सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी भी आश्रम या मठ का महंत अपने शिष्यों का आध्यात्मिक प्रमुख होता है. जस्टिस जे के माहेश्वरी और जस्टिस एस एस चंदूरकर की पीठ ने माना कि मठाधीश यानी महंत के धार्मिक और सांसारिक कार्यों को सरकार अलग नहीं कर सकती, क्योंकि महंत पद में आध्यात्मिक दायित्व और संपत्ति का प्रबंधन दोनों ही गूंथे हुए हैं.
अपने इस महत्वपूर्ण निर्णय में कोर्ट ने कहा कि धर्मनिरपेक्ष कार्यों को स्थायी रूप से सरकारी अधिकारियों को सौंपना संविधान के अनुच्छेद-26 और 'महंत पद' की अवधारणा का उल्लंघन है. मठाधिपति केवल प्रशासनिक अधिकारी नहीं होता, बल्कि वह अपने शिष्यों का आध्यात्मिक प्रमुख और मार्गदर्शक भी होता है.पीठ ने आंध्रपदेश के तिरुपति में ऐतिहासिक ‘श्री स्वामी हाथीरामजी मठ’ के मठाधिपति के पद से अर्जुन दास को हटाने के आंध्र प्रदेश सरकार फैसले को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की. पीठ ने मठ के प्रशासन प्रबंधन के लिए सरकारी प्रशासक की नियुक्ति भी रद्द कर दी.
कर्नाटक के उडुपी शहर में स्थित शिरूर मठ मामले में दिए अपने ऐतिहासिक निर्णय का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि ‘महंत पद की अवधारणा में, पद और संपत्ति, कर्तव्यों और व्यक्तिगत हितों, दोनों के तत्व आपस में घुले-मिले हैं. इनमें से किसी को भी दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता.’ शीर्ष अदालत ने कहा कि महंत केवल मठ की सांसारिक संपत्तियों का प्रबंधक मात्र नहीं होता, बल्कि वह शिष्यों के एक समुदाय का आध्यात्मिक प्रमुख और श्रेष्ठ होता है. इस अवधारणा को आंध्र प्रदेश धर्मार्थ और हिंदू धार्मिक संस्थाएं और बंदोबस्ती अधिनियम, 1987 द्वारा मान्यता प्राप्त है.
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि पद और संपत्ति, कर्तव्यों और व्यक्तिगत हितों दोनों के तत्व आपस में घुले-मिले होते हैं और किसी को भी दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता. पीठ ने कहा कि कोई भी ऐसी व्यवस्था, जो किसी मठाधीश के धार्मिक कार्यों को उसके प्रशासनिक और धर्मनिरपेक्ष कार्यों से स्थायी रूप से अलग करने का प्रयास करना या जो बाद वाले कार्यों को किसी योग्य व्यक्ति या संरक्षक को अनिश्चित काल के लिए सौंपना गलत है . भले ही वैध मठाधिपति अपने पद पर बना रहे तो ऐसी व्यवस्था महंत पद की मूल अवधारणा का ही खंडन मानी जाएगी.
संजय शर्मा