'चुनिंदा नेताओं को टार्गेट करने के बजाय...', हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, दी ये हिदायत

हेट स्पीच के खिलाफ एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. अदालत ने कहा कि संवैधानिक और सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों का कर्तव्य संविधान की रक्षा करना है.

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हेट स्पीच पर गाइडलाइन बनाएगा सुप्रीम कोर्ट (Photo: PTI) हेट स्पीच पर गाइडलाइन बनाएगा सुप्रीम कोर्ट (Photo: PTI)

संजय शर्मा / अनीषा माथुर

  • नई दिल्ली,
  • 17 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:40 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए सख्त गाइडलाइन बनाने के संकेत दिए हैं. सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस नागरत्न और जस्टिस बागची की बेंच ने कहा कि सार्वजनिक हस्तियों और संवैधानिक अधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वे संविधान की शपथ का पालन करें. 

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह दी है कि वे केवल एक सियासी दल या विशिष्ट व्यक्तियों को टार्गेट करने के बजाय एक नई और व्यापक याचिका दाखिल करें. अदालत ने यह टिप्पणी उस याचिका पर की, जिसमें हिमंत, धामी, योगी और डोवाल जैसे नेताओं के बयानों का हवाला दिया गया था. 

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बेंच ने जोर देकर कहा कि सियासी दलों को अपने नेताओं पर लगाम लगानी चाहिए और मीडिया को भी ऐसे नफरती भाषणों को बार-बार दिखाने से बचना चाहिए.

सिलेक्टेड टार्गेटिंग पर कोर्ट की आपत्ति

सुनवाई के दौरान सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिका में केवल चुनिंदा लोगों को निशाना बनाया गया है. कोर्ट ने कहा कि हम किसी एक सियासी दल या शख्स को टार्गेट करने वाली याचिकाओं पर विचार नहीं कर सकते, लेकिन हेट स्पीच का बड़ा मुद्दा बहुत संवेदनशील और गंभीर है. याचिकाकर्ता के वकील कपिल ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि उनका इरादा किसी को टार्गेट करना नहीं है और वे उन नामों को हटा देंगे. कोर्ट ने सुझाव दिया कि एक नई याचिका दाखिल की जाए, जिसमें सिर्फ संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए गाइडलाइन की मांग हो.

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राजनीतिक दलों और मीडिया के लिए हिदायत

जस्टिस नागरत्न ने कहा कि राजनीतिक नेताओं का काम देश में भाईचारा बढ़ाना है. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कोर्ट गाइडलाइन बना भी दे, तो क्या नेता उसका पालन करेंगे? कोर्ट ने यह भी पूछा कि सियासी दल खुद अपने आंतरिक संविधान में हेट स्पीच को लेकर नियम क्यों नहीं बनाते हैं? इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए कि वे ऐसे नफरती भाषणों को बार-बार क्यों दोहराते हैं. जस्टिस बागची ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए सवाल किया कि क्या उनका अनुपालन यकीनन हो रहा है?

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लोकतंत्र और संवैधानिक कर्तव्य

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत एक मच्योर डेमोक्रेसी है और यहां उचित सिद्धांतों की उम्मीद की जाती है. सरकारी कर्मचारी और सार्वजनिक सेवक 'ऑल इंडिया सर्विसेज रूल्स' से बंधे हैं. जस्टिस नागरत्न के मुताबिक, नफरत की शुरुआत सोच से होती है और हमें उस सोच को हटाना होगा, जो संविधान के खिलाफ है. कोर्ट ने माना कि वह केवल आदेश पारित कर सकता है, लेकिन यह राजनीतिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे देश के संविधान और अपनी शपथ के प्रति वफादार रहें.

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नई याचिका पर विचार को तैयार कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने याचिकाकर्ता से मौजूदा याचिका वापस लेने और एक नई याचिका दाखिल करने को कहा है. कोर्ट ने भरोसा दिलाया है कि वे हेट स्पीच पर एक सक्रिय और प्रभावी गाइडलाइन बनाने के लिए गंभीरता से विचार करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. यह कदम देश में बढ़ रहे नफरती बयानों पर लगाम लगाने और संवैधानिक मर्यादा को बहाल करने की दिशा में एक बड़ी पहल माना जा रहा है.

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