'बेल नियम है और जेल अपवाद...' उमर खालिद को जमानत नहीं देने पर SC ने अपने फैसले पर जताया संदेह

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश के मामले में उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करने वाले अपने ही पहले के फैसले पर गंभीर आपत्तियां व्यक्त की हैं. कोर्ट ने कहा कि ये फैसला गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत लंबे वक्त तक कारावास पर पहले के फैसले में निर्धारित सिद्धांतों को ठीक से लागू करने में विफल रहा है.

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उमर खालिद. (Photo: ITGD) उमर खालिद. (Photo: ITGD)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 18 मई 2026,
  • अपडेटेड 12:36 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को UAPA (अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट) से जुड़े मामलों में जमानत देने के सिद्धांत को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की. कोर्ट ने अपने ही पिछले फैसले में उमर खालिद को जमानत न देने पर गंभीर संदेह व्यक्त किया है. 

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि दिल्ली दंगे साजिश मामले में उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच के फैसलों का उचित पालन नहीं किया गया है. पीठ ने स्पष्ट किया कि कड़े कानूनों के तहत भी 'जमानत एक नियम है और जेल अपवाद है' का सिद्धांत पूरी तरह लागू होता है.

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अदालत ने सुनवाई के दौरान गुलफिशा फातिमा के मामले से जुड़े फैसले का भी जिक्र किया. जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच द्वारा स्थापित दिशा-निर्देशों का सही तरीके से अनुपालन नहीं किया गया था. कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि एक छोटी बेंच कभी भी किसी बड़ी बेंच के पहले के फैसले को कमजोर, दरकिनार या उसका असम्मान नहीं कर सकती है.

सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी व्यवस्था को स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि किसी पुरानी पीठ के फैसले की वैधानिकता या रुख पर कोई संदेह पैदा होता है तो उसे दबाया नहीं जाना चाहिए. ऐसे मामलों में स्थापित प्रक्रिया के तहत पूरे मामले को आगे की समीक्षा और एक बड़ी बेंच के गठन के लिए तत्काल CJI के पास भेजा जाना चाहिए, ताकि कानून की सही व्याख्या हो सके.

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सुप्रीम कोर्ट ने साल 2021 के ऐतिहासिक 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केए नजीब' मामले का हवाला देते हुए कहा कि त्वरित सुनवाई का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है. अदालत ने साफ किया कि यदि किसी मामले के ट्रायल में अत्यधिक देरी हो रही हो और आरोपी एक लंबे समय से जेल की सलाखों के पीछे बंद हो तो उसे जमानत का पूरा अधिकार है, चाहे उस पर UAPA जैसे कड़े कानून के तहत ही आरोप क्यों न लगे हों.

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