी बहस. (photo: ITG) धर्म बनाम कानून: सुप्रीम कोर्ट में दूसरे दिन भी बहस. (photo: ITG)

अनीषा माथुर

  • नई दिल्ली,
  • 08 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 5:08 PM IST

सुप्रीम कोर्ट में धर्म और कानून के टकराव से जुड़े अहम मामले पर सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जेंडर इक्वालिटी और संवैधानिक नैतिकता पर कई बड़े सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि लैंगिक समानता से जुड़े कई फैसलों में “पश्चिमी दर्शन” का प्रभाव साफ दिखता है, जबकि भारतीय समाज और परंपराओं का अपना अलग नजरिया है.

सबरीमला मामले में सुनवाई का दूसरा दिन
असल में सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की बेंच 'सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश' के मुद्दे को लेकर सुनवाई कर रही है. खास बात है कि यह मामला सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ कई धार्मिक-सामाजिक मुद्दे भी जुड़े हुए हैं. बुधवार को इस सुनवाई का दूसरा दिन था.

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सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा. बहस के दौरान ही यह मुद्दा 'संवैधानिक और सामाजिक नैतिकता' की ओर मुड़ गया, जहां एक के बाद एक पुराने मामलों के उदाहरण रखे गए. 

कानून पर पश्चिमी दर्शन का असर
एसजी तुषार मेहता ने इस पर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि, अदालतों के कई फैसलों में 'पश्चिमी दर्शन' का प्रभाव दिखाई देता रहा है. इन मामलों में कानून की निर्भरता वेस्ट के विचार हैं, जबकि ऐसे मामलों में भारतीय नजरिया बिल्कुल अलग है. एसजी ने इस दौरान व्यभिचार (Adultery) और धारा 377 से जुड़े फैसलों की आलोचना की. उन्होंने कहा कि, 5 जजों की 'नैतिकता' से सामाजिक बदलाव तय नहीं होना चाहिए.

सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने कहा कि जेंडर इक्वालिटी से जुड़े कई फैसलों में पश्चिमी सोच का असर दिखाई देता है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि व्यभिचार को अपराध से मुक्त करने और धारा 377 को निरस्त करने जैसे फैसले भारतीय दर्शन के बजाय विदेशी विचारों से प्रभावित लगते हैं.  

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एसजी ने अमेरिकी अदालत के एक उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि वहां भी यह सवाल उठा था- 'क्या हम खुद को सामाजिक सुधारक समझते हैं?” उनका तर्क था कि न्यायपालिका को सीमित दायरे में रहकर काम करना चाहिए और बड़े सामाजिक बदलाव तय करना उसका काम नहीं होना चाहिए.

क्या बोले CJI?
इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि 9 जजों की यह संविधान पीठ प्रतिनिधित्व के लिहाज से संतुलित है और इस पर ऐसी आलोचना नहीं होनी चाहिए. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने भी कहा कि इस पीठ को 'गैर-प्रतिनिधिक' नहीं कहा जा सकता.

सीजेआई ने कहा कि कई बार जब देश में उदाहरण नहीं मिलते, तो विदेशी अदालतों के फैसलों का सहारा लिया जाता है, लेकिन उनका महत्व केवल प्रेरणा लेने तक ही सीमित  होता है. स पर एसजी ने जवाब दिया कि हमें पश्चिमी विचारों को सम्मान के साथ देखना-सीखना चाहिए, लेकिन अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए. इस पर जस्टिस बागची ने भी टिप्पणी की कि अच्छी बातें दुनिया के किसी भी हिस्से से ली जा सकती हैं.

एसजी तुषार मेहता ने जोर देकर कहा कि जब कोई व्यक्ति किसी प्रथा को अपनी धार्मिक आस्था बताता है, तो उसे गलत साबित करने की जिम्मेदारी विरोध करने वालों की होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि यह तय करना कि कोई प्रथा वास्तव में धार्मिक है या नहीं, यह 'तथ्य का प्रश्न' है, जिसके लिए सबूत और हलफनामों की जरूरत होती है. ऐसे मामलों का समाधान रिट याचिका से नहीं बल्कि सिविल मुकदमे के जरिए होना चाहिए.

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उनके मुताबिक, धर्म और आस्था से जुड़े मामलों में न्यायिक समीक्षा सीमित होनी चाहिए, खासकर “आवश्यक धार्मिक प्रथा” (Essential Religious Practice) तय करने के सवाल पर.

बहस के दौरान उठा एडल्ट्री पर फैसले का मुद्दा
सुनवाई के दौरान जजों ने एडल्ट्री और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुद्दे पर भी सवाल उठाए. जस्टिस नागरत्ना ने पूछा कि अगर एडल्ट्री अपराध नहीं है, तो क्या तलाक में इसे आधार मानना गलत होगा? जस्टिस सुंदरेश ने सवाल किया कि क्या 'शारीरिक स्वायत्तता के आधार पर व्यभिचार' को पूरी तरह वैध माना जा सकता है?

इस पर एसजी ने कहा कि यही 'संवैधानिक नैतिकता' और 'सामाजिक नैतिकता' के बीच का फर्क है. उन्होंने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस स्कालिया का हवाला देते हुए अपना तर्क रखा.

बहस के दौरान यह भी सामने आया कि अदालतों में असहमति (Dissent) का भी बड़ा महत्व होता है. जस्टिस अमानुल्लाह और जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कई बार असहमति वाले फैसले भविष्य के लिए मार्गदर्शक बनते हैं. एसजी ने भी माना कि असहमति आने वाली पीढ़ियों के लिए विचार का स्रोत होती है.

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